छतरपुर/खजुराहो, तुलसीदास सोनी। मध्य प्रदेश शासन के संस्कृति विभाग द्वारा संचालित आदिवर्त जनजातीय एवं लोककला राज्य संग्रहालय, खजुराहो में आयोजित साप्ताहिक सांस्कृतिक श्रृंखला ‘देशज’ के अंतर्गत शनिवार, 24 अक्टूबर 2026 को बुंदेलखंड की समृद्ध लोकसंस्कृति पर आधारित लोकगीतों एवं पारंपरिक दिवारी नृत्य की मनमोहक प्रस्तुतियाँ दी गईं। कार्यक्रम में बुंदेली संस्कार गीतों की मधुर स्वर-लहरियों और दिवारी नृत्य की ऊर्जावान प्रस्तुति के माध्यम से क्षेत्र की सांस्कृतिक विरासत के विविध रंग देखने को मिले।

कार्यक्रम का शुभारंभ दीप प्रज्वलन एवं आमंत्रित कलाकारों के स्वागत के साथ हुआ। पहली प्रस्तुति लवकुशनगर की सुश्री माया जड़िया एवं उनके साथी कलाकारों द्वारा बुंदेली संस्कार गीतों की दी गई। इन गीतों में बुंदेलखंड के पारंपरिक रीति-रिवाजों, पारिवारिक संस्कारों और लोकजीवन की आत्मीय झलक देखने को मिली। कलाकारों की सुरमयी प्रस्तुति ने बुंदेली लोकसंगीत की मिठास और उसकी विशिष्ट पहचान को सजीव कर दिया।

कार्यक्रम की दूसरी प्रस्तुति छतरपुर के श्री महेश कुशवाहा एवं साथी कलाकारों द्वारा दिवारी नृत्य की रही। बुंदेलखंड का यह पारंपरिक लोकनृत्य शौर्य, साहस, उत्साह और सामूहिकता का प्रतीक है। दीपावली के अवसर पर धनतेरस से लेकर दीपावली के बाद तक गाँव-गाँव में युवाओं की टोलियाँ दिवारी नृत्य प्रस्तुत करती हैं। इन टोलियों के प्रदर्शन को देखने के लिए बड़ी संख्या में लोग एकत्रित होते हैं। लोकमान्यता के अनुसार, दिवारी नृत्य का संबंध भगवान श्रीकृष्ण और ग्वाल-बालों की परंपरा से माना जाता है। इसे आत्मरक्षा, शारीरिक कौशल और वीरता से जुड़ी पारंपरिक लोककला के रूप में भी देखा जाता है। कलाकारों की लयबद्ध गतियों और उत्साहपूर्ण प्रस्तुति ने बुंदेलखंड की जीवंत लोकपरंपरा को प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत किया।

कार्यक्रम की अंतिम प्रस्तुति निवाड़ी के श्री बालमुकुंद कड़ा एवं उनके साथी कलाकारों द्वारा बुंदेली संस्कार गीतों की रही। पारंपरिक लोकधुनों से सजी इस प्रस्तुति में बुंदेली लोकजीवन की सहजता, आत्मीयता और सांस्कृतिक समृद्धि की सुंदर अभिव्यक्ति देखने को मिली