छतरपुर, संतोष शिवहरे। शहर की ऐतिहासिक शैक्षणिक धरोहर शासकीय स्वशासी महाराजा महाविद्यालय के अस्तित्व और उसकी स्वतंत्र पहचान को बचाने के लिए चल रहे जनांदोलन का पहला चरण पूरा हो गया है। महाराजा कॉलेज को महाराजा छत्रसाल बुंदेलखंड विश्वविद्यालय के विलय से मुक्त कर पूर्व की भांति स्वतंत्र शासकीय स्वशासी महाविद्यालय के रूप में पुनर्स्थापित करने की मांग को लेकर आज कांग्रेस नेत्री दीप्ती पांडे की अगुवाई में नागरिकों, छात्रों, पूर्व छात्रों और विभिन्न सामाजिक-राजनीतिक संगठनों ने मुख्यमंत्री के नाम का ज्ञापन कलेक्टर को सौंपा। उल्लेखनीय है कि पिछले करीब 15 दिनों से शहर के करगिल चौक पर धरना-प्रदर्शन और व्यापक हस्ताक्षर अभियान चलाया जा रहा है।
आंदोलन का नेतृत्व कर रहीं दीप्ती पांडे ने ज्ञापन सौंपने के दौरान मीडिया से चर्चा करते हुए कहा कि लगातार 15 दिनों से शहर के लोग सिर्फ एक ही मांग को लेकर संघर्ष कर रहे हैं कि छतरपुर को उसका ऐतिहासिक महाराजा कॉलेज वापस लौटाया जाए। उन्होंने कहा कि विश्वविद्यालय का नवीन विशाल भवन और परिसर बनकर तैयार हो चुका है, इसलिए विश्वविद्यालय प्रशासन को वहां स्थानांतरित किया जाना चाहिए और छतरपुर की यह ऐतिहासिक धरोहर शहर के विद्यार्थियों के लिए सुरक्षित रहनी चाहिए। दीप्ती पांडे ने बताया कि आंदोलन के प्रथम चरण में हस्ताक्षर अभियान चलाया गया, जिसे शहर के बुद्धिजीवियों, अधिवक्ताओं, पत्रकारों, युवाओं, मातृशक्ति और सभी सामाजिक संगठनों का व्यापक समर्थन मिला है। उन्होंने स्पष्ट किया कि प्रथम चरण समाप्त होने के बाद जल्द ही आंदोलन के दूसरे चरण की रूपरेखा तय कर इसे और अधिक धार दी जाएगी, लेकिन महाराजा कॉलेज के अस्तित्व की लड़ाई हर हाल में जारी रहेगी।
कलेक्टर के माध्यम से मुख्यमंत्री को भेजे गए ज्ञापन में महाराजा कॉलेज के करीब 160 वर्ष पुराने गौरवशाली इतिहास और संवैधानिक व प्रशासनिक तथ्यों का विस्तृत उल्लेख किया गया है। ज्ञापन के अनुसार, वर्ष 1865 में उर्दू मदरसा के रूप में शुरू हुआ यह संस्थान 1884 में हाई स्कूल, 1935 में इंटरमीडिएट और 1949 में तत्कालीन मुख्यमंत्री कामताप्रसाद सक्सेना की घोषणा के बाद स्नातक महाविद्यालय बना था। इसके उपरांत यह एक प्रतिष्ठित स्वशासी संस्थान के रूप में स्थापित हुआ, जिसे यूजीसी के 2(f) व 12(B) एक्ट और नैक (NAAC) की मान्यता प्राप्त थी तथा इसमें लगभग 13,000 नियमित छात्र अध्ययनरत थे। वर्ष 2021 में विश्वविद्यालय परिसर के पूरी तरह विकसित न होने के कारण एक वैकल्पिक व्यवस्था के तहत इसका विश्वविद्यालय में विलय किया गया था।
ज्ञापन में राज्य शासन के अन्य जिलों के पूर्व उदाहरणों का हवाला देते हुए बताया गया है कि उज्जैन के माधव कॉलेज और वर्ष 2024 में सागर, खरगोन तथा गुना में भी महाविद्यालयों के विश्वविद्यालय में संविलियन के बाद परिस्थितियों के आधार पर संशोधन कर महाविद्यालयों के स्वतंत्र अस्तित्व और अग्रणी कॉलेज की व्यवस्था को बहाल रखा गया है। वर्तमान में ग्राम गुरैया, अतरार और बगौता मौजा में 418 एकड़ भूमि पर विश्वविद्यालय का स्वतंत्र परिसर बनकर तैयार हो चुका है। लगभग 15 करोड़ रुपये की लागत से अन्य निर्माण कार्य भी पूर्णता की ओर हैं। नया परिसर शहर से 8-10 किलोमीटर दूर होने के कारण कॉलेज और विश्वविद्यालय दोनों का एक ही जगह से दीर्घकालिक संचालन व्यावहारिक नहीं है। नागरिकों और छात्र संगठनों ने शासन से मांग की है कि छात्रहित में विश्वविद्यालय को नवीन परिसर में शिफ्ट किया जाए और महाराजा कॉलेज को स्वतंत्र शासकीय स्वशासी कॉलेज के रूप में तुरंत बहाल किया जाए।














