भोपाल। राजधानी भोपाल स्थित अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (AIIMS) में काम के भारी दबाव और कथित 'टॉक्सिक वर्क कल्चर' को लेकर रेजिडेंट डॉक्टरों का गुस्सा फूट पड़ा है। रेजिडेंट डॉक्टर्स एसोसिएशन (RDA) ने संस्थान के कार्यपालक निदेशक (ED) को एक विस्तृत पत्र लिखकर कार्य व्यवस्था में तत्काल सुधार की मांग की है। डॉक्टरों का दावा है कि अत्यधिक कार्यभार के चलते उनका मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य बिगड़ रहा है, जिसका सीधा असर मरीजों की सुरक्षा पर भी पड़ सकता है।
सर्वे में चौंकाने वाला खुलासा: 72% को नहीं मिलता अवकाश
आरडीए द्वारा एम्स के विभिन्न विभागों में कराए गए 'ड्यूटी-ऑवर सर्वे' में स्थिति बेहद चिंताजनक पाई गई है। सर्वे के प्रमुख बिंदु इस प्रकार हैं: सर्वे में शामिल 47 रेजिडेंट डॉक्टरों में से 34 (यानी 72 प्रतिशत) ने बताया कि उन्हें नियमित साप्ताहिक या 15 दिन में मिलने वाला अवकाश नहीं दिया जा रहा है। डॉक्टरों ने प्रति सप्ताह औसतन 98 घंटे काम करने की बात कही है। वहीं, कुछ विभागों में यह कार्यभार 160 घंटे प्रति सप्ताह तक होने का दावा किया गया है। इमरजेंसी, नाइट ड्यूटी और एनेस्थीसियोलॉजी जैसे अति-संवेदनशील विभागों में डॉक्टरों को बिना पर्याप्त आराम के लगातार 36-36 घंटे तक ड्यूटी करनी पड़ रही है।
फेल होने के डर से चुप रहते हैं जूनियर डॉक्टर
एसोसिएशन के पत्र में यह भी बताया गया है कि शैक्षणिक मूल्यांकन (Academic Evaluation) प्रभावित होने के डर से कई रेजिडेंट अपनी शिकायतें खुलकर सामने नहीं रख पाते। लंबी ड्यूटी और नींद की कमी के कारण डॉक्टरों की पढ़ाई और मानसिक स्वास्थ्य बुरी तरह प्रभावित हो रहा है।
दिल्ली एम्स की तर्ज पर 48 घंटे ड्यूटी की मांग
आरडीए ने अपनी मांगों के समर्थन में स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय की 5 जून 1992 की रेजिडेंसी योजना का हवाला दिया है। इसके साथ ही एम्स नई दिल्ली और जिपमर (JIPMER) जैसे बड़े संस्थानों के कार्यालय आदेशों का उल्लेख करते हुए मांग की गई है कि एम्स भोपाल में भी डॉक्टरों के कार्य घंटे अधिकतम 48 घंटे प्रति सप्ताह और लगातार ड्यूटी 12 घंटे तक सीमित की जाए। फिलहाल इन आरोपों पर एम्स प्रशासन का आधिकारिक पक्ष आना बाकी है।
मरीजों की जान के साथ भी खिलवाड़
आरडीए ने स्पष्ट किया है कि यह मुद्दा सिर्फ डॉक्टरों की सहूलियत का नहीं, बल्कि मरीजों की जान बचाने से भी जुड़ा है। रेजिडेंट डॉक्टर अस्पतालों में इमरजेंसी, वार्ड, ऑपरेशन और नाइट ड्यूटी में सबसे अहम भूमिका निभाते हैं। लंबे समय तक नींद न मिलने और आराम की कमी से मानसिक थकान बढ़ती है, जिससे इलाज के दौरान ध्यान केंद्रित करने और त्वरित निर्णय लेने की क्षमता प्रभावित हो सकती है।
GMC भोपाल में भी उठ चुका है यह गंभीर मुद्दा
आपको बता दें कि भोपाल में रेजिडेंट डॉक्टरों की लंबी ड्यूटी और टॉक्सिक कल्चर का मुद्दा पहले गांधी मेडिकल कॉलेज (GMC) में भी गरमा चुका है। साल 2023 में पीजी रेजिडेंट डॉ. बाला सरस्वती की आत्महत्या के बाद जूनियर डॉक्टरों और परिजनों ने काम के दबाव और 36 घंटे की ड्यूटी के गंभीर आरोप लगाए थे। इसके बाद 2024 में जीएमसी के पांच रेजिडेंट डॉक्टरों ने एक गुमनाम पत्र के जरिए सीनियर्स के दुर्व्यवहार और लगातार 24 से 36 घंटे काम कराने की शिकायत की थी। इस विवाद के बाद जीएमसी में 8 से 12 घंटे की ड्यूटी व्यवस्था लागू करने की बात सामने आई थी।




