संसार में तीसरे विश्वयुद्ध की दस्तक तेज होती जा रही है। जीवन पर संकट के बाद मडरा रहे हैं। अहंकार, स्वार्थ और वर्चस्व की जंग में षडयंत्रकारियों की फौजें कभी साम्प्रदायिक तानाबाना बुनकर समाज को उलझाती है तो कभी जुल्म की दस्तान लिखकर उसे जायज ठहराने का काम करतीं है। कभी जन्म के आधार पर संगठनात्मक ढांचा तैयार करके व्यक्तिगत लाभ के अवसर तलाशतीं हैं तो कभी सत्ता के सिंहासन के लिए रक्त बहाने का आधार तैयार करतीं हैं। ऐसे में संसार के लिए सबसे ज्यादा घातक अमेरिका के नेतृत्व में संचालित डीप स्टेट है जो डालर जैसा अधिपत्य स्थापित करने की दिशा में निरंतर आगे बढ रहा है। भारत में भी डीप स्टेट की जडें बहुत गहराई तक पहुंच चुकीं हैं। व्यवस्था के लगभग सभी स्तम्भों पर उसकी पकड मजबूत हो चुकी है। कार्यपालिका से जुडे डीप स्टेट के लोगों के द्वारा देश को पतन के गर्त में पहुंचाने वाली योजनायें निरंतर तैयार की रहीं है। उन्हें एन-केन-प्रकारेण देश पर थोपा जा रहा है। देश की प्रतिभाओं को कुण्ठित करने, अयोग्यों के हाथों में दायित्व सौंपने तथा राष्ट्रभक्ति में डूबे लोगों का शोषण करने की गति अब तीव्रगामी हो गई है। धर्म के नाम पर, भाषा के नाम पर, क्षेत्र के नाम पर, जाति के नाम पर, व्यवसाय के नाम पर, जीवन पद्धति के नाम पर निरंतर बटवारे किये जाते रहे और विष वृक्ष की रोपित पौध को वट वृक्ष की तरह विशालतम स्वरूप दिया जा रहा है। पहले मुगलों ने फिर गोरों ने देशवासियों का खून पिया और अब स्वदेशी का जामा पहने विलायती संस्कारों में रचे-बसे लोग अपनी सशक्त अभिनय क्षमता से देश को किस्तों में गुलामी की ओर बढा रहे हैं। आन्तरिक अशान्ति की पटकथा लिखी जा चुकी है जिसका चरणबद्ध मंचन भी शुरू हो चुका है। लम्बी अवधि तक गुलामी का दंश भोगने वाले देश में अब भी जाति विशेष को शोषक और शोषित के रूप में परिभाषित किया जा रहा है। प्रतिभाशाली लोगों को जाति के आधार पर देव पुरुष के रूप में पूजित किया जा रहा है। उनके आदर्श, सिद्धान्त और शिक्षायें को हाशिये पर भेजकर पूजा करने वाले केवल और केवल विभाजन की रेखायें खींचने में लगे हैं ताकि श्रमविहीन अर्थ का संचय किया जा सके। सम्प्रदाय-जाति-क्षेत्र-भाषा आदि के आधार पर बटवारे, अयोग्य लोगों की पदस्थापना, प्रतिभाओं का पलायन, विभाजनकारी कारकों का प्रचार जैसे अनेक बिन्दु आज भारत में चरम सीमा पर पहुंचते जा रहे हैं। कभी आरक्षण, कभी पदोन्नति में प्राथमिकता, कभी जातिगत कानून, कभी धर्मगत व्यवस्था को संविधान का अंग बनाकर विश्वगुरु की सामर्थ वाले देश को पतन के गर्त में डुबोया जाता रहा। प्रतिभाविहीन के हाथों में बागडोर सौंपने से सफलता का प्रतिशत भी निम्नस्तर को स्पर्श करने लगता है। कानून के माध्यम से सामर्थवान वर्ग केहाथ बांधकर कोडे लगाने के योजनायें बनायीं जा रहीं हैं। इसी कडी में यूजीसी का नया राक्षस पैदा कर दिया गया। लगभग सभी शिक्षण संस्थानों में रैगिंग नियंत्रण समितियां जब निष्पक्षता के साथ कार्य कर रहीं थीं फिर अनावश्यक रूप से इस नये कानून की थोपने की मंशा अभी तक देश की समझ से बाहर है। अलग से थाने, अलग से कानून और अलग से व्यवस्था की जब पहले ही बना दी गई थी तब पुनः नई वैमनुष्यताकारी व्यवस्था थोपना कहां तक उचित है। अब तो निजी संस्थानों में भी आरक्षण लागू कराने हेतु बिल लाने की तैयारियां लगभग पूर्ण हो चुकीं है ताकि कार्यपालिका में अयोग्य लोगों की भर्ती के बाद देश के निजी क्षेत्रों की क्षमताओं पर भी ग्रहण लाया जा सके। इस तरह के प्रयास वोटबैंक बढाने, सिंहासन पर काबिज रहने और निजी लाभ कमाने के लिए विदेशी इशारे पर सत्ता के गलियारे से हमेशा से ही होते रहे हैं। वर्तमान सरकार भी इसका अपवाद नहीं है। यूजीसी जैसे सांप-छछूंदर वाले खूनी कानून को लागू कराने के पीछे भी सत्ता के गलियारे में मौजूद भितरघातियों की भूमिका के इंकार नहीं किया जा सकता। मीरजाफरों की जमातें कार्यपालिका से लेकर विधायिका तक के अधिकारों का दुरुपयोग कर रहे हैं। ऐसे लोगों का धर्म केवल और केवल विलासता हेतु धन संचय, सम्मान संचय, बल संचय और प्रभाव संचय तक ही सीमित है। जहां संसार में विघटनकारी ताकतों के अहंकार से उपजा खूनी टकराव निरंतर चरमसीमा पर पहुंचता जा रहा है, आम आवाम की सांसें टूट रहीं है, विकास पथ पर कटीले तार बिछाये जा रहे हैं, क्रियाओं-प्रतिक्रियाओं का कष्टप्रद आदान-प्रदान हो रहा है, संबंधों की दुहाई पर विफोटकों को आमंत्रण दिया जा रहा है तो वहीं देश में मनमानियों के दुःखद परिणामों पर सरकारी दायित्वों के नारे बुलंद हो रहे हैं, अधिकारों की गुंज संचार माध्यमों पर प्रसारित की जा रही है, असामाजिक तत्वों के गिरोहों का गैंगवार हो रहा है, श्रद्धा को अन्धविश्वास बनाकर परोसा जा रहा है, धार्मिक ग्रन्थों की षडयंत्र भरी विवेचनायें की जा रहीं हैं, धार्मिक-जातिगत उन्माद फैलाया जा रहा है। इन सब के पीछे डीप स्टेट का षडयंत्र और धनबल, लालचियों की स्वार्थपरिता और भीडबल, सत्तालोलुपों का अहंकार और सत्ताबल, व्यवस्था से जुडे लोगों की विलासता और अधिकारबल जैसे कारक हमेशा से ही राष्ट्रहितों पर जलकुम्भी बनकर छाये रहे हैं जो अब नियंत्रणविहीन विस्तारित होकर बेहद घातक हो चुके हैं। सिंहासन के नीचे पूरी तरह से बारूद बिछाई जा चुकी है। अवहेलना की कोई भी मानसिकता विस्फोट के लिए उत्तरदायी हो सकती है। कथित बुद्धिजीवियों की जमातें निहित स्वार्थ के लिए अपनी ही डाल को काटने में जुटी है। ऐसे में यह कहना अतिशयोक्ति न होगा कि दुनिया के हालातों के साथ-साथ देश की आन्तरिक स्थित भी डीप स्टेट के घातक षडयंत्र की भेंट चढ चुकी है। षडयंत्र की विभीषिका तले अनियंत्रित होते हालातों का स्थाई समाधान ढूंढने हेतु अब आम आवाम को ही आगे आना पडेगा तभी विचारों की क्रान्ति से शान्ति का आह्वान किया जा सकेगा। इस बार बस इतना ही। अगले सप्ताह एक नई आहट के साथ फिर मुलाकात होगी।
षडयंत्र की विभीषिका तले अनियंत्रित होते हालात

File Photo
PeptechTime
15 मार्च 2026, 06:12 am IST
PeptechTime15 मार्च 2026, 06:12 am IST
