पन्ना। मध्य प्रदेश के पन्ना जिला चिकित्सालय में कम्प्यूटरीकृत ओपीडी और ई-हॉस्पिटल संचालन के लिए जारी नई ई-निविदा (टेंडर) प्रक्रिया विवादों के घेरे में आ गई है। आगामी वित्तीय वर्ष 2026-27 और 2027-28 के लिए सिविल सर्जन द्वारा आमंत्रित किए गए इस टेंडर में जोड़ी गई एक खास शर्त ने स्वास्थ्य विभाग की निष्पक्षता और कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। आरोप है कि टेंडर में '200 बिस्तरीय जिला अस्पताल में 5 वर्ष के कार्य अनुभव' की एक ऐसी अनिवार्य शर्त जोड़ दी गई है, जिसे पूरा करना जिले की किसी भी नई या स्थानीय एजेंसी के लिए नामुमकिन है। आलोचकों और तकनीकी जानकारों का सीधा आरोप है कि यह पूरी निविदा एक खास और पहले से कार्यरत फर्म को उपकृत करने के उद्देश्य से सुनियोजित तरीके से 'फिक्स' की गई है।
सिविल सर्जन के बयान ने खुद खोली पोल: जिले में सिर्फ एक फर्म के पास अनुभव
टेंडर की शर्तों को लेकर उठ रहे सवालों के बीच सबसे चौंकाने वाला पहलू खुद सिविल सर्जन डॉ. आलोक गुप्ता का वह बयान है, जिसमें उन्होंने कथित रूप से स्वीकार किया है कि पन्ना जिले में वर्तमान में कार्यरत एजेंसी 'आशा एंटरप्राइजेज' के अलावा 200 बिस्तरों वाले जिला अस्पताल का ऐसा लंबा अनुभव किसी अन्य स्थानीय एजेंसी के पास नहीं है। जानकारों का कहना है कि पूर्व में जारी निविदाओं में इस प्रकार की कोई जटिल और सीमित बाध्यता नहीं रखी जाती थी। ऐसे में अचानक इस विशेष क्लॉज (शर्त) को अनिवार्य बनाना साफ दर्शाता है कि अन्य प्रतिस्पर्धी फर्मों को रेस से बाहर करने और पुरानी फर्म का एकाधिकार बनाए रखने का रास्ता तैयार किया गया है।
स्थानीय ऑपरेटरों और नई एजेंसियों का भविष्य अधर में
इस विवादित टेंडर प्रक्रिया ने न केवल सरकारी निविदाओं में पारदर्शिता और सुचिता के दावों पर सवालिया निशान लगा दिए हैं, बल्कि स्थानीय स्तर पर वर्षों से सेवाएं दे रहे योग्य कंप्यूटर ऑपरेटरों और नई तकनीकी फर्मों के सामने भी संकट खड़ा कर दिया है। ई-टेंडरिंग प्रक्रिया में 5 नवंबर 2026 तक ऑनलाइन आवेदन जमा करने की अंतिम तिथि निर्धारित की गई है, लेकिन मनमानी शर्तों के चलते अन्य सक्षम फर्में आवेदन करने से ही वंचित हो रही हैं। स्थानीय युवाओं और तकनीकी ऑपरेटरों का आरोप है कि स्वस्थ प्रतिस्पर्धा को समाप्त कर सिर्फ चहेतों को लाभ पहुंचाने के लिए नियमों को मोड़ा गया है।
पारदर्शिता पर आघात, उच्चस्तरीय जांच की दरकार
डिजिटल इंडिया और ई-हॉस्पिटल जैसी महत्वाकांक्षी योजनाओं का उद्देश्य मरीजों को त्वरित, पारदर्शी और आधुनिक स्वास्थ्य सेवाएं उपलब्ध कराना है। लेकिन इस तकनीकी व्यवस्था की आड़ में ठेकेदारी के खेल और प्रशासनिक संरक्षण के आरोपों ने जिला अस्पताल की साख को बट्टा लगाया है। सवाल उठ रहा है कि जब अन्य कई फर्में तकनीकी रूप से सक्षम और अनुभवी हैं, तो केवल एक अस्पताल-विशेष के 5 साल के अनुभव का पैमाना तय कर प्रतिस्पर्धा का दायरा इतना संकुचित क्यों किया गया? क्या यह कदम सीधे तौर पर टेंडर को एकतरफा करने का प्रयास नहीं है?













