Wednesday, February 25, 2026

LOGO

BREAKING NEWS
देशनई दिल्लीऐतिहासिक पृष्ठभूमि में पीएम मोदी का इजरायल दौरा: बदलते रिश्तों की नई परिभाषा

ऐतिहासिक पृष्ठभूमि में पीएम मोदी का इजरायल दौरा: बदलते रिश्तों की नई परिभाषा

Post Media
News Logo
PeptechTime
25 फ़रवरी 2026, 11:15 am IST
Share on FacebookShare on WhatsAppShare on Twitter/XOpen Instagram
Copy Link

Advertisement

नई दिल्ली। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की नौ साल बाद इजरायल यात्रा कई मायनों में अहम है। दोनों ही देश रणनीतिक साझेदारी की बात कर रहे हैं। उम्मीदें दोनों पक्षों को एक दूसरे से खूब हैं। इसकी वजह भी है। इस बार प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की इजरायल यात्रा को केवल एक द्विपक्षीय कार्यक्रम के रूप में नहीं देखा जा सकता, बल्कि यह भारत-इजरायल संबंधों की उस लंबी ऐतिहासिक यात्रा का हिस्सा है जो वैचारिक दूरी से रणनीतिक साझेदारी तक पहुंची है।


आज जब इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू कहते हैं ये दौरा ऐतिहासिक होगा और राष्ट्रपति आइजैक हर्जोग स्वागत करने को उत्सुक होने की बात करते हैं, नई दिल्ली और तेल अवीव रक्षा, तकनीक और व्यापार के क्षेत्रों में सहयोग को नई ऊंचाइयों तक ले जाने की बात कर रहे हैं, तब यह समझना जरूरी हो जाता है कि यह रिश्ता किन चरणों से होकर गुजरा है।


1948 में इजरायल गठन के बाद भारत ने लंबे समय तक सतर्क और संतुलित रुख अपनाया। स्वतंत्र भारत की विदेश नीति पर गुटनिरपेक्ष आंदोलन और अरब देशों के साथ ऊर्जा और प्रवासी भारतीयों से जुड़े हितों का गहरा प्रभाव था। 1949 में भारत ने संयुक्त राष्ट्र में इजरायल की सदस्यता के सवाल पर समर्थन नहीं दिया। हालांकि 1950 में भारत ने औपचारिक रूप से इजरायल को मान्यता दे दी, लेकिन पूर्ण राजनयिक संबंध स्थापित करने में चार दशक लग गए। बदलाव 1992 में आया, जब शीत युद्ध की समाप्ति और बदलते वैश्विक समीकरणों के बीच भारत ने इजरायल के साथ पूर्ण राजनयिक संबंध स्थापित किए।


1990 के दशक के बाद से रक्षा सहयोग इस रिश्ते का केंद्रीय स्तंभ बन गया। कारगिल संघर्ष के दौरान इजरायल से मिली त्वरित सैन्य सहायता ने दोनों देशों के बीच भरोसे को मजबूत किया। इसके बाद ड्रोन, मिसाइल सिस्टम, रडार और निगरानी तकनीक जैसे क्षेत्रों में सहयोग बढ़ता गया।


21वीं सदी के दूसरे दशक में यह संबंध और खुलकर सामने आया। 2017 में पीएम मोदी इजरायल की यात्रा करने वाले पहले भारतीय प्रधानमंत्री बने, जिसे प्रतीकात्मक और व्यावहारिक—दोनों स्तरों पर महत्वपूर्ण माना गया। उस यात्रा ने यह संकेत दिया कि भारत अब अपने पश्चिम एशिया नीति ढांचे में ‘डि हायफनेशन’ यानी इजरायल और फिलिस्तीन के संबंधों को अलग-अलग ट्रैक पर देखने की नीति अपना रहा है।


आर्थिक संबंध भी इसी अवधि में मजबूत हुए। 1992 में लगभग 20 करोड़ डॉलर के आसपास रहा द्विपक्षीय व्यापार बढ़कर कई अरब डॉलर तक पहुंच चुका है। कृषि, जल प्रबंधन और उच्च तकनीक के क्षेत्रों में इजरायल की विशेषज्ञता का उपयोग भारत के विभिन्न राज्यों में किया जा रहा है। माइक्रो-इरिगेशन और जल संरक्षण परियोजनाएं इसका उदाहरण हैं। स्टार्टअप और नवाचार के क्षेत्र में सहयोग को भविष्य की दिशा माना जा रहा है।


पीएम मोदी की वर्तमान यात्रा ऐसे समय में हो रही है जब पश्चिम एशिया क्षेत्र अस्थिरता और पुनर्संरचना के दौर से गुजर रहा है। क्षेत्रीय तनाव, वैश्विक शक्ति संतुलन में बदलाव और नई आर्थिक गलियारों की अवधारणा ने भारत के लिए इस क्षेत्र के महत्व को और बढ़ा दिया है। भारत एक ओर इजरायल के साथ रणनीतिक और तकनीकी साझेदारी को गहरा कर रहा है, तो दूसरी ओर फिलिस्तीन के समर्थन की अपनी पारंपरिक नीति को भी औपचारिक रूप से बनाए हुए है। यही संतुलन भारत की विदेश नीति की विशेषता बनकर उभरा है।


ऐतिहासिक संदर्भों को देखें तो स्पष्ट होता है कि भारत-इजरायल संबंध वैचारिक दूरी, व्यावहारिक सहयोग और अब व्यापक रणनीतिक भागीदारी के चरणों से गुजरते हुए आज के रणनीतिक साझेदारी तक पहुंचा है। पीएम मोदी की यह यात्रा उसी विकसित होते संबंध का नवीन अध्याय है, और ऐसा इजरायल भी मानता है।

Today In JP Cinema, Chhatarpur (M.P.)