श्योपुर, उत्तम सिंह। खाड़ी (श्यामपुर) रेंज के अंतर्गत ओछापुरा-श्यामपुर मार्ग पर करीब 14 किलोमीटर तक आरक्षित वन भूमि में निर्माण कंपनी द्वारा डामर और निर्माण मलबा डंप किए जाने का मामला नौ महीने बाद भी कार्रवाई के इंतजार में है। शिकायतों और विभागीय जांच के बावजूद संबंधित कंपनी के खिलाफ अब तक वन अपराध (POR) दर्ज नहीं किया गया है और न ही किसी अधिकारी की जवाबदेही तय की गई है। इससे वन विभाग की कार्यप्रणाली और कानून के समान अनुपालन पर गंभीर सवाल उठ रहे हैं।


पर्यावरण प्रेमी द्वारा सीएम हेल्पलाइन पर दर्ज शिकायत की जांच रिपोर्ट (01 जुलाई 2026) में वन विभाग ने स्वीकार किया कि 8 जून 2026 को निरीक्षण के दौरान वन क्षेत्र में डामर और निर्माण मलबे के ढेर पाए गए थे। कंपनी के प्रभारी ने इसे श्रमिकों की "भूलवश" हुई गलती बताते हुए सात दिन में मलबा हटाने का आश्वासन दिया। इसके बाद विभाग ने यह कहते हुए शिकायत को फोर्स क्लोज करने की अनुशंसा कर दी कि बिटुमिन सामग्री को एनएच-52 की सीमा में समेट दिया गया है और किसी वृक्ष को नुकसान नहीं पहुंचा है। हालांकि, स्वीकारोक्ति के बावजूद कंपनी पर कोई कानूनी कार्रवाई नहीं की गई।


मामला सामने आने के बाद तत्कालीन रेंजर दिनेश कौशल ने मौके से मलबा हटवाने के बजाय केवल उसे सड़क किनारे करवाया। बाद में सीसीएफ लवित भारती के निर्देश पर जांच दल ने स्थल निरीक्षण किया और डीएफओ करण सिंह रंधा से पूरे प्रकरण में लापरवाही तथा जिम्मेदार अधिकारियों पर की गई कार्रवाई की रिपोर्ट मांगी गई।


सीसीएफ लवित भारती ने बताया कि करीब डेढ़ माह पहले जांच पूरी होने के बाद डीएफओ को कार्रवाई कर रिपोर्ट भेजने के निर्देश दिए गए थे, लेकिन अब तक अंतिम प्रतिवेदन उनके कार्यालय तक नहीं पहुंचा है। हाल ही में दोबारा संपर्क करने पर उन्होंने कहा कि दो-तीन दिन में रिपोर्ट आने की संभावना है, जिसके बाद आगे की कार्रवाई की जाएगी।


इधर, स्थानीय लोगों ने वन विभाग के रवैये पर सवाल उठाते हुए आरोप लगाया कि महीनों तक वन भूमि पर निर्माण मलबा पड़ा रहने के बावजूद कंपनी पर कोई केस दर्ज नहीं किया गया, जबकि ग्रामीणों पर जंगल से सूखी लकड़ी लाने जैसी छोटी बात पर भी तत्काल वन अपराध दर्ज कर लिया जाता है। लोगों का कहना है कि कानून का समान रूप से पालन होना चाहिए और प्रभावशाली कंपनियों के मामलों में भी वही कार्रवाई होनी चाहिए जो आम नागरिकों के साथ की जाती है।


शिकायतकर्ता के पास स्थल के वीडियो, फोटो, डिजिटल साक्ष्य तथा सीएम हेल्पलाइन में वन विभाग की लिखित स्वीकारोक्ति मौजूद है। ऐसे में अब यह मामला केवल अवैध डंपिंग तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि वन विभाग की जवाबदेही, पारदर्शिता और निष्पक्ष कार्रवाई पर भी गंभीर प्रश्न खड़े कर रहा है। अब सभी की निगाहें डीएफओ की रिपोर्ट और उसके बाद होने वाली विभागीय कार्रवाई पर टिकी हैं।