खेड़ा। गुजरात के खेड़ा जिले में बसा डाकोर भगवान श्रीकृष्ण के रणछोड़राय स्वरूप के प्रसिद्ध धाम के रूप में जाना जाता है। यहां देशभर से श्रद्धालु दर्शन के लिए पहुंचते हैं। डाकोर की पहचान सिर्फ एक भव्य मंदिर से नहीं बल्कि उस अनोखी कथा से भी जुड़ी है, जिसमें कहा जाता है कि भगवान श्रीकृष्ण अपने भक्त की भक्ति से इतने प्रसन्न हुए कि खुद द्वारका से डाकोर चले आए। वह भी किसी राजसी रथ पर नहीं बल्कि एक साधारण बैलगाड़ी में बैठकर।

कहानी भगवान कृष्ण के परम भक्त बोदना से जुड़ी हुई है। मान्यता है कि अपने पिछले जन्म में बोदना गोकुल में विजयआनंद नामक ग्वाले थे। भगवान कृष्ण के प्रति उनके मन में गहरी श्रद्धा थी। समय बीता और कलियुग में उनका जन्म गुजरात में बोदना के रूप में हुआ। उनकी पत्नी का नाम गंगाबाई बताया जाता है। बोदना धीरे-धीरे श्रीकृष्ण के अनन्य भक्त बन गए।

उनकी भक्ति का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि वे अपने हाथ में तुलसी का पौधा लेकर हर छह महीने में द्वारका पहुंचते और भगवान कृष्ण को तुलसी दल अर्पित करते थे। उम्र बढ़ने के साथ उनके लिए इतनी लंबी यात्रा करना मुश्किल होने लगा। जब वे करीब 72 वर्ष के हुए तो शरीर ने साथ देना कम कर दिया लेकिन भगवान के दर्शन की इच्छा कम नहीं हुई।

भक्त की परेशानी देखकर मान्यता है कि भगवान कृष्ण ने स्वयं उन्हें दर्शन दिए और कहा कि अगली बार जब वे द्वारका आएं तो अपने साथ बैलगाड़ी लेकर आएं। भगवान ने वचन दिया कि वे उनके साथ डाकोर चलेंगे।

बोदना भगवान के आदेश के अनुसार बैलगाड़ी लेकर द्वारका पहुंचे। वहां के पुजारियों ने जब उन्हें बैलगाड़ी के साथ देखा तो पूछा कि आखिर इसकी जरूरत क्यों पड़ी। बोदना ने सहजता से कहा कि वे भगवान कृष्ण को अपने साथ डाकोर ले जाने आए हैं। पुजारियों को उनकी बात पर विश्वास नहीं हुआ। रात में मंदिर के गर्भगृह के द्वार बंद कर दिए गए। आधी रात को भगवान कृष्ण ने मंदिर के बंद दरवाजे खुद खोल दिए। उन्होंने बोदना को जगाया और उनके साथ डाकोर चल पड़े। बोदना भगवान की मूर्ति को बैलगाड़ी में लेकर डाकोर की ओर निकल पड़े।

रास्ते में डाकोर के पास बिलेश्वर महादेव मंदिर के निकट दोनों ने कुछ देर विश्राम किया। कथा के अनुसार, भगवान कृष्ण ने वहां नीम की एक शाखा को छुआ था। मान्यता है कि उस पेड़ की एक शाखा मीठी हो गई जबकि बाकी शाखाएं कड़वी ही रहीं। आज भी इस मीठी नीम की कहानी को डाकोर की लोकपरंपरा में बड़े प्रेम से सुनाया जाता है।

उधर, द्वारका के पुजारियों को जब पता चला कि भगवान की मूर्ति मंदिर में नहीं है, तो वे बोदना का पीछा करते हुए डाकोर पहुंच गए। बोदना घबरा गए। मान्यता है कि भगवान कृष्ण ने उन्हें मूर्ति गोमती तालाब में छिपाने के लिए कहा। इसके बाद बोदना पुजारियों को समझाने पहुंचे लेकिन विवाद के दौरान उनकी मृत्यु हो गई।

कथा के अनुसार, इसके बाद भी पुजारी भगवान की मूर्ति वापस द्वारका ले जाने की जिद पर अड़े रहे। तब भगवान कृष्ण ने बोदना की पत्नी गंगाबाई को स्वप्न में निर्देश दिया कि वह मूर्ति के वजन के बराबर सोना देकर पुजारियों को संतुष्ट करें। गरीब गंगाबाई के पास इतना सोना कहां था! उनके पास केवल सोने की एक छोटी-सी नथ थी। मान्यता है कि भगवान की मूर्ति चमत्कारिक रूप से इतनी हल्की हो गई कि उसका वजन उस नथ के बराबर ही निकला।

भगवान ने पुजारियों को यह भी आश्वासन दिया कि छह महीने बाद द्वारका के एक कुएं में उनकी प्रतिमा का प्रतिरूप मिल जाएगा। इस तरह भगवान रणछोड़राय का डाकोर में वास माना गया।