नई दिल्ली। मर्चेंट डिस्काउंट रेट (एमडीआर) के आने से यूनिफाइड पेमेंट इंटरफेस (यूपीआई) इकोसिस्टम को सस्टेनेबल बनाने और तेजी से आगे बढ़ाकर एक अरब लोगों तक पहुंचाने में मदद मिलेगी। यह बयान फिनटेक लीडर्स ने बुधवार को दिया।समाचार एजेंसी आईएएनएस से बातचीत में मोबिक्विक की सह-संस्थापक, कार्यकारी निदेशक और सीएफओ उपासना टाकू ने कहा कि देश में यूपीआई को एक दशक से ज्यादा का समय हो चुका है। इसने भारतीय अर्थव्यवस्था को काफी बदलने का काम किया है। इसके जरिए वित्तीय उत्पादों को लोगों तक पहुंचाने में मदद मिली है, लेकिन इस दूसरा पहलू यह है कि इसका आर्थिक बोझ वित्तीय कंपनियों और बैंकों को उठाना पड़ा रहा है, क्योंकि यूपीआई से आय शून्य है और यह पोर्टफोलियो का एक बड़ा हिस्सा बन गया है।
उन्होंने आगे कहा कि मौजूदा समय में करीब 50-60 करोड़ लोग ही यूपीआई का इस्तेमाल कर रहे हैं और अगर हमें इसे अगले एक दशक में एक अरब लोगों तक पहुंचाना है तो इससे कुछ स्थिर आय होना जरूरी है।
टाकू ने आगे बताया कि मौजूदा समय में एक यूपीआई लेनदेन की सर्वर लागत 17-20 पैसे के करीब है। इसके अलावा हमें यूपीआई प्लेटफॉर्म चलाने के लिए बड़ी इंजीनियरिंग टीम, रिस्क मैनेजमेंट और साइबर सुरक्षा की आवश्यकता होती है और इसके लिए बड़ा निवेश करना पड़ता है।
सरकार की ओर से जो यूपीआई चलाने के लिए सब्सिडी दी जा रही थी, वह कुल लागत का 10 प्रतिशत थी। यूपीआई एमडीआर आने से सिस्टम को सस्टेनेबल बनाने में मदद मिलेगी।
मोबिक्विक के सह-संस्थापक, एमडी एंड सीईओ बिपिन प्रीत सिंह ने कहा कि यूपीआई इकोसिस्टम के कारण देश बीते एक दशक में दुनिया का सबसे बड़ा रियल-टाइम पेमेंट इकोसिस्टम बन पाया है। इसे बैंक और वित्तीय कंपनियों द्वारा चलाया जाता है। इसमें एक बड़ी लागत आती है। यूपीआई एमडीआर (मर्चेंट डिस्काउंट रेट) लाने से इसकी स्थिरता को बढ़ावा मिलेगा। यह 2,000 रुपए से अधिक के लेनदेन पर लगेगा। छोटे कारोबारियों और छोटे लेनदेन पर इसका कोई असर नहीं होगा।




