जजों का तबादला न्यायपालिका का आंतरिक मामला, सरकार का दखल अस्वीकार्य

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पुणे। सुप्रीम कोर्ट के जज जस्टिस उज्ज्वल भुइयां ने शनिवार को स्पष्ट शब्दों में कहा कि जजों का तबादला न्यायपालिका का आंतरिक मामला है और इसमें सरकार या केंद्र की कोई भूमिका नहीं होनी चाहिए। उन्होंने कहा कि सरकार के खिलाफ फैसले देने वाले जजों का तबादला करना न्यायपालिका की स्वतंत्रता पर सीधा हस्तक्षेप
है।
जस्टिस भुइयां पुणे के ILS लॉ कॉलेज में आयोजित प्रिंसिपल जी.वी. पंडित मेमोरियल लेक्चर को संबोधित कर रहे थे। इस दौरान उन्होंने कॉलेजियम सिस्टम, न्यायिक स्वतंत्रता और संविधान की सर्वोच्चता जैसे अहम मुद्दों पर खुलकर अपनी बात रखी।
कॉलेजियम की निष्पक्षता पर उठाए सवाल
जस्टिस भुइयां ने कहा कि यदि कॉलेजियम के प्रस्ताव में ही यह दर्ज हो कि किसी जज का तबादला केंद्र सरकार के पुनर्विचार के कारण किया गया, तो यह कॉलेजियम प्रणाली की निष्पक्षता पर गंभीर सवाल खड़े करता है। उन्होंने इसे न्यायपालिका की स्वायत्तता के लिए दुर्भाग्यपूर्ण करार दिया।
हाईकोर्ट जजों के तबादले में सरकार का दखल नहीं
उन्होंने दो टूक कहा कि हाईकोर्ट जजों के ट्रांसफर या पोस्टिंग में केंद्र सरकार का कोई अधिकार नहीं है। यह पूरी तरह न्यायपालिका के अधिकार क्षेत्र में आता है और इसका उद्देश्य केवल न्याय के बेहतर प्रशासन से जुड़ा होना चाहिए। कॉलेजियम के फैसलों पर कार्यपालिका के प्रभाव की खुली स्वीकारोक्ति न्यायिक व्यवस्था के लिए खतरे की घंटी है।
संविधान सर्वोच्च है, संसद नहीं
अपने संबोधन में जस्टिस भुइयां ने यह भी कहा कि देश के संविधान निर्माताओं ने संसद की संप्रभुता के बजाय संविधान की सर्वोच्चता को चुना था। भारत में संसद सर्वोच्च नहीं है, बल्कि संविधान सर्वोच्च है और सभी संस्थाओं को उसी के दायरे में काम करना चाहिए।
जस्टिस अतुल श्रीधरन के ट्रांसफर का मामला चर्चा में
अक्टूबर 2025 में सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम ने मध्य प्रदेश हाईकोर्ट के जज जस्टिस अतुल श्रीधरन का ट्रांसफर छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट से बदलकर इलाहाबाद हाईकोर्ट करने की सिफारिश की थी। कॉलेजियम के बयान में यह दर्ज था कि यह बदलाव केंद्र सरकार के पुनर्विचार अनुरोध के बाद किया गया।
छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट में जस्टिस श्रीधरन सीनियरिटी के आधार पर कॉलेजियम का हिस्सा बनते, जबकि इलाहाबाद हाईकोर्ट में उनकी सीनियरिटी अपेक्षाकृत काफी नीचे होती। यह फैसला इसलिए भी चर्चा में रहा, क्योंकि जस्टिस श्रीधरन की पहचान एक स्वतंत्र और निडर जज के रूप में रही है। उन्होंने BJP मंत्री विजय शाह के खिलाफ कर्नल सोफिया कुरैशी पर की गई टिप्पणी के मामले में स्वतः संज्ञान लेते हुए FIR दर्ज करने का आदेश दिया था।
न्यायपालिका की स्वतंत्रता पर बड़ा संदेश
जस्टिस उज्ज्वल भुइयां के इस बयान को न्यायपालिका की स्वतंत्रता के पक्ष में एक मजबूत संदेश के रूप में देखा जा रहा है। उनका कहना साफ है कि जजों के तबादले न्यायिक कारणों से होने चाहिए, न कि राजनीतिक या कार्यपालिका के दबाव में।
