नई दिल्ली। यह कहानी है बनारस घराने के मशहूर तबला वादक पंडित किशन महाराज की, जिन्हें इस वाद्ययंत्र में महारत के लिए दुनिया भर में पहचान मिली। उन्होंने एकल वादन और संगतकारी में अपने घराने की खूबियों के साथ कीर्तिमान स्थापित किया और शोहरत की बुलंदी पर पहुंचे। उन्हें संगीत में योगदान के लिए पद्मश्री और पद्म विभूषण से सम्मानित किया गया था।

3 सितंबर 1923 को बनारस घराने के प्रशिक्षित संगीतकारों के परिवार में जन्मे किशन महाराज को हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत से उनके पिता हरि महाराज ने परिचित कराया था। पिता ने किशन महाराज को शुरू से ही ऐसी शिक्षा दी कि भविष्य में वे प्रसिद्ध हो गए।

पंडित किशन महाराज के शब्दों में कहें तो शुरुआत के एक साल तक किशन महाराज को उन्होंने कोई ताल सीधा बजाने ही नहीं दिया। जब भी तबला बजवाया, तब 19 मात्रा, 17 मात्रा, 15 मात्रा, 13 मात्रा, 11 मात्रा और 9 मात्रा ही बजवाया। पूरे साल यही दौर चला था। उन्हें झपताल, त्रिताल या एक ताल, मतलब कोई भी सीधा ताल बजाने नहीं दिया। उस समय पंडित किशन महाराज की उम्र महज 5 वर्ष की थी।

पिता के निधन के बाद पंडित किशन को उनके चाचा कांठे महाराज ने तबला सिखाया। उनकी देखरेख में वे उस दौर के सबसे बेहतरीन और असाधारण तबला वादकों में से एक बने। उनकी प्रस्तुतियों ने दर्शकों को इतना मंत्रमुग्ध कर दिया कि उनके 'बोल' और 'ताल' सुनने वालों की आत्मा में बस गए और उन्हें पूरी तरह से सम्मोहित कर दिया।

उनकी जिंदगी का एक किस्सा यह है कि उन्होंने घर छोड़कर तबले की साधना की। उनकी मुलाकात मुंबई में एक महात्मा से हुई थी। उन्होंने पंडित किशन से बोला था कि तबले की पूर्ण सिद्धि प्राप्त करनी है तो श्मशान में सिद्धि करो। नतीजा यह हुआ कि 40 रोज तक शिवाजी पार्क के श्मशान में जाकर रात को कम से कम 11 माला पाठ करते थे, जिसमें दो से तीन घंटे का समय लगता था। उनकी रात 40 रोज तक ऐसे ही बीती। वे मुंबई के श्मशान में सिद्धि करते रहे। इसके बाद जब बनारस लौटना हुआ तो दो वर्ष तक संकट मोचन मंदिर में गुजरे। मंदिर में भी उनका रियाज जारी रहा।

तबला एक गूंगा बाजा है, जिसे जुबान नहीं, मगर उन्हें अपने गुरु से अच्छी शिक्षा का फल यह मिला कि उनकी उंगलियों के सहारे तबले की भी जुबान हो जाती थी। सरल शब्दों में कहें तो पंडित किशन तबले की भाषा बोलते थे और तबले से शब्दों का खेल खेलते थे।

गायक से बड़ा होशियार होकर वादक को तबला बजाना होता है। उसमें भी बड़े जहन की जरूरत पड़ती है। यही खासियत पंडित किशन महाराज की थी। इसी कारण देश की महान विभूतियों जैसे विलायत खां, पंडित रवि शंकर, अली अकबर खान, अमजद, निखिल बनर्जी ने पंडित किशन को प्यार दिया। उसी तरह गायन में मशहूर रही हस्तियों जैसे भीमसेन जोशी, राजन मिश्रा और शराफत खां ने भी पंडित किशन महाराज को प्यार दिया। पंडित किशन ने कई बार उनके साथ मंच साझा किया था।

भारतीय शास्त्रीय संगीत के दिग्गज कलाकार डागर ब्रदर्स, जब इलाहाबाद रेडियो में कार्यक्रम करते थे, उस समय मृदंग रहते हुए वे कहते थे 'हम पंडित किशन' के साथ जाएंगे। प्रसार भारती आर्काइव्ज पर दिए अपने एक इंटरव्यू में पंडित किशन महाराज ने इस बारे में विस्तार से बात की थी। जिंदगी के अनुभव के बारे में अपने इंटरव्यू में पंडित किशन महाराज ने कहा था, "तबला से जब हमें फुर्सत मिलती थी तब तीन-चार चीजों की शौक और रुचि थी, जिसमें हम घर पर रहकर चित्रकारी करते थे। घर से बाहर निकलने पर उस समय हमें शिकार का बड़ा शौक था। फोटोग्राफी का भी शौक था। अन्य खेलों में रुचि थी, लेकिन वह खेल हमसे खेले ही नहीं गए।"

एक दिलचस्प बात यह भी है कि अपनी ज्यादातर प्रस्तुतियों में वे अपने माथे के बीच में एक बड़ा लाल 'टीका' लगाते थे, जो बनारस घराने की एक खास पहचान थी। वे आम तबला वादकों की तरह बैठने के बजाय, घुटनों के बल एक बहुत ही खास मुद्रा में बैठते थे।