भोपाल, आयुष शुक्ला। "मैं न टायर्ड हूं, न रिटायर्ड हूं…" पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की ये पंक्तियां आज राज्यसभा में एक बार फिर गूंज उठीं। मौका था 59 सांसदों की विदाई का, लेकिन इस विदाई के बीच एक ऐसा संबोधन रहा, जिसने पूरे सदन का ध्यान अपनी ओर खींच लिया।

मध्यप्रदेश से कांग्रेस के वरिष्ठ नेता दिग्विजय सिंह ने अपने विदाई भाषण में अटल जी की इन पंक्तियों को दोहराते हुए साफ संकेत दिया कि सियासत में उनका सफर अभी थमा नहीं है। करीब पांच दशक का राजनीतिक अनुभव। 22 साल की उम्र में शुरुआत और 10 साल तक मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री रहने का लंबा कार्यकाल। अपने इस आखिरी राज्यसभा संबोधन में दिग्विजय सिंह ने न सिर्फ अपने सफर को याद किया, बल्कि लोकतंत्र, विचारधारा और मौजूदा राजनीतिक हालात पर भी विस्तार से अपनी बात रखी। आखिर क्या कहा उन्होंने… और कैसा रहा उनका पूरा राजनीतिक सफर, देखिए इस खास रिपोर्ट में…


राज्यसभा के इस विदाई सत्र में जब दिग्विजय सिंह बोलने के लिए खड़े हुए, तो उनका संबोधन एक राजनीतिक बयान से ज्यादा एक अनुभव साझा करने जैसा नजर आया। उन्होंने अपने भाषण में कहा कि उन्होंने अपने पूरे राजनीतिक जीवन में अपना रास्ता खुद तय किया और अपनी विचारधारा से कभी समझौता नहीं किया।

इस दौरान उन्होंने पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की एक प्रसिद्ध पंक्ति का उल्लेख करते हुए कहा- "मैं न टायर्ड हूं, न रिटायर्ड हूं…", जिसके जरिए उन्होंने अपने आगे भी सक्रिय रहने के संकेत दिए। अपने संबोधन के अंत में उन्होंने संत कबीरदास की पंक्तियां दोहराईं- "कबिरा खड़ा बाजार में मांगे सबकी खैर, न काहू से दोस्ती, न काहू से बैर"- और इसे अपने राजनीतिक जीवन के मूल सिद्धांत के रूप में प्रस्तुत किया।


राजनीतिक सफर: क्रमबद्ध विकास

दिग्विजय सिंह ने अपने राजनीतिक जीवन की शुरुआत के बारे में बताते हुए कहा कि छात्र जीवन में उनका राजनीति से सीधा संबंध नहीं था, लेकिन परिस्थितियों के चलते वे 22 वर्ष की आयु में सर्वसम्मति से नगर पालिका अध्यक्ष चुने गए। इसके बाद उनका राजनीतिक सफर लगातार आगे बढ़ता गया- 30 वर्ष की उम्र में विधायक 33 वर्ष में मंत्री और 46 वर्ष की उम्र में मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री - उन्होंने बताया कि इस पूरे सफर में उन्होंने हमेशा अपनी विचारधारा को प्राथमिकता दी।


मुख्यमंत्री कार्यकाल (1993–2003):
दिग्विजय सिंह का मुख्यमंत्री कार्यकाल लगभग 10 वर्षों तक चला, जिसे राज्य की राजनीति में एक महत्वपूर्ण दौर माना जाता है। इस अवधि में पंचायतों को अधिक अधिकार देने और स्थानीय स्तर पर शासन को मजबूत करने की दिशा में पहल की गई। ग्रामीण भागीदारी बढ़ाने पर जोर दिया गया। प्राथमिक शिक्षा को बढ़ावा देने के लिए विभिन्न योजनाएं शुरू की गईं, जिनका उद्देश्य ग्रामीण और वंचित वर्गों तक शिक्षा पहुंचाना था।

हालांकि, इस कार्यकाल के दौरान सड़क, बिजली और पानी जैसी बुनियादी सुविधाओं को लेकर सरकार को आलोचना का सामना भी करना पड़ा। यह मुद्दे बाद में चुनावी राजनीति में भी प्रमुख रहे।


राजनीतिक संबंध और कार्यशैली

अपने भाषण में दिग्विजय सिंह ने कहा कि उन्होंने कभी व्यक्तिगत कटुता नहीं रखी। विचारधारात्मक मतभेद होने के बावजूद उन्होंने सभी दलों के नेताओं के साथ संवाद बनाए रखा। उन्होंने यह भी उल्लेख किया कि उन्हें राजीव गांधी, इंदिरा गांधी और चंद्रशेखर जैसे नेताओं के साथ काम करने का अवसर मिला, जिससे उनके राजनीतिक दृष्टिकोण को आकार मिला।


दिग्विजय सिंह ने अपने संबोधन में संसद में संवाद और चर्चा के महत्व पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि लोकतंत्र की मजबूती के लिए सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच संवाद आवश्यक है। उन्होंने यह भी कहा कि वर्तमान समय में समाज में बढ़ती साम्प्रदायिक कटुता चिंता का विषय है और यह लोकतांत्रिक मूल्यों तथा संविधान की भावना के अनुरूप नहीं है।


राज्यसभा से विदाई के इस मौके पर दिग्विजय सिंह का संबोधन उनके लंबे राजनीतिक अनुभव और दृष्टिकोण को सामने लाता है। अब देखना होगा कि सक्रिय राजनीति में उनका अगला कदम क्या होता है, लेकिन इतना तय है कि उनका यह सफर भारतीय राजनीति के एक महत्वपूर्ण अध्याय के रूप में याद किया जाएगा।