भविष्य की आहट: लाठी की दम पर भैंस बांधता अमेरिका

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डॉ. रवीन्द्र अरजरिया
वर्तमान समय में समूचा संसार कलह के दावानल के मध्य जीवन की भीख मांग रहा है। कहीं सबल देशों द्वारा स्वार्थ की बुनियाद पर स्वयं का शीशमहल खडा करने की आकांक्षा तले अपेक्षाकृत निर्बल देशों पर खुला अत्याचार किया जा रहा है तो कहीं पर्दे के पीछे बैठी मीरजाफरों की फौज से अशान्ति फैलवाई जा रही है। कहीं कट्टरता को हथियार बनाकर सौहार्द को नस्तनाबूद करने की कोशिशें हो रहीं है तो कहीं कट्टरता को सरलता में बदलने के चल रहे प्रयासों को दबाया जा रहा है। कहीं राष्ट्रीय सीमाओं के विस्तार हेतु आतंक का सहारा लिया जा रहा है तो कहीं आतंक को समाप्त करने की आड में स्वार्थपरिता ठहाके लगा रही है। इन सबके पीछे डीप स्टेट, छद्मवेशधारी समूह और सम्पन्न देश का संयुक्त षडयंत्र ही उत्तरदायी है जो विश्व सम्राट बनकर समूची धरती को अपने कदमों तले रौंदने की कल्पना पाले बैठा है। बांगलादेश में कट्टरता के लिए हत्यायें हो रहीं है तो ईरान में सरलता की मांग करने वालों की लाशें बिछाई जा रहीं हैं। नेपाल, श्रीलंका जैसे देशों के हालात बद् से बद्तर होते जा रहे हैं जबकि पाकिस्तान उधार लेकर घी पीने, बीमारी की हालत में भी पहलवान को धमकी और आतंक की फैक्ट्री चलने जैसी आदतों को निरंतर विस्तार दे रहा है। चीन, अमेरिका जैसे विस्तारवादी राष्ट्र अपने हथियारों, पैसों और बल के घमंड में अन्य देशों को अस्थिर करने में लगे हैं ताकि उनकी चुनौतियां पैदा होने से पहले ही मर जायें। संयुक्त राष्ट्र संघ जैसी संस्थायें पूरी तरह से मृतप्राय हो चुकीं हैं। विलायती संस्कृति के नूतन वर्ष में अमेरिका एक बार फिर लाठी की दम पर भैंस बांधने वाले अपने 37 वर्ष पुराना इतिहास को दोहरा चुका है। ड्रग्स और हथियारों की अवैध तस्करी का आरोप लगाकर अमेरिकी सेना ने ऑपरेशन एब्सोल्यूट रिजॉल्व के दौरान वेनेजुएला के राष्ट्रपति निकोलस मादुरो और उनकी पत्नी को उनके ही बैडरूम से क्रूरतापूर्वक अगवा कर किया और न्यूयॉर्क ले गये। इसी तरह ड्रग तस्करी का आरोप लगाकर दिसम्बर 1989 में पनामा के मुखिया मैनुअल नोरिएगा को अमेरिका ने अगवा करवा लिया था। मादुरो की दयनीय हालत, प्रताडना का अमानवीय चेहरा और स्वयं की सामर्थ दिखाकर ग्रीनलैण्ड को गुलाम बनाना की दिशा में आगे बढते अमेरिका के सामने न्यायहित सीधी टक्कर लेने हेतु कोई भी राष्ट्र खडे होने का साहस नहीं कर पा रहा है। फ्रांस, जर्मनी, ब्रिट्रेन, स्वीडन, नार्वे और नीदरलैण्ड ने संयुक्त रूप से 187 सैनिक भेजकर ग्रीनलैण्ड की सुरक्षा की रस्म अदायगी जरूर कर दी है। संयुक्त राष्ट्र संघ जैसी संस्थायें तो छठवीं अगुली की तरह अप्रासांगिक हो चुकी है। शेर की तरह दहाडने वाले चीन, उत्तरी कोरिया और रूस जैसे राष्ट्र भी अब तक शब्दों से आगे की यात्रा पर नहीं निकले हैं। ग्रीनलैण्ड की विदेश मंत्री विवियन मोट्जफेल्ड तो अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के बयानों और ग्रीनलैंड पर अमेरिकी दबाव के कारण एक लाइव टीवी साक्षात्कार के दौरान भावुक होकर रो पड़ीं। मातृभूमि की स्वतंत्रता की दुहाई पर ग्रीनलैण्ड की सत्ता आज समूचे संसार से सहायता की भीख मांग रही है। वहीं दूसरी ओर भितरघाती मीरजाफर के चरित्र को आदर्श मानने वाली वेनेजुएला की विपक्षी नेता मारिया कोरीना मचाडो ने अपने नोबेल शांति पुरस्कार 2025 को एक तानाशाह ट्रंप के हाथों में सौंपकर पुरस्कार देने वाली संस्था के निर्णय को ही कटघरे में खडा कर दिया। परतंत्रता को स्वाधीनता के रूप में स्वीकारने वाली विपक्षी नेता ने बेडियों को ही गहना मान लिया है। मालूम हो कि यह पुरस्कार मारिया कोरीना मचाडो को वेनेजुएला में लोकतांत्रिक अधिकारों और तानाशाही से लोकतंत्र की ओर शांतिपूर्ण बदलाव के लिए किये गये अथक प्रयासों हेतु दिया गया था। इस पुरस्कार के लिए उचित व्यक्ति का चयन नॉर्वे की संसद द्वारा चुनी गई नॉर्वेजियन नोबेल समिति द्वारा किया जाता है जो अल्फ्रेड नोबेल की वसीयत के अनुसार होता है। स्वार्थपरिता की चरमसीमा पर पहुंच चुकी मानसिकता के कारण आज तानाशाही से निजात दिलाने के नाम पर मिलने वाला पुरस्कार एक अन्य तानाशाह के कदमों में पहुंचकर दम तोड चुका है। उधार के सिंदूर से मांग भरने वाले ट्रंप का अहंकार भले ही इसे एक उपलब्धि मान संतुष्ट हो गया हो परन्तु वेनेजुएला को गुलाम बनाने में महती भूमिका निभाने वाले उस देश के विपक्ष ने अपने राष्ट्रीय इतिहास में एक काला पन्ना जोड लिया है। उल्लेखनीय है कि अमेरिका के इशारों पर नाचने वाले मुहम्मद यूनुस को भी सन् 2006 में नोबेल शांति पुरस्कार मिला था जिसमें उनको गरीबों हेतु सूक्ष्म-ऋण उपलब्ध करवा के आर्थिक और सामाजिक विकास लाने हेतु कीर्तिमानी व्यक्ति माना गया था। इस संभावना से भी इंकार नहीं किया जा सकता कि वेनेजुएला की विपक्षी नेता मारिया कोरीना मचाडो से प्रेरित होकर आने वाले समय में मुहम्मद यूनुस भी अपना नोबेल पुरस्कार अमेरिका के राष्ट्रपति को भेंट कर दें ताकि बांगलादेश को आदर्श राष्ट्र का दर्जा मिल सके। नोबेल समिति के अनुसार पुरस्कार का हस्तांतरण नहीं किया जा सकता। ऐसे में ट्रंप को विजेता का दर्जा नहीं बल्कि केवल मारिया कोरीना मचाडो वाला मेडल रखने का सुख ही मिल पायेगा। सफेदपोश अपराधी बनकर अमेरिका ने संसार में आतंक की नई परम्परा को एक बार फिर व्यवहार में लाना शुरू कर दिया है। अमेरिका ने दुनिया के सभी देशों में अपने घुसपैठिये, स्लीपर सेल और भितरघातियों की फौज तैयार कर रखी है जो अपने-अपने राष्ट्रों को अस्थिर करने में जुटी है। अनेक देशों की वंशवादी पार्टियां, परिवारवादी संस्थायें और जन्मजात नेतृत्व सम्हालने वाले लोगों की भीड भी स्वार्थ, सुख और सम्पन्नता की मृगमारीचिका के पीछे मीरजाफर बनाकर दौड रहीं हैं। अमेरिका जैसे देश अत्याधुनिक हथियारों, परमाणु शस्त्रों और नवीन तकनीक के साथ-साथ जैविक असलहे, साइबर वैपन, इलैक्ट्रानिक बुलेट जैसे अनगिनत घातक उपकरण मानव, मानवता और मूल्यों की हत्या करने की घातक तैयारी में जुटे हैं। लाशों पर राज्य करने की मंशा से जुटे राष्ट्रों को समय रहते रोकना होगा। इस हेतु भितरघातियों की पहचान करना बेहद जरूरी हो गया है अन्यथा वेनेजुएला की घटना और ग्रीनलैण्ड के हालात का विस्तार समूचे संसार में होते देर नहीं लगेगी। इस बार बस इतना ही। अगले सप्ताह एक नई आहट के साथ फिर मुलाकात होगी।
