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भारत अब केवल आयातक नहीं रहा बल्कि निर्यातक देश बन रहा

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27 जनवरी 2026, 03:00 pm IST
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नई दिल्ली। रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने नागपुर की इकाई से पिनाका निर्देशित रॉकेट प्रणाली की पहली खेप को रवाना किया। यह खेप ऑर्मेनिया के लिए है और इसे भारत की उभरती सामरिक क्षमता और वैश्विक भरोसे का ठोस संकेत माना जा रहा है। बता दें बहु नली रॉकेट लांचर पिनाका अपनी सटीकता और लंबी मारक क्षमता के लिए प्रसिद्ध है। इसके उन्नत संस्करण अब 75 किलोमीटर तक लक्ष्य भेदने में सक्षम हैं जबकि हालिया परीक्षणों में इसकी सीमा 120 किलोमीटर तक है।


मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने कहा कि पिनाका मिसाइलों का निर्यात नागपुर स्थित सोलर डिफेंस एंड एयरोस्पेस इकाई में विकसित स्वदेशी क्षमता का प्रमाण है। उन्होंने कहा कि भारत अब केवल आयातक नहीं रहा बल्कि निर्यातक देश बन रहा है। निजी क्षेत्र की बढ़ती भागीदारी का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि जहां दस साल पहले रक्षा निर्यात एक हजार करोड़ रुपए से भी कम था वहीं अब यह बढ़कर 24 हजार करोड़ रुपए के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गया है। इसी अवधि में घरेलू रक्षा उत्पादन 2014 के 46 हजार 425 करोड़ रुपए से बढ़कर 1.51 लाख करोड़ रुपए के स्तर पर पहुंच गया है।


बता दें भारतीय थल सेना पहले ही पिनाका एमके वन एन्हांस्ड संस्करण को अपने बेड़े में शामिल कर चुकी है। यह प्रणाली मूल रूप से 37.5 किलोमीटर की मारक क्षमता के साथ विकसित हुई थी लेकिन समय के साथ इसमें लगातार सुधार हुआ। अब सेना करीब 2500 करोड़ रुपए के प्रस्ताव के तहत 120 किलोमीटर मारक क्षमता वाले रॉकेट शामिल करने की तैयारी में है। दिसंबर 2025 में इन रॉकेटों का सफल परीक्षण किया गया और खास बात यह है कि इन्हें उसी लांचर से दागा जा सकता है जिससे अभी 40 और 75 किलोमीटर तक के लक्ष्य साधे जाते हैं।


पिनाका का विकास 1980 के दशक के अंत में डीआरडीओ ने रूसी ग्राड प्रणाली के विकल्प के रूप में शुरू किया था। आज इसे टाटा एडवांस्ड सिस्टम्स, सोलर इंडस्ट्रीज, म्यूनिशन्स इंडिया लिमिटेड और इकनॉमिक एक्सप्लोसिव्स जैसी भारतीय इकाइयों की मदद से तैयार किया जा रहा है। साथ ही पिनाका के अलावा भारत अपनी स्वदेशी आकाश मिसाइल प्रणाली भी निर्यात के लिए पेश कर रहा है। ऑपरेशन सिंदूर में इसकी क्षमता सामने आने के बाद दुनिया भर में इसके प्रति रुचि बढ़ी है। बता दें कि ऑर्मेनिया को नवंबर 2024 में 15 प्रणालियों के 720 मिलियन डॉलर के सौदे के तहत पहली बैटरी मिली थी। फिलीपींस, मिस्र और वियतनाम जैसे देशों ने भी इसमें रुचि दिखाई है।


रक्षा क्षेत्र के लिए वर्ष 2025 को सुधारों का वर्ष कहा गया है और इसके पीछे ठोस वजह हैं। गत साल भारत ने साइबर, अंतरिक्ष, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, मशीन लर्निंग, अतितीव्र गति और रोबोटिक्स जैसे नए क्षेत्रों में उल्लेखनीय उपलब्धियां दर्ज कीं। डीआरडीओ ने लंबी दूरी की जहाज रोधी मिसाइल परियोजना के तहत हाइपरसोनिक ग्लाइड वाहन और ट्रांसपोर्टर इरेक्टर लांचर का प्रदर्शन किया। आज भारत का रक्षा उत्पादन करीब 1.50 लाख करोड़ पर है जिसमें करीब 23 फीसदी योगदान निजी क्षेत्र का है। करीब 16 हजार सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यम इस आपूर्ति शृंखला का हिस्सा हैं। यह पारिस्थितिकी तंत्र केवल रोजगार नहीं दे रहा बल्कि नवाचार को भी गति दे रहा है। ब्रह्मोस मिसाइल इसका एक और उदाहरण है जिसकी मांग अब दक्षिण पूर्व एशिया, अफ्रीका और पश्चिम एशिया तक फैल रही है।


डीआरडीओ एक वैश्विक एयरोस्पेस कंपनी के साथ 120 केएन एयरो इंजन के सह विकास की तैयारी में है। परियोजना पी 751 के तहत छह पनडुब्बियों का निर्माण भी सहयोगी मॉडल पर होगा। देखा जाये तो नीतिगत स्तर पर रक्षा अधिग्रहण प्रक्रिया में बदलाव और डीपीएम का लागू होना निर्णय प्रक्रिया को तेज करेगा। आज स्वदेशी उत्पादन देश की करीब 65 फीसदी रक्षा जरूरतें पूरी कर रहा है जो एक दशक पहले की स्थिति से बड़ा बदलाव है। हालांकि अगली पीढ़ी के इंजन, स्टेल्थ तकनीक और रणनीतिक इलेक्ट्रानिक्स जैसे क्षेत्रों में अभी और काम बाकी है। फिर भी लागत प्रभावी और तकनीकी रूप से सक्षम प्रणालियों के कारण भारत अपने समकक्ष देशों से सीधे प्रतिस्पर्धा करने की स्थिति में आ चुका है। देखा जाये तो पिनाका की खेप के साथ शुरू हुई यह यात्रा केवल शुरुआत है। जैसे जैसे भारतीय हथियार वैश्विक युद्धक्षेत्रों में अपनी उपयोगिता सिद्ध करेंगे वैसे वैसे दुनिया का भरोसा और मजबूत होगा।

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