भोपाल। मध्य प्रदेश के लिए एक बेहद सुकून देने वाली और गौरवपूर्ण खबर सामने आई है। केंद्र सरकार की ताजा 'डायनामिक ग्राउंड वॉटर असेसमेंट रिपोर्ट 2025' के अनुसार, पिछले एक दशक में राज्य के भूजल (ग्राउंड वाटर) स्तर में जबरदस्त सुधार दर्ज किया गया है। लोकसभा में जल शक्ति मंत्रालय द्वारा पेश किए गए आंकड़ों ने यह सिद्ध कर दिया है कि मध्य प्रदेश अब पानी बचाने के प्रयासों में देश के अग्रणी राज्यों की सूची में शामिल हो गया है। रिपोर्ट के सबसे उत्साहजनक आंकड़े बताते हैं कि प्रदेश के 82.82% निगरानी कुओं के जलस्तर में बढ़ोतरी हुई है, जो कि 73.25% के राष्ट्रीय औसत से कहीं अधिक है। यह उपलब्धि राज्य सरकार की जल संरक्षण नीतियों और आम जनता की सक्रिय भागीदारी का ही सुखद परिणाम है।
पूरे देश की तुलना में मध्य प्रदेश की स्थिति राजस्थान, हरियाणा और पंजाब जैसे राज्यों से कहीं बेहतर है, जहाँ भूजल का अत्यधिक दोहन आज भी एक बड़ा संकट बना हुआ है। मध्य प्रदेश के कुल 317 सरकारी ब्लॉकों में से 221 ब्लॉक (लगभग 70%) अब पूरी तरह 'सुरक्षित' श्रेणी में आ चुके हैं। इसका अर्थ यह है कि इन क्षेत्रों में जमीन के भीतर उतना ही पानी वापस भेजा जा रहा है, जितना बाहर निकाला जा रहा है। हालांकि, विभाग ने 64 ब्लॉकों को 'अर्ध गंभीर', 6 को 'गंभीर' और 26 ब्लॉकों को 'अति-दोहित' श्रेणी में रखा है, जहाँ सुधार की अभी भी तत्काल आवश्यकता है। वर्ष 2015 से 2025 के बीच किए गए सर्वे में 1036 कुओं में से 858 कुओं के जलस्तर में वृद्धि पाई गई है, जिसमें से 115 कुओं में तो 4 मीटर से भी अधिक का उछाल देखा गया है।
इस सफलता के पीछे 'अटल भूजल योजना' और 'अमृत सरोवर' जैसे प्रोजेक्ट्स ने 'गेमचेंजर' की भूमिका निभाई है। रिपोर्ट के मुताबिक, अटल भूजल योजना के प्रभावी क्रियान्वयन से भूजल गिरावट की रफ्तार में 5 मीटर प्रति वर्ष तक की कमी आई है। साथ ही, राज्य में लगभग 13,493 हेक्टेयर कृषि भूमि को ड्रिप और स्प्रिंकलर जैसी आधुनिक सिंचाई पद्धतियों से जोड़ा गया है। इसके अलावा, प्रदेश भर में बनाए गए 2,901 अमृत सरोवरों और जल शक्ति अभियान के तहत किए गए 5 लाख से अधिक जल संरक्षण कार्यों (जैसे चेक डैम और मेढ़ बंधान) ने जमीन की प्यास बुझाने में बड़ी मदद की है।
जहाँ एक ओर पानी की मात्रा बढ़ रही है, वहीं दूसरी ओर 'गुणवत्ता' को लेकर एक गंभीर चुनौती भी खड़ी हुई है। ताजा रिपोर्ट के अनुसार, मध्य प्रदेश के 55 में से 39 जिलों के भूजल में नाइट्रेट की मात्रा मानक से अधिक पाई गई है, जिसमें मध्य प्रदेश पूरे देश में उत्तर प्रदेश के बाद दूसरे स्थान पर है। विशेषज्ञों का मानना है कि खेती में यूरिया जैसे उर्वरकों का अत्यधिक इस्तेमाल और शहरों में सीवेज निपटान की लचर व्यवस्था इस बढ़ते प्रदूषण का मुख्य कारण है। इसके अलावा, मालवा अंचल के इंदौर, उज्जैन और शाजापुर जैसे औद्योगिक क्षेत्रों में अब भी चुनौती बनी हुई है, जहाँ पानी का दोहन 80% से ज्यादा होने के कारण इन्हें 'क्रिटिकल' श्रेणी में रखा गया है। भविष्य में मात्रा के साथ-साथ पानी की शुद्धता बनाए रखना अब प्रशासन के लिए अगली बड़ी अग्निपरीक्षा होगी।



