सागर, जीशान खान। जिस राशन के एक-एक दाने का हिसाब सरकार रखने का दावा करती है, सागर में उसी राशन के 673 टन का हिसाब गड़बड़ा गया। शहर की पांच उचित मूल्य दुकानों की जांच में उठाव, वितरण और मौके पर मौजूद खाद्यान्न के रिकॉर्ड में ऐसा अंतर सामने आया है कि पूरा सार्वजनिक वितरण सिस्टम सवालों के घेरे में आ गया है। जांच में करीब 6 लाख 72 हजार 792 किलो खाद्यान्न अपयोजित पाया गया है। इसकी कीमत करीब 50.37 लाख रुपए बताई गई है। हितग्राहियों की शिकायतों के बाद कलेक्टर प्रतिभा पाल ने मामले को गंभीरता से लेते हुए जांच के निर्देश दिए। खाद्य विभाग की जांच आगे बढ़ी तो राशन दुकानों के रिकॉर्ड की परतें खुलने लगीं। कहीं स्टॉक गायब मिला, कहीं उठाव और वितरण के आंकड़े मेल नहीं खाए और कहीं दुकान के पुराने विक्रेता के कार्यकाल का ही बड़ा खाद्यान्न अंतर सामने आ गया। कलेक्टर के निर्देश के बाद पांचों दुकानों को निलंबित किया गया और संबंधित विक्रेताओं के खिलाफ पुलिस में एफआईआर दर्ज कराई गई है।


मामला इसलिए और गंभीर है क्योंकि यह कोई एक-दो बोरी राशन की गड़बड़ी नहीं है। जांच में सामने आए आंकड़े हजारों किलो से बढ़कर लाखों किलो तक पहुंच रहे हैं। सुबेदार-01 की दुकान में अकेले पूर्व विक्रेता के कार्यकाल से 5.60 लाख किलो खाद्यान्न का अंतर दर्ज किया गया है। ऐसे में सवाल सिर्फ यह नहीं है कि राशन किसने गायब किया, सवाल यह भी है कि इतनी बड़ी कमी निगरानी तंत्र की आंखों के सामने कितने समय तक छिपी रही?


शिकायतों का सिलसिला इस कार्रवाई की पहली कड़ी बना। राशन नहीं मिलने, वितरण में धांधली और दुकानों के समय पर नहीं खुलने की शिकायतें जनसुनवाई और सीएम हेल्पलाइन तक पहुंच रही थीं। समाचार पत्रों में भी शिकायतें प्रकाशित हुईं। कलेक्टर ने शिकायतों को गंभीरता से लिया और खाद्य विभाग को जांच के निर्देश दिए। सहायक आपूर्ति अधिकारी चारू जैन और प्रभारी सहायक आपूर्ति अधिकारी अभिषेक मोर ने संबंधित दुकानों की जांच की। जांच में सिर्फ रजिस्टर की एंट्री पर भरोसा नहीं किया गया। दुकान में दर्ज स्टॉक और वास्तविक उपलब्ध खाद्यान्न का मिलान किया गया। यहीं से गड़बड़ी का असली आकार सामने आया। जांच रिपोर्ट में स्टॉक संधारण में लापरवाही, दुकान समय पर नहीं खोलना, उठाव की तुलना में हितग्राहियों को वितरण में भारी अंतर और मौके पर खाद्यान्न उपलब्ध नहीं होने जैसी गंभीर अनियमितताएं दर्ज की गईं।


सुबेदार-01 की दुकान सबसे बड़ा सवाल खड़ा करती है। यहां वर्तमान विक्रेता ध्रुव रजक के संबंध में 2,236 किलो खाद्यान्न का अंतर दर्ज किया गया है, जिसकी कीमत करीब 1.45 लाख रुपए बताई गई है। लेकिन इसी दुकान के पूर्व विक्रेता अतुल तिवारी के कार्यकाल का आंकड़ा कई गुना बड़ा है। जांच में 5,60,012 किलो खाद्यान्न का अंतर दर्ज है और इसकी कीमत 15.67 लाख रुपए बताई गई है।


यानी एक ही दुकान में वर्तमान और पूर्व विक्रेता से जुड़े आंकड़ों को मिलाकर 5.62 लाख किलो से ज्यादा खाद्यान्न जांच के घेरे में है। अब यहां सबसे बड़ा सवाल दुकान का प्रभार बदलने की प्रक्रिया पर है। जब पुराना विक्रेता हटता है और नया विक्रेता आता है तो स्टॉक का भौतिक सत्यापन होना चाहिए। यदि सत्यापन हुआ था तो इतनी बड़ी कमी उसी समय क्यों नहीं पकड़ी गई? और यदि कमी बाद में सामने आई तो जिम्मेदारी तय करने की प्रक्रिया क्या रही?


शास्त्री वार्ड की दुकान में भी आंकड़े मामूली नहीं हैं। यहां विक्रेता रमा पति अतुल तिवारी और सहायक विक्रेता अनुरोध पिता अतुल तिवारी से संबंधित रिकॉर्ड में 47,291 किलो खाद्यान्न का अंतर सामने आया है। इसकी कीमत करीब 14.55 लाख रुपए बताई गई है।


गांधीचौक वार्ड की दुकान में वर्तमान विक्रेता अनुराग पिता स्व. मदनलाल सोनी से संबंधित 3,293 किलो खाद्यान्न का अंतर दर्ज किया गया है। इसकी कीमत करीब 1.04 लाख रुपए बताई गई है। वहीं पूर्व विक्रेता अतुल तिवारी के कार्यकाल से संबंधित 24,054 किलो खाद्यान्न का अंतर सामने आया है, जिसकी कीमत करीब 7.49 लाख रुपए बताई गई है।


रामपुरा वार्ड में विक्रेता अतुल तिवारी से संबंधित 15,544 किलो खाद्यान्न का अंतर दर्ज हुआ है। इसकी कीमत करीब 4.75 लाख रुपए बताई गई है।


शिवाजीनगर वार्ड की दुकान में विक्रेता दीपक पिता सीताराम श्रीवास्तव से संबंधित 20,362 किलो खाद्यान्न का अंतर मिला है। इसकी कीमत करीब 6.47 लाख रुपए बताई गई है।


इन पांच दुकानों से जुड़े जांच आंकड़ों को जोड़ने पर 6,72,792 किलो खाद्यान्न, यानी करीब 673 मीट्रिक टन का अंतर सामने आता है। जांच में दर्ज राशियों का कुल योग करीब 50.37 लाख रुपए है।


अब सवाल यह है कि अगर यह सरकारी राशन था तो इसकी निगरानी कौन कर रहा था? राशन दुकान तक कितना खाद्यान्न पहुंचा, दुकान ने कितना उठाया, कितना बांटा और कितना बचा। इन सबका रिकॉर्ड सरकारी सिस्टम में होना चाहिए। इसके बावजूद जांच में इतना बड़ा अंतर सामने आया तो यह सिर्फ विक्रेता की कथित अनियमितता नहीं, बल्कि निगरानी व्यवस्था की प्रभावशीलता पर भी गंभीर सवाल है।


उल्लेखनीय है कि 673 टन का आंकड़ा किसी एक दिन की गड़बड़ी का परिणाम नहीं हो सकता। इतनी बड़ी मात्रा का अंतर बनने के लिए लंबे समय तक स्टॉक, वितरण और भौतिक सत्यापन के बीच विसंगति बनी रहना जरूरी है। यही वजह है कि अब जांच का दायरा सिर्फ एफआईआर तक सीमित रखने के बजाय यह पता लगाना भी जरूरी है कि संबंधित दुकानों का नियमित निरीक्षण कब-कब हुआ, स्टॉक का भौतिक सत्यापन किसने किया और निरीक्षण रिपोर्ट में क्या दर्ज किया गया। मामले में पूर्व विक्रेता का नाम सामने आना भी जांच का अहम हिस्सा है। सुबेदार-01 में पूर्व विक्रेता अतुल तिवारी से संबंधित 5,60,012 किलो और गांधीचौक में 24,054 किलो खाद्यान्न का अंतर दर्ज है। इससे दुकान के प्रभार हस्तांतरण की प्रक्रिया पर सीधे सवाल खड़े होते हैं। अगर पुराने विक्रेता से नए विक्रेता को दुकान हस्तांतरित करते समय वास्तविक स्टॉक का मिलान किया गया था, तो यह अंतर उसी समय रिकॉर्ड में आ जाना चाहिए था।


कलेक्टर प्रतिभा पाल के निर्देश के बाद प्रशासन ने पांचों दुकानों को निलंबित कर दिया है। लेकिन हितग्राहियों को राशन मिलना बंद न हो, इसके लिए इन दुकानों को नजदीकी संस्थाओं से अस्थायी रूप से अटैच किया गया है। यानी प्रशासन ने कार्रवाई के साथ वितरण व्यवस्था को बचाए रखने की कोशिश भी की है।


पुलिस में दर्ज एफआईआर में संबंधित विक्रेताओं के खिलाफ सार्वजनिक वितरण प्रणाली एवं नियंत्रण आदेश के प्रावधानों के अलावा आवश्यक वस्तु अधिनियम की धारा 3/7 तथा भारतीय न्याय संहिता 2023 की धारा 316(5) और 318(4) के तहत कार्रवाई की गई है। प्रशासन कथित रूप से अपयोजित खाद्यान्न की राशि की वसूली की प्रक्रिया भी आगे बढ़ा रहा है। लेकिन इस पूरे मामले का सबसे बड़ा सवाल एफआईआर से आगे का है। गरीब के हिस्से का राशन अगर दुकान के रिकॉर्ड से गायब हुआ है तो सिर्फ रकम की वसूली काफी नहीं होगी। यह पता लगाना जरूरी है कि कितने हितग्राहियों को उनका हक नहीं मिला, किस अवधि में खाद्यान्न का अंतर पैदा हुआ, स्टॉक सत्यापन के दौरान क्या कार्रवाई हुई और जिन अधिकारियों पर निगरानी की जिम्मेदारी थी, उनकी भूमिका क्या रही। कलेक्टर प्रतिभा पाल ने शिकायतों को गंभीरता से लेकर जांच कराई तो पांच दुकानों का यह पूरा मामला सामने आया। अब इस कार्रवाई की अगली परीक्षा यही होगी कि जांच दुकानदारों पर एफआईआर और दुकानों के निलंबन तक रुकती है या फिर उस पूरी कड़ी तक पहुंचती है जहां सरकारी राशन के उठाव से लेकर हितग्राही के हाथ तक पहुंचने के बीच निगरानी की जिम्मेदारी तय होती है। क्योंकि सवाल सिर्फ 50 लाख रुपए का नहीं है। सवाल उस 673 टन अनाज का है जो गरीबों की थाली में पहुंचना था। अगर जांच में दर्ज आंकड़े अंतिम रूप से सही साबित होते हैं तो यह सागर की सार्वजनिक वितरण प्रणाली में सामने आई बेहद गंभीर अनियमितताओं में से एक होगी। अब निगाह इस बात पर है कि प्रशासन इस पूरे मामले में कितनी गहराई तक जाता है और कथित तौर पर गायब खाद्यान्न की पूरी जिम्मेदारी आखिर किस-किस पर तय होती है।