दतिया। मध्य प्रदेश की हाई-प्रोफाइल दतिया विधानसभा सीट पर हुए उपचुनाव की मतगणना शुरु होने जा रही है। कड़ी सुरक्षा व्यवस्था और पारदर्शी प्रक्रिया के बीच ईवीएम (EVM) से प्रत्याशियों के भाग्य का फैसला बाहर आने वाला है। अधिकारियों, राजनीतिक एजेंटों और मीडिया की मौजूदगी में हर राउंड के आंकड़े सामने आने वाले हैं। दतिया का अगला विधायक कौन होगा, इसकी तस्वीर धीरे-धीरे साफ हो जाएगी। यह सिर्फ एक सीट का नतीजा नहीं है, बल्कि बीजेपी और कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व के साथ-साथ कई दिग्गजों का सियासी भविष्य भी तय करेगा।
69.36% मतदान, पिछली बार के मुकाबले 11% कम
मध्य प्रदेश की हाई-प्रोफाइल दतिया विधानसभा सीट पर उपचुनाव के लिए 30 जुलाई 2026 मतदान संपन्न हुआ था। इस उपचुनाव में पिछले चुनावों के मुकाबले मतदान का प्रतिशत कुछ कम दर्ज किया गया है। निर्वाचन आयोग के आंकड़ों के अनुसार उपचुनाव में कुल 69.36% मतदान हुआ जो कि पिछली बार के मुकाबले 11% कम है। वहीं राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि उपचुनावों में आमतौर पर आम चुनावों की तुलना में मतदान प्रतिशत कम रहता है। उल्लेखनीय है कि दतिया में वर्ष 2018 के विधानसभा चुनाव में 77.2% और 2023 में भी उच्च मतदान दर्ज किया गया था। इस बार मतदान में आई कमी को स्थानीय मुद्दों और मतदाताओं की उदासीनता से जोड़कर देखा जा रहा है।
मुख्य मुकाबला: भाजपा बनाम कांग्रेस और 'तीसरा' फैक्टर
दतिया का यह उपचुनाव साख की लड़ाई बना हुआ है। चुनावी मैदान में मुख्य रूप से तीन ध्रुव नजर आ रहे हैं:
- भारतीय जनता पार्टी (BJP): पार्टी ने आशुतोष तिवारी को अपना उम्मीदवार बनाया है। पूर्व गृह मंत्री डॉ. नरोत्तम मिश्रा की प्रतिष्ठा भी इस चुनाव से जुड़ी है, क्योंकि उन्हें चुनाव संचालन की कमान सौंपी गई है।
- कांग्रेस (INC): पार्टी ने घनश्याम सिंह को मैदान में उतारा है। कांग्रेस यह सीट बरकरार रखने के लिए पूरी ताकत झोंक रही है, क्योंकि पूर्व विधायक राजेंद्र भारती की सदस्यता रद्द होने के बाद यह सीट रिक्त हुई थी।
- आज़ाद समाज पार्टी (ASP): दामोदर सिंह यादव की मौजूदगी ने मुकाबले को त्रिकोणीय बनाने का प्रयास किया है। सांसद चंद्रशेखर आजाद के दौरों ने इस सीट पर दलित और पिछड़े वर्ग के वोट बैंक में सेंधमारी की संभावना पैदा कर दी है।
नरोत्तम मिश्रा का गढ़ और टिकट बदलाव का लिटमस टेस्ट
दतिया लंबे समय तक पूर्व मंत्री डॉ. नरोत्तम मिश्रा का राजनीतिक गढ़ रहा है। 2023 में चुनाव हारने के बाद बीजेपी ने इस उपचुनाव में उनकी जगह आशुतोष तिवारी को उम्मीदवार बनाया। नतीजे चाहें जो भी हों, इसका सीधा एनालिसिस नरोत्तम मिश्रा की राजनीतिक ताकत और पार्टी में उनकी भावी भूमिका से जोड़कर देखा जाएगा। अगर भाजपा जीती तो बीजेपी यह साबित कर सकेगी कि दतिया किसी एक नेता का नहीं, बल्कि बीजेपी के संगठन और कैडर का गढ़ है। वरिष्ठ पत्रकारों के अनुसार, इससे पार्टी भविष्य में बड़े या स्थापित चेहरों के टिकट काटने जैसे कड़े फैसले लेने में और ज्यादा सहज हो सकेगी। जीत के बाद दो संभावनाएं बनेंगी या तो दतिया में पार्टी की निर्भरता किसी एक चेहरे पर खत्म मानी जाएगी, या फिर चुनाव में उनकी सक्रियता को देखते हुए राज्यसभा, राष्ट्रीय राजनीति या केंद्रीय संगठन में उन्हें बड़ी जिम्मेदारी दी जा सकती है।
कांग्रेस जीती तो क्या बदलेगा?
वहीं कांग्रेस प्रत्याशी कुंवर घनश्याम सिंह की जीत पर बीजेपी के टिकट बदलाव के फैसले की कड़ी आलोचना होगी। विपक्ष कहेगा कि नरोत्तम मिश्रा के बिना बीजेपी अपना पुराना गढ़ नहीं बचा सकी। सत्ता में रहते हुए अपना प्रभाव क्षेत्र हारना बीजेपी के लिए बड़ा झटका होगा। इससे 2028 के लिए विपक्ष को सरकार विरोधी नरेटिव बनाने का मौका मिलेगा। वहीं, बीजेपी के भीतर टिकट चयन और स्थानीय गुटबाजी को लेकर नए सिरे से समीक्षा होगी। दतिया जैसी हाई-प्रोफाइल सीट जीतना कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष जीतू पटवारी के नेतृत्व की बड़ी उपलब्धि होगी। इससे संगठन पर उनकी पकड़ मजबूत होगी और 2028 की चुनावी रणनीति में उनका प्रभाव काफी बढ़ जाएगा।




