नई दिल्ली। 21 जुलाई... यह सिर्फ कैलेंडर की एक तारीख नहीं है। यह उस संगीतकार को याद करने का दिन है, जिसने अपनी धुनों से हिंदी फिल्म संगीत को एक अलग पहचान दी। वह नाम था सज्जाद हुसैन। 21 जुलाई 1995 को दुनिया को अलविदा कहने वाले सज्जाद हुसैन भारतीय संगीत जगत के एक ऐसे फनकार थे, जिसकी रचनाएं आज भी संगीत प्रेमियों के दिलों में उसी ताजगी के साथ गूंजती हैं। ।

15 जून 1917 को जन्मे सज्जाद हुसैन उन विरले संगीतकारों में थे, जिन्होंने कभी आसान और प्रचलित रास्ता नहीं चुना। उन्होंने अरबी संगीत की बारीकियों को हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत की आत्मा के साथ इस तरह जोड़ा कि उनकी हर धुन एक अलग पहचान बन गई। उनका संगीत पहली बार सुनने में जटिल लगता था, लेकिन श्रोताओं के दिल में हमेशा के लिए उतर जाता था।

सज्जाद हुसैन संगीत को केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि साधना मानते थे। किसी भी धुन पर वे तब तक काम करते रहते थे, जब तक हर सुर अपनी सही जगह पर न बैठ जाए। यही वजह है कि उनकी रचनाओं में तकनीकी जटिलता होने के बावजूद मधुरता और आत्मीयता हमेशा बनी रहती थी।

उनकी सबसे बड़ी खासियत यह थी कि उन्होंने संगीत की सीमाओं को कभी स्वीकार नहीं किया। अरबी संगीत के रंगों को उन्होंने अपनी धुनों में बेहद सहजता से पिरोया, वहीं हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत की राग-रागनियों का भी बेहद खूबसूरती से इस्तेमाल किया। यही अनूठा संगम उनके संगीत को अपने दौर के बाकी संगीतकारों से अलग बनाता था।

उनकी रचनात्मक सोच भी उतनी ही अलग थी। जिस तरह हिंदी कविता में शमशेर बहादुर सिंह और शास्त्रीय संगीत में उस्ताद अमीर ख़ान ने अपनी अलग राह बनाई, उसी तरह फिल्म संगीत में सज्जाद हुसैन ने भी अपनी अलग पहचान कायम की। उन्होंने कभी लोकप्रियता के पीछे भागने के बजाय संगीत की गुणवत्ता को सर्वोच्च प्राथमिकता दी।

यही कारण है कि उन्होंने अपेक्षाकृत कम फिल्मों में संगीत दिया, लेकिन जितनी भी फिल्मों से जुड़े, उनमें उनकी धुनें अमर हो गईं। 'संगदिल', 'सैयां', 'हलचल', 'खेल' और 'रुस्तम-ए-सोहराब' जैसी फिल्मों का संगीत आज भी संगीत प्रेमियों के बीच सम्मान के साथ सुना जाता है।

उनकी धुनों को गाना भी आसान नहीं माना जाता था। तान, मुरकी और मींड के बारीक इस्तेमाल ने उनकी रचनाओं को बेहद चुनौतीपूर्ण बना दिया था। यही वजह थी कि वे बहुत कम गायकों को अपनी धुनों के योग्य मानते थे। उनके स्वभाव की सख्ती के कई किस्से भी मशहूर हैं।

भारत रत्न लता मंगेशकर भी सज्जाद हुसैन के संगीत की बड़ी प्रशंसक थीं। उन्होंने खुद कहा था कि सज्जाद साहब जैसा संगीत किसी और ने नहीं बनाया। उनके संगीत निर्देशन में गाए 'ऐ दिलरुबा नजरें मिला' और 'वो तो चले गए ऐ दिल...' जैसे गीत आज भी लोगों के दिलों में जिंदा हैं।

सज्जाद हुसैन केवल संगीतकार ही नहीं, बल्कि कई वाद्य यंत्रों के कुशल वादक भी थे। मैंडोलिन उनका प्रिय वाद्य था, लेकिन गिटार, वायलिन, पियानो, क्लैरिनेट और एकॉर्डियन जैसे वाद्यों पर भी उनकी शानदार पकड़ थी। उनकी ऑर्केस्ट्रेशन शैली अपने समय से काफी आगे मानी जाती थी।

1944 की फिल्म 'दोस्त' से उन्होंने संगीतकार के रूप में अपनी पहचान बनाई। इस फिल्म में नूरजहां के साथ उनका काम और गीत 'बदनाम मोहब्बत कौन करे' आज भी पुराने फिल्म संगीत के चाहने वालों की पसंदीदा रचनाओं में शामिल है।