Thursday, September 24, 2026

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आयुर्वेद को पहला उपचार माना गया, जो त्रिकाल सत्य है : आयुर्वेदाचार्य

आयुर्वेद को पहला उपचार माना गया, जो त्रिकाल सत्य है : आयुर्वेदाचार्य

नई दिल्ली। देश और दुनिया में 11वां आयुर्वेद दिवस मनाया जा रहा है। इसका मकसद भारत की प्राचीन चिकित्सा प्रणाली के बारे में लोगों के बीच जागरूकता बढ़ाना और दुनिया भर में इसके समग्र स्वास्थ्य लाभों का प्रसार करना है। हालांकि, अधिकांश लोगों का मानना है कि आयुर्वेदिक इलाज एलोपैथी की तुलना में धीमा है। इसको लेकर आयुर्वेदाचार्य राहुल ने प्रतिक्रिया दी। उन्होंने कहा कि आयुर्वेद से हर रोग का जड़ समेत इलाज किया जा सकता है, क्योंकि हमारे ऋषि-मुनि ने भी यही कहा है कि आयुर्वेद त्रिकाल सत्य है। यह पहले भी था, अब भी है और आने वाले समय में भी रहेगा। उन्होंने कहा कि शरीर पंच महाभूतों से बना हुआ है। पंच महाभूतों में आकाश, जल, अग्नि, वायु और पृथ्वी तत्व शामिल हैं। इस तरीके से देखा जाए तो हर चीज जो है, संतुलन में है। मगर शरीर के अंदर 7 धातु (सप्त धातु) भी हैं, जिनमें रस, रक्त, मांस, मेद, अस्थि, मज्जा और शुक्र धातु शामिल हैं। शरीर के अंदर एक धातु बनने में 40 दिन लगते हैं। फिर दूसरी, तीसरी धीरे-धारे सातों धातु बनते हैं। ऐसे करते हुए 280 दिन लगते हैं। हालांकि, अगर कोई व्यक्ति आयुर्वेदिक औषधियों को लगातार 240 दिनों तक लें, तो शरीर के अंदर इतना परिवर्तन हो जाएगा की कोई भी रोग हो, कोई भी बड़ा से बड़ा रोग हो, वो 240 दिन के अंदर या उससे पहले भी नष्ट हो सकता है, क्योंकि रोग की प्रतिरोधक शक्ति होती है। अगर रोग तीन दिन का हो और छह दिन दवाई खा ली, तो रोग को बिलकुल नष्ट कर सकते हैं। आयुर्वेदाचार्य राहुल ने कहा कि ऐसा नहीं कहा जा सकता कि आयुर्वेद एलोपैथी की तुलना में धीमा है, क्योंकि आयुर्वेद में भी कुछ ऐसी औषधियां हैं, जो तुरंत अपना असर दिखाती हैं। जैसे शरीर में सात धातु बनती हैं, उनमें से रस रक्त धातु सबसे पहला है। इसका मतलब है कि हम जो खाते हैं, उसका जीभ पर रस निकालता है। ऐसे में सीधे रस का सेवन कर रहे हैं और इसका प्रभाव खून में दिखाता है, जिससे शरीर पर इसका असर जल्दी दिखता है। आयुर्वेद को पहला उपचार माना गया है, क्योंकि हमारे ऋषियों ने ही कहा है कि यह त्रिकाल सत्य है, जो पहले भी था, अब भी है और आने वाले समय में भी रहेगा। वहीं, आयुर्वेद उपचार के साथ-साथ जीवनशैली को भी बेहतर बनाने का माध्यम है। इसे लेकर दिल्ली के आयुर्वेदाचार्य डॉ. कुणाल शंकर (बीएएमएस) ने कहा कि जीवनशैली के अनुसार, स्वास्थ्य को बेहतर बनाने के लिए वात और पित्त संतुलित रहने चाहिए। मगर ओज तत्व, तेज तत्व और प्राण तत्व को बेहतर करना चाहिए। ओज तत्व को बेहतर बनाने के लिए हम 10 बादाम, सफेद मिर्च 5-6, छोटी इलायची, सौंफ और 1 चम्मच देसी घी गाय का लेंगे और गाय के दूध के अंदर उसको धागे वाली मिश्री के साथ मिलाकर लेंगे। उन्होंने बताया कि तेज तत्व को बेहतर करने के लिए हम अदरक या सौंठ छोटे-छोटे टुकड़ों में करके लेंगे, उसमें थोड़ा नमक और थोड़ी सी नींबू मिलाकर लेंगे। इससे हमारा तेज तत्व बेहतर होगा। वहीं, प्राण तत्व के लिए हम दो चुटकी चौसठ प्रहरी पीपल को शहद के साथ मिलाकर लेंगे। इससे धीरे-धीरे हमारा प्राण तत्व जागेगा। यहां मुख्य बात हमारी इम्यूनिटी है। यह जितनी बेहतर होगी, उतना ही ज्यादा असर होगा।

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आयुर्वेद दिवस विशेष : रसोई में सेहत का खजाना, इनका सेवन स्वास्थ्य और शरीर के लिए वरदान

आयुर्वेद दिवस विशेष : रसोई में सेहत का खजाना, इनका सेवन स्वास्थ्य और शरीर के लिए वरदान

नई दिल्ली। प्रत्येक वर्ष 23 सितंबर को आयुर्वेद दिवस मनाया जाता है। इसी क्रम में बुधवार को पूरे देश और दुनिया में 11वां आयुर्वेद दिवस मनाया जा रहा है। इस वर्ष आयुर्वेद दिवस की थीम 'स्वस्थ भविष्य के लिए आयुर्वेद' है। इसका मकसद वैज्ञानिक रिसर्च के जरिए आयुर्वेद को आधुनिक हेल्थकेयर का अहम हिस्सा बनाना है।आयुर्वेद दिवस मनाने की शुरुआत भारत सरकार के आयुष मंत्रालय ने वर्ष 2016 में धन्वंतरि जयंती के अवसर पर की थी, जिसके बाद से हर वर्ष इस दिवस को मनाया जा रहा है। बहुत से लोग सोचते हैं कि आयुर्वेद का मतलब जड़ी-बूटियों पर आधारित स्वास्थ्य सेवा और उपचार है, लेकिन आयुर्वेद केवल जड़ी-बूटियों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह संपूर्ण जीवनशैली और दीर्घायु होने का विज्ञान है। हर व्यक्ति प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से आयुर्वेद से जुड़ा है, जिसमें सबसे अहम जुड़ाव का माध्यम हमारे घर की रसोई है। रसोई में मौजूद कई चीजें आयुर्वेदिक औषधि के तौर पर भी इस्तेमाल होती हैं। ऐसे में आइए हम आपको आयुर्वेद दिवस के खास अवसर पर आमतौर पर हर किसी की रसोई में इस्तेमाल की जाने वाली कुछ ऐसी चीजों के बारे में बताते हैं, जिसका आयुर्वेद से गहरा नाता होने के साथ स्वास्थ्य संबंधी कई लाभ हैं। हल्दी उनमें से ही एक है। इसमें 'करक्यूमिन' नामक सक्रिय यौगिक होता है, जो शरीर की सूजन को कम करने, खून को साफ करने और त्वचा के घावों को भरने में मदद करता है। वहीं, आयुर्वेद में ताजे अदरक को सर्वगुण संपन्न औषधि माना गया है। इसके सेवन से गले की खराश और सीने की जकड़न में राहत मिलती है। अमूमन सभी के घर की रसोई में मौजूद जीरा का सेवन करने से पाचन शक्ति बढ़ती है। यह पेट की गैस को दूर करता है और शरीर को अंदर से स्वस्थ रखने में मदद करता है। लहसुन रोग प्रतिरोधक क्षमता को मजबूत करने के साथ हृदय स्वास्थ्य के लिए भी बहुत फायदेमंद माना जाता है। सौंफ किचन में इस्तेमाल किया जाने वाला एक ऐसा मसाला है, जिसकी तासीर ठंडी होती है। इसमें मीठी खुशबू होती है, जो पेट की गैस को निकालने में मदद करती है और पाचन को शांत रखने के साथ-साथ सांस को साफ रखती है। ठीक इसी प्रकार मसालों की रानी इलायची पाचन को सुचारु बनाने में मदद करती है और खाने के बाद सांस को साफ रखती है। मेथी के बीज भी शरीर के लिए काफी अच्छे होते हैं। यह मेटाबॉलिज्म को सही बनाए रखते हैं। वहीं, लौंग को खाने से शरीर को गर्माहट मिलती है। यह दांतों के लिए काफी अच्छा होता है। इससे दांतों के दर्द और मसूड़ों की सूजन से तुरंत राहत मिलती है।

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आयुर्वेद दिवस विशेष : केवल चिकित्सा नहीं, संपूर्ण जीवन का शाश्वत विज्ञान है आयुर्वेद

आयुर्वेद दिवस विशेष : केवल चिकित्सा नहीं, संपूर्ण जीवन का शाश्वत विज्ञान है आयुर्वेद

नई दिल्ली। प्रतिवर्ष जब 'आयुर्वेद दिवस' का आयोजन होता है, तो यह केवल भारत की प्राचीन धरोहर का स्मरण मात्र नहीं होता बल्कि आधुनिक विश्व में भटकती हुई जीवनशैली को एक नई दिशा देने का वैश्विक आह्वान बन जाता है। आज जब दुनिया अवांछित दुष्प्रभावों और जीवनपर्यंत चलने वाली दवाओं की जकड़न से त्रस्त है, तब समूचा विश्व योग और आयुर्वेद की निरापद छांव की ओर देख रहा है। इसके बावजूद आधुनिक जनमानस के मन में आयुर्वेद को लेकर कुछ संशय, मिथक और जिज्ञासाएं बनी रहती हैं। इसे लेकर आईएएएनएस की हिंदी टीम ने ग्वालियर के राजकीय आयुर्वेद कॉलेज के विभागाध्यक्ष डॉ. केएल शर्मा से बातचीत की। दरअसल, आयुर्वेद पर अक्सर यह ठप्पा लगा दिया जाता है कि यह एलोपैथी की तुलना में बहुत धीमा उपचार है। इसका जवाब जानने के लिए आईएएनएस की हिंदी टीम ने ग्वालियर के आयुर्वेदाचार्य डॉ. एलके शर्मा से बात की। डॉ. एलके शर्मा ने बताया कि वास्तव में यह धारणा ही वैज्ञानिक रूप से त्रुटिपूर्ण और ऐतिहासिक दृष्टि से प्रायोजित है। ब्रिटिश औपनिवेशिक काल से पूर्व संपूर्ण भारत और विश्व के कई हिस्सों में आयुर्वेद ही स्वास्थ्य संरक्षण और रोगोपचार का मूल आधार था। ब्रिटिश शासन और आधुनिक पेट्रो-केमिकल आधारित फार्मा उद्योग के प्रसार के दौरान यह नैरेटिव गढ़ा गया कि पारंपरिक चिकित्सा पद्धति का असर धीमा है। सच यह है कि एलोपैथी कई बार केवल लक्षणों को दबाने का त्वरित काम करती है, जिसे लोग 'घ्र आराम' समझ लेते हैं। इसके विपरीत, आयुर्वेद रोग के मूल कारक को समाप्त करने पर कार्य करता है। मानव शरीर कोई निर्जीव मशीन नहीं है जिसका पुर्जा रातोंरात बदल दिया जाए। जब किसी जटिल विकार जैसे मधुमेह, गठिया (आमवात/आर्थराइटिस), दमा (अस्थमा), त्वचा विकार, यकृत (लिवर) या गुर्दे (किडनी) से जुड़े रोगों का उपचार किया जाता है, तो शरीर को पुनः प्राकृतिक संतुलन में लौटने में समय लगता है। आधुनिक चिकित्सा में जहां कई विकारों में आजीवन दवाएं खानी पड़ती हैं और उनके दुष्प्रभावों से नए रोग जन्म लेते हैं, वहीं आयुर्वेद कुछ समय अवश्य ले सकता है लेकिन वह बिना किसी साइड-इफेक्ट के रोग का स्थायी समाधान प्रदान करता है। जब आईएएनएस ने डॉ शर्मा से पूछा कि क्या आयुर्वेद जटिल रोगों को पूरी तरह खत्म कर सकता है, तो डॉ एलके शर्मा ने बताया कि इसका उत्तर आयुर्वेद की मौलिक कार्यप्रणाली में निहित है। आधुनिक चिकित्सा पद्धति मुख्य रूप से 'सिंगल मॉलिक्यूल' (एकल अणु) आधारित दृष्टिकोण पर काम करती है जबकि आयुर्वेद का आधार 'पंचभौतिक सिद्धांत' (आकाश, वायु, अग्नि, जल और पृथ्वी) है। आयुर्वेद में हर मरीज का इलाज 'व्यक्तिशः यानी पर्शनालाइज्ड' होता है। यहां रोग के साथ-साथ रोगी की प्रकृति, सत्व (मानसिक बल), सात्म्य (अनुकूलता) और शारीरिक शक्ति का सूक्ष्म विश्लेषण किया जाता है। यही कारण है कि जहां एलोपैथी हाथ खड़े कर देती है या केवल रोग प्रबंधन की बात करती है, वहां आयुर्वेद की हर्बो-मिनरल (काष्ठौषधि एवं रसौषधि) संरचनाएं चमत्कारिक प्रभाव दिखाती हैं। हेपेटाइटिस, फैटी लिवर, गंभीर चर्म रोग और मेटाबॉलिक विकारों में आयुर्वेद ने बार-बार सिद्ध किया है कि यह केवल रोग को दबाता नहीं, बल्कि धातु स्तर पर जाकर विकृति को समूल नष्ट करने का सामर्थ्य रखता है। डॉ शर्मा कहते हैं कि वैदिक और पौराणिक काल से (विशेषकर त्रेतायुग से) आयुर्वेद समाज को रोगमुक्त करता आया है। सतयुग तक जब विकृतियां न्यूनतम थीं, तब भी स्वास्थ्य संरक्षण के रूप में यह ज्ञान उपस्थित था। दुर्भाग्यवश, पराधीनता के दौर में भारतीय संस्कृति के साथ-साथ हमारी इस ऋषि-परंपरा को सुनियोजित ढंग से हाशिए पर धकेला गया। अंग्रेजों ने एलोपैथी को मुख्यधारा बनाकर आयुर्वेद को सीमित किया और स्वतंत्रता के बाद भी तात्कालिक नीतियों ने इसी ढर्रे को जारी रखा। परिणामस्वरूप, अपनी ही भूमि पर अमृत तुल्य यह विज्ञान 'अल्टरनेटिव मेडिसिन' (वैकल्पिक चिकित्सा) बनकर रह गया लेकिन आज परिदृश्य बदल रहा है। आज जब आधुनिक विज्ञान प्रिवेंटिव हेल्थकेयर और होलिस्टिक वेलनेस की बात कर रहा है, तो आयुर्वेद स्वतः पहली प्राथमिकता बनने की क्षमता रखता है। आपातकालीन सर्जिकल हस्तक्षेप को छोड़कर जीवनशैली जन्य अधिकांश विकारों और प्राथमिक स्वास्थ्य के लिए आयुर्वेद को पहली पसंद बनाया जाना न केवल व्यावहारिक है बल्कि मानव स्वास्थ्य के दीर्घकालिक हित में भी है। डॉ केएल शर्मा आगे बताते हैं कि आमतौर पर समझा जाता है कि चिकित्सा केवल बीमारों के लिए होती है लेकिन आयुर्वेद मूलतः जीवन का विज्ञान है। महर्षि चरक ने आयुर्वेद का परम प्रयोजन स्पष्ट करते हुए लिखा है, "स्वस्थस्य स्वास्थ्य रक्षणम्, आतुरस्य विकार प्रशमनम् च" अर्थात स्वस्थ व्यक्ति के स्वास्थ्य की रक्षा करना पहली प्राथमिकता है और रोगी के विकार को शांत करना दूसरा उद्देश्य है। आयुर्वेद के पास एक स्वस्थ व्यक्ति को देने के लिए 'दीर्घायु' और 'सक्रिय यौवन' का पूरा विधान है। आचार्यों ने चरक और सुश्रुत संहिता के आरंभिक अध्यायों में ही दिनचर्या (दैनिक अनुशासन), ऋतुचर्या (ऋतु अनुसार आचरण) और रात्रिचर्या का विशद वर्णन किया है। यदि कोई स्वस्थ व्यक्ति इन नियमों का पालन करे, जैसे ब्रह्म मुहूर्त में जागरण, उषःपान, शरीर की मालिश (अभ्यंग) और मौसमी बदलावों के अनुरूप दिनचर्या, तो उसके बीमार पड़ने की आशंका कम हो जाती है। डॉ केएल शर्मा ने बताया कि आयुर्वेद केवल चूर्ण या काढ़े की पुड़िया नहीं है; इसका मूल स्तंभ 'आहार और विहार' है। आयुर्वेद में भोजन को ही 'महाभेषज' (सर्वश्रेष्ठ औषधि) माना गया है। आयुर्वेदिक आहार की अवधारणा अत्यंत वैज्ञानिक और समृद्ध है। आचार्यों ने प्रकृति से मिलने वाले हर अन्न-जल को विभिन्न वर्गों में विभाजित किया है, जिसमें जलवर्ग, शूकधान्य वर्ग, शमीधान्य वर्ग और शाक व फल वर्ग शामिल हैं। इसके साथ ही 'विहार' के अंतर्गत अष्टांग योग और मानसिक गुणों का उल्लेख मिलता है। आयुर्वेद के अनुसार स्वास्थ्य केवल अंगों की क्रियाशीलता नहीं बल्कि दोषों और गुणों की समरसता है, जिसमें शारीरिक त्रिदोष, मानसिक त्रिगुण शामिल हैं। जब मनुष्य अपनी प्रकृति के अनुसार आहार ग्रहण करता है और योग तथा प्राणायाम द्वारा मानसिक सत्व को बढ़ाता है, तब वह वास्तविक स्वास्थ्य का अनुभव करता है। दोषों का विषम होना ही रोग है और उनका सम होना ही आरोग्य।

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आयुर्वेद की 'बृहत्त्रयी' : चरक और सुश्रुत संहिता व अष्टांग हृदय' का महत्व, जिनमें छिपा है आयुर्वेद का सार

आयुर्वेद की 'बृहत्त्रयी' : चरक और सुश्रुत संहिता व अष्टांग हृदय' का महत्व, जिनमें छिपा है आयुर्वेद का सार

नई दिल्ली। बुधवार को 11वां राष्ट्रीय आयुर्वेद दिवस मनाया जा रहा है। इस अवसर पर आयुर्वेद के मूल आधार - बृहत्त्रयी यानी चरक संहिता, सुश्रुत संहिता और अष्टांग हृदय के बारे में जानना बेहद प्रासंगिक है। आयुर्वेद में इन तीनों ग्रंथों को सबसे प्रामाणिक और सर्वश्रेष्ठ माना गया है।'चरक संहिता' की रचना की कहानी भी बेहद दिलचस्प है। इसकी शुरुआत महर्षि पुनर्वसु आत्रेय के उपदेशों से हुई, जिन्हें उनके शिष्य अग्निवेश ने 'अग्निवेश तंत्र' के रूप में लिपिबद्ध किया। बाद में आचार्य चरक ने इसी ग्रंथ का संपादन और परिमार्जन किया, जो आगे चलकर 'चरक संहिता' के नाम से प्रसिद्ध हुआ। समय के साथ इस ग्रंथ का कुछ हिस्सा विलुप्त हो गया था, जिसके एक-तिहाई (1/3) भाग को बाद में आचार्य दृढबल ने लिखकर इसे पूर्ण रूप दिया। आयुर्वेद में कहा गया है कि 'चरकस्तु चिकित्सिते श्रेष्ठ:' यानी चिकित्सा के क्षेत्र में चरक श्रेष्ठ हैं। यह ग्रंथ 8 स्थानों और 120 अध्यायों में बंटा है। इनमें सूत्रस्थान 30, निदानस्थान 8, विमानस्थान 8, शारीरस्थान 8, इन्द्रियस्थान 12, चिकित्सास्थान 30, कल्पस्थान 12 और सिद्धिस्थान 12 अध्याय शामिल हैं। सूत्रस्थान में स्वस्थ व्यक्ति के स्वास्थ्य की रक्षा और रोगी के रोग निवारण के मूल सिद्धांत हैं। विमानस्थान में दोष-भेषज-देश-काल-बल जैसे भावों का अंशांश विकल्प बताया गया है। शारीरस्थान में सत्व, आत्मा और शरीर का संबंध बताया गया है कि 'शरीरं हि सत्त्वमनुविधीयते सत्त्वं च शरीरम्।' चरक का प्रसिद्ध सिद्धांत है कि शमन चिकित्सा से दबा रोग फिर लौट सकता है, लेकिन संशोधन यानी पंचकर्म से नष्ट रोग दोबारा नहीं होता, 'जिता संशोधनैर्ये तु न तेषां पुनरुद्भव:।' वहीं, 'सुश्रुत संहिता' शल्य चिकित्सा (सर्जरी) का मूल और प्रामाणिक ग्रंथ है। काशीराज दिवोदास धन्वंतरि के उपदेशों को उनके योग्य शिष्य और विश्वामित्र के पुत्र सुश्रुत ने इस ग्रंथ के रूप में संकलित किया था। बाद में, पांचवीं शताब्दी में नागार्जुन ने इसमें 'उत्तरतंत्र' जोड़कर इसका संशोधन किया। आधुनिक सर्जन भी महर्षि सुश्रुत को 'शल्य चिकित्सा का जनक' मानते हैं। मूल रूप से यह 5 स्थानों और 120 अध्यायों में थी, जिनमें सूत्रस्थान 46, निदानस्थान 16, शारीरस्थान 10, चिकित्सास्थान 40, कल्पस्थान 8 अध्याय हैं। इसके बाद उत्तरतंत्र के 66 अध्याय जोड़ने पर अब कुल 186 अध्याय हैं। इसमें अष्टविध शल्यकर्म, यंत्र, शस्त्र, क्षारकर्म, अग्निकर्म, जलौकावचारण, कर्णव्यध, व्रणबंधन जैसे शल्य सिद्धांतों का अद्भुत वर्णन है। शारीरस्थान में मर्मशारीर का वर्णन आधुनिक विज्ञान के लिए भी कौतूहल का विषय है। इसीलिए कहा गया कि 'शारीरे सुश्रुत: श्रेष्ठ:।' इस पर डल्हण की निबन्धसंग्रह टीका सबसे लोकप्रिय है। अष्टांग हृदय को आयुर्वेद का सार कहा जाता है। अष्टांग हृदय के लेखक सिंहगुप्त के पुत्र आचार्य वाग्भट हैं। इसमें 120 अध्याय छह खंडों में विभाजित हैं। वाग्भट स्वयं कहते हैं कि जैसे शरीर में हृदय सबसे महत्वपूर्ण है, वैसे ही आयुर्वेद के आठ अंगों का सार इस ग्रंथ में है। उन्होंने कहा कि आयुर्वेद रूपी सागर को मंथने से अष्टांग संग्रह रूपी अमृत निकला और उसी से अष्टांग हृदय की उत्पत्ति हुई। इसमें बिखरी हुई जानकारी को एक जगह एकत्र किया गया है, जैसे अलग-अलग खेतों से जौ इकट्ठा करके ढेर बनाया जाता है। अष्टांग आयुर्वेद के आठ अंग हैं। इनमें काया चिकित्सा, शल्य तंत्र, शालाक्य तंत्र (आंख, नाक, कान, गला), कौमारभृत्य (बाल रोग), अगदतंत्र (विष विज्ञान), भूत विद्या (मनोचिकित्सा), रसायन (कायाकल्प) और वाजीकरण शामिल है। आज के समय में जब पूरी दुनिया आयुर्वेद की ओर लौट रही है, बृहत्त्रयी का अध्ययन न केवल चिकित्सकों के लिए, बल्कि हर भारतीय के लिए अपनी जड़ों को समझने का माध्यम है।

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शरीर में ऊर्जा का संतुलन बनाए रखती है महाभेद मुद्रा, जानें करने का सही तरीका

शरीर में ऊर्जा का संतुलन बनाए रखती है महाभेद मुद्रा, जानें करने का सही तरीका

नई दिल्ली। योग शास्त्रों में शरीर और मन को स्वस्थ रखने के लिए कई तरह की मुद्राओं का अभ्यास करना बताया गया है। योग के इन्हीं आसनों में से शामिल है 'महाभेद मुद्रा', जो योग के उस गहरे और सूक्ष्म आयाम से जोड़ती है, जहां शरीर, प्राण और मन एक बिंदु पर आकर मिलते हैं। महावेध मुद्रा हठ योग की एक महत्वपूर्ण और उन्नत यौगिक क्रिया है, जिसमें 'महा' का अर्थ महान और 'वेध' का अर्थ भेदना या प्रहार करना होता है। यह मुद्रा शरीर के प्रमुख चक्रों और नाड़ियों को जाग्रत करने में मदद करती है। इसके नियमित अभ्यास से शरीर में ऊर्जा का संतुलन बनाए रखने और एकाग्रता बढ़ाने में मदद मिल सकती है। यह मुद्रा विशेष रूप से योग और ध्यान का अभ्यास करने वाले लोगों के लिए उपयोगी मानी जाती है। यह मुद्रा शरीर के तीन प्रमुख बंधों, मूलबंध, उड्डियानबंध और जालंधर बंध का समन्वय है, जो कुंडलिनी शक्ति को जागृत कर सुषुम्ना नाड़ी का भेदन करने में सहायक मानी जाती है। हठयोग प्रदीपिका और घेरंड संहिता जैसे प्राचीन ग्रंथों में इस मुद्रा को सिद्धि प्रदान करने वाली और साधक को महासिद्धि की ओर ले जाने वाली बताया गया है। यह न केवल मानसिक शांति और जीवन ऊर्जा को बढ़ाती है, बल्कि साधक के व्यक्तित्व में एक अलौकिक प्रभाव का संचार करती है। यह मूलाधार चक्र को सक्रिय कर कुंडलिनी शक्ति को जागृत करने में सहायक है। इसके नियमित अभ्यास से कब्ज, बवासीर और अन्य आंतरिक विकार दूर होते हैं। यह पीनियल और पीयूष ग्रंथि को प्रभावित कर हार्मोन संतुलन में सुधार करती है। इस आसन को करने के लिए पद्मासन (कमल आसन) में सहज होकर बैठें और मेरुदंड (रीढ़ की हड्डी) को सीधा रखें। हथेलियों को जांघों के बगल में जमीन पर टिकाएं। नासिका से गहरी सांस लें, सांस को अंदर रोकें (आंतरिक कुंभक), और जालंधर बंध लगाएं। हाथों पर शरीर का भार डालकर शरीर को थोड़ा ऊपर उठाएं और नितंबों को 3 से 5 बार धीरे से जमीन पर स्पर्श कराएं। नितंबों को जमीन पर टिकाएं, फिर धीरे-धीरे बंध खोलें और सांस को बाहर छोड़ें। गर्दन में दर्द, सर्वाइकल स्पॉन्डिलाइटिस या वर्टिगो के रोगी इस अभ्यास को न करें। उच्च रक्तचाप या हृदय रोग से पीड़ित लोग इसे करने से बचें।

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