Monday, October 12, 2026

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विराट कोहली का महा-रिकॉर्ड: सचिन को पीछे छोड़ बने सबसे तेज 15 हजारी

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हर मिनट 4 महिलाओं को हो रहा ब्रेस्ट कैंसर, बचाव के लिए रोजमर्रा की इन आदतों में करें सुधार

हर मिनट 4 महिलाओं को हो रहा ब्रेस्ट कैंसर, बचाव के लिए रोजमर्रा की इन आदतों में करें सुधार

नई दिल्ली। ब्रेस्ट कैंसर आज दुनियाभर में महिलाओं की सेहत से जुड़ी एक बड़ी चिंता बन चुका है। हर मिनट 4 महिलाओं में ब्रेस्ट कैंसर का पता चलता है जबकि हर मिनट एक महिला की इस बीमारी से मौत हो जाती है। इस बीमारी के मामले लगातार लोगों का ध्यान खींच रहे हैं। यही वजह है कि अक्टूबर को ब्रेस्ट कैंसर जागरूकता महीने के रूप में मनाया जाता है, ताकि लोगों को इस बीमारी के जोखिम, बचाव और समय पर पहचान के महत्व के बारे में बताया जा सके। इस बीच संयुक्त राष्ट्र ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर एक पोस्ट के जरिए ब्रेस्ट कैंसर के प्रति जागरूकता बढ़ाने की अपील की है। ब्रेस्ट कैंसर एक ऐसी बीमारी है, जिसमें स्तन की असामान्य कोशिकाएं तेजी से बढ़ने लगती हैं और धीरे-धीरे ट्यूमर का रूप ले सकती हैं। इसकी शुरुआत आमतौर पर दूध बनाने वाले लोब्यूल्स या दूध की नलिकाओं से होती है। अगर समय रहते बीमारी की पहचान और इलाज न हो, तो कैंसर आसपास के ऊतकों, लिम्फ नोड्स और शरीर के दूसरे अंगों तक फैल सकता है। ऐसी स्थिति में बीमारी गंभीर और जानलेवा हो सकती है। हालांकि, अच्छी बात यह है कि अगर ब्रेस्ट कैंसर का शुरुआती चरण में पता चल जाए, तो इलाज के बेहतर नतीजे मिलने और मरीज के जीवित रहने की संभावना बढ़ सकती है। इसलिए शरीर में होने वाले बदलावों को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) के आंकड़ों के मुताबिक, वर्ष 2024 में दुनियाभर में अनुमानित 24 लाख महिलाओं में ब्रेस्ट कैंसर का पता चला और करीब 6 लाख 94 हजार महिलाओं की मौत इस बीमारी के कारण हुई। ब्रेस्ट कैंसर दुनिया के लगभग हर देश में महिलाओं को प्रभावित करता है। उम्र बढ़ने के साथ इसका जोखिम भी बढ़ता जाता है। हालांकि, कम उम्र की महिलाओं में भी यह बीमारी हो सकती है। संयुक्त राष्ट्र ने ब्रेस्ट कैंसर का जोखिम कम करने के लिए कुछ जरूरी आदतों पर ध्यान देने की सलाह दी है। सबसे पहले धूम्रपान से दूरी बनाने की सलाह दी गई है। धूम्रपान सेहत के लिए कई तरह से नुकसानदायक है। इससे कैंसर समेत कई गंभीर बीमारियों का खतरा बढ़ता है। इसलिए सिगरेट, बीड़ी और दूसरे तंबाकू उत्पादों से दूरी बनाना बेहतर है। इसके साथ ही शराब का सेवन भी नहीं करना चाहिए। रोजाना टहलना, योग करना, साइकिल चलाना या अपनी क्षमता के अनुसार व्यायाम करना सेहत के लिए फायदेमंद है। नियमित शारीरिक गतिविधि वजन को नियंत्रित रखने और ब्रेस्ट कैंसर के जोखिम को कम करने में मदद कर सकती है। स्तन में नई गांठ, स्तन के आकार या त्वचा में बदलाव, निप्पल का अंदर की ओर मुड़ना या निप्पल से असामान्य स्राव जैसे लक्षण दिखाई दें, तो डॉक्टर से सलाह लें। हर गांठ कैंसर नहीं होती, लेकिन इसकी जांच कराना जरूरी है। किसी भी उम्र में ऐसे बदलावों को अनदेखा न करें।

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रोज करें गोमुखासन, कंधे-पीठ के दर्द से मिलेगी राहत, फेफड़े होंगे मजबूत

रोज करें गोमुखासन, कंधे-पीठ के दर्द से मिलेगी राहत, फेफड़े होंगे मजबूत

नई दिल्ली। आजकल की भागदौड़ भरी जिंदगी में खुद को स्वस्थ और तनावमुक्त रखने के लिए योग करना एक अच्छा विकल्प है। योग के विभिन्न आसनों में गोमुखासन शरीर को लचीला और मांसपेशियों को मजबूत रखने में मदद करता है। गोमुखासन नाम दो शब्दों से मिलकर बना है- 'गो' यानी गाय और 'मुख' यानी मुंह। इस आसन को करते समय शरीर की आकृति गाय के मुंह के समान दिखती है, इसलिए इसे गोमुखासन कहा जाता है। इस आसन को नियमित रूप से करने से कंधों, छाती और पीठ के ऊपरी हिस्से में खिंचाव मसूस होता है। इस आसन में शरीर की मुद्रा गायक के मुख जैसी दिखाई देती है, इसलिए इसे गोमुखासन कहा जाता है। आयुष मंत्रालय के अनुसार, गोमुखासन बैठकर किए जाने वाले महत्वपूर्ण आसनों में से एक है, जो आसन छाती और कंधों के लिए महत्वपूर्ण माना जाता है। दरअसल, इस आसन को करने के दौरान हाथों को पीठ के पीछे ले जाकर आपस में बांधा जाता है और छाती को आगे की ओर खोला जाता है। इस प्रक्रिया से छाती के हिस्से में खिंचाव आता है और छाती पूरी तरह से खुल जाती है। छाती खुलने से फेफड़ों पर सकारात्मक प्रभाव पड़ता है। फेफड़ों को फैलने और सिकुड़ने के लिए ज्यादा जगह मिलती है, जिससे उनकी कार्यक्षमता बढ़ती है और शरीर में ऑक्सीजन का प्रवाह बेहतर होता है। यही कारण है कि यह आसन सांस से जुड़ी समस्याओं में काफी मददगार है। नियमित रूप से गोमुखासन का अभ्यास करने से अस्थमा, सांस फूलना और छाती में जकड़न जैसी परेशानियों में आराम मिलता है। इसके अलावा यह आसन कंधों और गर्दन की अकड़न को दूर करता है, पीठ को मजबूत बनाता है और शरीर के पोस्चर को भी सुधारता है। यदि शुरुआत में पीठ के पीछे दोनों हाथ आपस में न मिलें, तो जबरदस्ती न करें। इसकी जगह आप किसी योग स्ट्रैप या रूमाल का सहारा ले सकते हैं। किसी भी व्यक्ति के घुटनों, कूल्हों, कंधों, कलाई या गर्दन में गंभीर दर्द या चोट है, तो यह आसन न करें।

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परिवृत्त बद्ध पार्श्वकोणासन क्या है? जानिए फायदे और सावधानियां

परिवृत्त बद्ध पार्श्वकोणासन क्या है? जानिए फायदे और सावधानियां

नई दिल्ली। भारतीय योग परंपरा में शारीरिक लचीलापन, मानसिक एकाग्रता को एक साथ साधने वाले आसनों में 'परिवृत्त बद्ध पार्श्वकोणासन' का विशेष स्थान है। यह आसन मुख्य रूप से रीढ़ की हड्डी के ट्विस्ट और हाथों की बंध स्थिति का एक अनूठा संगम है। यह आसन पार्श्वकोणासन का ही एक अधिक चुनौतीपूर्ण और लाभकारी रूप है। संस्कृत में 'परिवृत्त' का अर्थ है घूमा हुआ, 'बद्ध' का अर्थ है बंधा हुआ और 'पार्श्वकोण' का अर्थ है बगल का कोण। इस आसन में शरीर को एक तरफ घुमाते हुए गहरा बंध लगाया जाता है, जो शरीर को एक नया आकार और ऊर्जा देता है। यह न सिर्फ शरीर के निचले हिस्से (पैरों और जांघों) को मजबूती प्रदान करता है, बल्कि पाचन तंत्र की गहरी मालिश कर शरीर को अंदर से डिटॉक्सिफाई (विषमुक्त) करने में भी सहायक होता है। आयुष मंत्रालय के अनुसार, यह आसन शरीर में संतुलन, मानसिक दृढ़ता और आंतरिक अंगों की शुद्धि के लिए बेहद प्रभावी माना गया है। यह सिर्फ एक स्ट्रेचिंग एक्सरसाइज नहीं है बल्कि यह पाचन तंत्र को सक्रिय करने, रीढ़ की हड्डी में लचीलापन लाने और शरीर के भीतर जमा टॉक्सिन्स को बाहर निकालने का एक शक्तिशाली अभ्यास है। यह आसन पार्श्वकोणासन का ही एक अधिक चुनौतीपूर्ण और लाभकारी रूप है। यह आसन पाचन तंत्र को भी मजबूत बनाता है। इसे करने के दौरान पेट के अंगों पर गहरा दबाव पड़ता है, जिससे मेटाबॉलिज्म तेज होता है, कब्ज व ब्लोटिंग दूर होती है और शरीर से टॉक्सिन्स आसानी से बाहर निकलते हैं। यह रीढ़ की हड्डी के रोटेशन को बढ़ाता है, जिससे पीठ और कमर की जकड़न दूर होती है। यह क्वाड्रिसेप्स, हैमस्ट्रिंग, घुटनों और टखनों को मजबूत करता है। हाथों के बंधने और छाती के खुलने से फेफड़ों की कार्यक्षमता बेहतर होती है और गहरी सांस लेने में मदद मिलती है। यह आसन शरीर में मणिपुर चक्र को सक्रिय करता है, जिससे व्यक्ति में आत्मविश्वास, इच्छाशक्ति और मानसिक एकाग्रता का विकास होता है। यदि किसी व्यक्ति के घुटनों, कंधों, रीढ़ की हड्डी या गर्दन में कोई हालिया चोट या गंभीर दर्द हो, तो इस आसन को बिल्कुल न करें।

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गर्भावस्था में हाई बीपी को न करें नजरअंदाज, मां और बच्चे की सेहत के लिए समय पर जांच बेहद जरूरी

गर्भावस्था में हाई बीपी को न करें नजरअंदाज, मां और बच्चे की सेहत के लिए समय पर जांच बेहद जरूरी

नई दिल्ली। गर्भावस्था के दौरान महिलाओं को अपनी सेहत का खास ध्यान रखने की जरूरत होती है। इस दौरान शरीर में कई तरह के बदलाव होते हैं, जिनमें ब्लड प्रेशर में उतार-चढ़ाव भी शामिल है। कई बार गर्भवती महिलाएं हाई ब्लड प्रेशर यानी उच्च रक्तचाप को सामान्य समस्या समझकर नजरअंदाज कर देती हैं, लेकिन ऐसा करना मां और बच्चे दोनों के लिए खतरनाक हो सकता है।विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) के मुताबिक, गर्भावस्था में हाई ब्लड प्रेशर से जुड़ी समस्याएं मातृ मृत्यु और गंभीर स्वास्थ्य जटिलताओं की प्रमुख वजहों में शामिल हैं। ऐसे में समय पर जांच और इलाज बेहद जरूरी है। डब्ल्यूएचओ की मानें तो दुनियाभर में लगभग 10 से 15 प्रतिशत गर्भधारण में हाई ब्लड प्रेशर से जुड़ी समस्याएं सामने आती हैं। इनमें प्री-एक्लेम्पसिया जैसी गंभीर स्थिति भी शामिल है। गर्भावस्था में उच्च रक्तचाप से जुड़े विकारों के कारण हर साल दुनियाभर में लगभग 42 हजार महिलाओं की मौत होने का अनुमान है। इसके अलावा, इन समस्याओं के चलते पांच लाख से ज्यादा मृत-जन्म और नवजात शिशुओं की मौत के मामले भी सामने आते हैं। आंकड़े बताते हैं कि गर्भावस्था के दौरान ब्लड प्रेशर की नियमित जांच कितनी महत्वपूर्ण है। समय रहते समस्या की पहचान होने पर उचित इलाज और निगरानी से गंभीर जटिलताओं का खतरा कम किया जा सकता है। प्री-एक्लेम्पसिया गर्भावस्था से जुड़ी एक गंभीर स्थिति है, जिसमें आमतौर पर 20 सप्ताह के बाद हाई ब्लड प्रेशर विकसित होता है और इसके साथ शरीर के अंगों, खासकर किडनी या लिवर पर असर पड़ने के संकेत मिल सकते हैं। कई बार यूरिन में प्रोटीन की मात्रा भी पाई जाती है। अगर समय पर इसका पता न चले और इलाज न मिले, तो यह मां और बच्चे दोनों के लिए जानलेवा साबित हो सकता है। तेज सिरदर्द, आंखों के सामने धुंधलापन या चमक दिखाई देना, पेट के ऊपरी हिस्से में दर्द, चेहरे और हाथों में अचानक सूजन या सांस लेने में परेशानी जैसे लक्षणों को हल्के में नहीं लेना चाहिए। हालांकि, कई महिलाओं में शुरुआत में कोई स्पष्ट लक्षण नहीं दिखते। इसलिए नियमित जांच बेहद जरूरी है। डब्ल्यूएचओ ने गर्भावस्था में हाई ब्लड प्रेशर से होने वाली मौतों और जटिलताओं को रोकने के लिए 2026 से 2035 और उसके बाद तक की वैश्विक रणनीति पेश की है। इसका उद्देश्य बेहतर जांच, जरूरी दवाओं की उपलब्धता, प्रशिक्षित स्वास्थ्यकर्मियों और समय पर आपातकालीन इलाज को बढ़ावा देना है। डॉक्टर गर्भावस्था के दौरान नियमित रूप से ब्लड प्रेशर की जांच करते हैं। जरूरत पड़ने पर यूरिन में प्रोटीन की मात्रा की जांच और अन्य टेस्ट भी कराए जाते हैं। स्थिति के अनुसार डॉक्टर दवाएं देते हैं और मां-बच्चे की निगरानी करते हैं। गर्भावस्था में हाई ब्लड प्रेशर का असर बच्चे के जन्म के बाद भी बना रह सकता है। ऐसी महिलाओं में आगे चलकर हाई बीपी, दिल की बीमारी, स्ट्रोक और किडनी की समस्याओं का खतरा बढ़ सकता है। इसलिए डिलीवरी के बाद भी डॉक्टर की सलाह के अनुसार ब्लड प्रेशर की जांच कराते रहना चाहिए।

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सिर्फ महिलाओं को नहीं, पुरुषों को भी हो सकता है ब्रेस्ट कैंसर : डब्ल्यूएचओ

सिर्फ महिलाओं को नहीं, पुरुषों को भी हो सकता है ब्रेस्ट कैंसर : डब्ल्यूएचओ

नई दिल्ली। ब्रेस्ट कैंसर का नाम सुनते ही आमतौर पर हमारे मन में महिलाओं की तस्वीर आती है। लेकिन, क्या आप जानते हैं कि पुरुष भी इस बीमारी की चपेट में आ सकते हैं? विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) के मुताबिक, ब्रेस्ट कैंसर के करीब 99 प्रतिशत मामले महिलाओं में पाए जाते हैं, जबकि लगभग 0.5 से 1 प्रतिशत मामले पुरुषों में होते हैं। संख्या भले ही कम हो, लेकिन इसका मतलब यह बिल्कुल नहीं है कि पुरुषों में इस बीमारी का खतरा नजरअंदाज कर दिया जाए। हर साल अक्टूबर को 'ब्रेस्ट कैंसर जागरूकता माह' के रूप में मनाया जाता है। इसका मकसद लोगों को बीमारी के बारे में जागरूक करना, समय पर पहचान और इलाज के महत्व को समझाना और इससे प्रभावित लोगों को समर्थन देना है। महिलाओं की तुलना में पुरुषों में ब्रेस्ट कैंसर के मामले काफी कम होते हैं। इसी वजह से कई बार पुरुष अपने शरीर में होने वाले बदलावों को गंभीरता से नहीं लेते। ब्रेस्ट में गांठ, निप्पल के आसपास बदलाव, निप्पल से किसी तरह का स्राव या त्वचा में असामान्य परिवर्तन जैसे लक्षण दिखाई दें तो इन्हें नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। सबसे जरूरी बात यह है कि पुरुषों में ब्रेस्ट कैंसर का इलाज भी बीमारी की स्थिति और उसके प्रकार के आधार पर किया जाता है। डब्ल्यूएचओ के अनुसार, पुरुषों में ब्रेस्ट कैंसर का उपचार महिलाओं में अपनाए जाने वाले इलाज के सिद्धांतों के अनुरूप ही होता है। इसी कारण पुरुषों के लिए भी समय पर डॉक्टर से सलाह लेना बेहद जरूरी है। ब्रेस्ट कैंसर के खिलाफ लड़ाई में शुरुआती पहचान को सबसे अहम माना जाता है। अगर बीमारी शुरुआती चरण में पकड़ में आ जाए तो समय पर इलाज शुरू किया जा सकता है। यही वजह है कि लोगों को शरीर में होने वाले असामान्य बदलावों के प्रति जागरूक रहने की जरूरत है। दुनियाभर में ब्रेस्ट कैंसर महिलाओं में सबसे ज्यादा पाए जाने वाले कैंसरों में शामिल है। साल 2022 में करीब 23 लाख महिलाओं में ब्रेस्ट कैंसर का पता चला था, जबकि लगभग 6.70 लाख महिलाओं की इस बीमारी से मौत हुई। हालांकि, इलाज और सर्वाइवल की स्थिति अलग-अलग देशों में काफी अलग है। इसका एक बड़ा कारण शुरुआती जांच, सही समय पर बीमारी की पहचान और प्रभावी इलाज तक समान पहुंच का न होना है।

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