रीवा। मध्य प्रदेश के रीवा जिले अंतर्गत सिरमौर क्षेत्र में प्रस्तावित 'टाटा पावर परमाणु ऊर्जा संयंत्र' (Nuclear Power Plant) को लेकर स्थानीय ग्रामीणों का आक्रोश खुलकर सड़कों पर आ गया है। रोझौही, सरई कलां सहित आसपास के दर्जनों गांवों के निवासियों ने इस प्रोजेक्ट के खिलाफ आर-पार की लड़ाई का ऐलान कर दिया है। रोझौही गांव के विशंभर कोल का कहना है कि सरकार भले ही लाड़ली बहना योजना, सरकारी राशन और वृद्धावस्था पेंशन बंद कर दे, उन्हें सब मंजूर है, लेकिन पुरखों की जमीन किसी भी कीमत पर नहीं दी जाएगी। ग्रामीणों का साफ कहना है कि यदि जमीन और गांव चले गए तो आने वाली पीढ़ियों के पास कुछ नहीं बचेगा।


200 एकड़ जमीन का प्रस्ताव, बिना सहमति ड्रिलिंग करने पहुंची मशीनों को खदेड़ा

शुरुआती जानकारी के अनुसार इस प्रस्तावित परमाणु ऊर्जा संयंत्र के लिए करीब 200 एकड़ जमीन चिन्हित करने की बात सामने आई है। प्रोजेक्ट अभी अपनी प्राथमिक स्टेज में है, जिसके तहत जमीन की व्यवहार्यता जांचने के लिए रोझौही और सरई कलां में भारी-भरकम ड्रिलिंग मशीनें भेजी गई थीं। यहां आठ अलग-अलग स्थानों पर 50 से 100 मीटर गहराई तक बोरिंग कर मिट्टी और चट्टानों की जांच की जानी थी। हालांकि, ग्रामीणों के भारी विरोध और हंगामे के चलते तकनीकी टीम को मशीनें लेकर बैरंग वापस लौटना पड़ा। रोझौही के सरपंच कोमल सिंह और ग्रामीण अमित वैश्य का आरोप है कि ग्रामसभा में इस प्रस्ताव को आधिकारिक रूप से खारिज किए जाने के बावजूद किसानों की निजी जमीन पर उनकी बिना सहमति और पूर्व सूचना के चोरी-छिपे सर्वे और टैगिंग का काम किया जा रहा है।


छह साल की पाई-पाई जोड़कर बनाए आशियाने, विस्थापन की आशंका से सहमे परिवार

प्रोजेक्ट की आहट मात्र से सैकड़ों गरीब परिवारों के माथे पर चिंता की लकीरें खिंच गई हैं। गांव की ममता प्रजापति बताती हैं कि उनके परिवार ने रोज 500 रुपये की दिहाड़ी मजदूरी से पाई-पाई बचाकर छह साल की कड़ी मेहनत के बाद कच्चा घर पक्का किया था, जबकि कई अन्य परिवारों को हाल ही में प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत पक्के मकान मिले हैं। ग्रामीणों का दर्द है कि यदि जमीन अधिग्रहित हुई तो न केवल उनके वर्षों के सपने और आशियाने जमींदोज हो जाएंगे, बल्कि उनकी खेती-किसानी और आजीविका भी पूरी तरह छिन जाएगी। ग्रामीणों का दावा है कि इस संयंत्र का सीधा या परोक्ष असर करीब 100 गांवों पर पड़ सकता है।


तमसा-महाना नदी का पानी और रेडिएशन का खौफ, उठ रहे पर्यावरणीय सवाल

जमीन के साथ-साथ ग्रामीणों की सबसे बड़ी चिंता स्थानीय जलस्रोतों और स्वास्थ्य को लेकर है। इस अंचल में जीवनरेखा मानी जाने वाली तमसा और महाना नदियों सहित कई प्राकृतिक जलस्रोत मौजूद हैं, जिन पर सिंचाई और पेयजल की पूरी व्यवस्था निर्भर है। परमाणु ऊर्जा संयंत्रों में बिजली उत्पादन के लिए यूरेनियम विखंडन और बड़े पैमाने पर शीतलन (कूलिंग) प्रक्रिया की आवश्यकता होती है। विशेषज्ञ प्रोफेसर विवेक वर्मा के मुताबिक, यूरेनियम में उच्च ऊर्जा घनत्व होता है, लेकिन इसके संचालन, रेडियोधर्मी कचरे के निस्तारण या रिसाव में जरा सी भी चूक मानव, पशु-पक्षी और भूजल पर विनाशकारी प्रभाव डाल सकती है। ग्रामीण यही सवाल पूछ रहे हैं कि नदियों के जल और पर्यावरण पर पड़ने वाले असर का क्या समाधान है।


हाईकोर्ट में जनहित याचिका की तैयारी, चुटका के बाद रीवा में भी विरोध की गूंज

परमाणु प्लांट के विरोध को अब कानूनी धार देने की तैयारी शुरू हो गई है। सामाजिक कार्यकर्ता शिवानंद द्विवेदी ने बताया कि वे इस मामले में जल्द ही मध्य प्रदेश हाईकोर्ट में जनहित याचिका (PIL) दायर करने जा रहे हैं और यदि आवश्यक हुआ तो शीर्ष अदालत (सुप्रीम कोर्ट) का दरवाजा भी खटखटाएंगे। उल्लेखनीय है कि वर्तमान में मध्य प्रदेश में एक भी संचालित परमाणु ऊर्जा संयंत्र नहीं है; इससे पहले मंडला जिले में 700-700 मेगावॉट की दो इकाइयों वाला 'चुटका परमाणु विद्युत प्रोजेक्ट' प्रस्तावित किया गया था, जो लंबे समय से कानूनी और स्थानीय विरोध का सामना कर रहा है। अब रीवा में भी प्रोजेक्ट के प्रारंभिक चरण में ही उपजा यह भारी जनआक्रोश शासन-प्रशासन के लिए बड़ी चुनौती बनता नजर आ रहा है।