पन्ना। मध्य प्रदेश के पन्ना जिले के मझगांय क्षेत्र से जलभराव और जन-आंदोलन की गंभीर तस्वीर सामने आई है। मझगांय बांध के डूब क्षेत्र में विस्थापन के खिलाफ चल रहा 'चिता आंदोलन' शनिवार को 15वें दिन भी जारी रहा। पिछले 48 घंटों से जारी मूसलाधार बारिश और बांध के लगातार बढ़ते जलस्तर के कारण आंदोलनकारियों के कमर तक पानी पहुंच चुका है। आंखों के सामने आशियाने जलमग्न हो रहे हैं, लेकिन प्रभावित ग्रामीण पूर्ण मुआवजा और सम्मानजनक पुनर्वास की मांग को लेकर जल-सत्याग्रह पर अड़े हुए हैं।


अधूरे मुआवजे पर उठे सवाल: "12.50 लाख की जगह मिले केवल ₹5 लाख"

सत्याग्रह कर रहे प्रभावित परिवारों ने विस्थापन नीति और प्रशासनिक कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं: ग्रामीणों का आरोप है कि पुनर्वास नीति के तहत प्रति परिवार तय ₹12.50 लाख की राशि में से कई परिवारों को महज ₹5 लाख ही दिए गए हैं। वहीं, कई पात्र परिवार ऐसे भी हैं जिन्हें अब तक एक रुपये की सहायता राशि भी नहीं मिली है। आंदोलनकारियों का कहना है कि पूरी जमीन और घर डूब जाने के बाद इतने कम या अधूरे मुआवजे में नया जीवन शुरू करना असंभव है। उनकी स्पष्ट मांग है कि जब तक सभी प्रभावितों को संपूर्ण मुआवजा और पुनर्वास स्थल पर बुनियादी सुविधाएं नहीं मिल जातीं, तब तक विस्थापन की कार्रवाई रोकी जाए।


जल-सत्याग्रह, मिट्टी सत्याग्रह से सांकेतिक फांसी तक; एकजुट हुए कई परियोजनाओं के विस्थापित

15 दिनों से जारी इस आंदोलन में ग्रामीण विभिन्न तरीकों से अपना विरोध दर्ज करा चुके हैं। जल-सत्याग्रह और मिट्टी सत्याग्रह से लेकर सांकेतिक फांसी-सूली जैसे सख्त कदम उठाए जा चुके हैं। यह आंदोलन केवल एक गांव या बांध तक सीमित नहीं रहा है, बल्कि जिले भर की विभिन्न विकास परियोजनाओं से प्रभावित परिवार एक मंच पर आ गए हैं:

  • केन-बेतवा लिंक परियोजना के प्रभावित परिवार
  • मझगांय डैम एवं रुंज सिंचाई परियोजना के विस्थापित
  • ललितपुर-सिंगरौली रेल लाइन परियोजना की जद में आए भू-स्वामी
  • प्रकृति के कहर और डूबते आशियानों के बीच बुलंद हौसले


मूसलाधार बारिश, कड़कड़ाती ठंड और लगातार बढ़ते जलस्तर के बावजूद सत्याग्रही पानी में उतरकर अपनी मांगों के समर्थन में नारेबाजी कर रहे हैं। ग्रामीणों का कहना है कि यह लड़ाई उनके अस्तित्व और अधिकारों की है। फिलहाल जलभराव की गंभीर स्थिति को देखते हुए स्थानीय प्रशासन और पुलिस की टीमें मौके पर स्थिति पर नजर बनाए हुए हैं, लेकिन ग्रामीणों का रुख साफ है कि बिना ठोस प्रशासनिक आश्वासन के आंदोलन समाप्त नहीं होगा।