छत्तीसगढ़/रायगढ़, रोहित तिर्की। पत्रकारिता के क्षेत्र में अपनी अलग पहचान बनाने वाले वरिष्ठ पत्रकार एवं श्रमजीवी पत्रकार आलम शेख अब हमारे बीच नहीं रहे। उनके निधन की खबर से पत्रकारिता जगत के साथ-साथ उन्हें जानने-पहचानने वाले लोगों और आम नागरिकों में गहरा शोक व्याप्त है। एक ऐसे पत्रकार का यूँ अचानक चले जाना, जिसने अपनी कलम, कैमरे और आवाज के माध्यम से समाज के अंतिम व्यक्ति तक पहुंचने का प्रयास किया, निश्चित रूप से उनके साथ काम करने वाले साथियों और उन्हें चाहने वालों के लिए बेहद पीड़ादायक क्षण है।
आलम शेख भले ही आज हमारे बीच मौजूद नहीं हैं, लेकिन उनके द्वारा की गई पत्रकारिता, कैमरे में कैद उनकी तस्वीरें, उनके समाचारों की आवाज और जनहित से जुड़े मुद्दों को उठाने का उनका अंदाज हमेशा याद किया जाएगा। इंसान दुनिया से चला जाता है, लेकिन उसके कर्म और समाज के लिए किए गए कार्य उसकी पहचान बनकर लंबे समय तक जीवित रहते हैं। आलम शेख की पत्रकारिता भी ऐसी ही याद बनकर हमेशा हमारे बीच रहेगी।
उन्होंने पत्रकारिता को केवल एक पेशा नहीं, बल्कि जनसेवा का माध्यम माना। शहर से लेकर गांव तक और गांव से भी आगे उस अंतिम छोर तक, जहां आम आदमी की आवाज अक्सर जिम्मेदार लोगों तक नहीं पहुंच पाती, वहां तक पहुंचने का प्रयास उन्होंने किया। ग्रामीणों, गरीबों और जरूरतमंदों की समस्याओं को सामने लाना उनकी पत्रकारिता का महत्वपूर्ण हिस्सा रहा।
हाथियों की खबरों से लेकर ग्रामीणों की समस्याओं तक बनी आवाज
आलम शेख ने क्षेत्र में हाथियों से जुड़ी घटनाओं और ग्रामीण क्षेत्रों की समस्याओं को प्रमुखता से उठाया। जंगल और गांव के बीच रहने वाले लोगों की परेशानियों को समझते हुए उन्होंने उन मुद्दों को अपनी खबरों के माध्यम से सामने लाने का काम किया, जिन्हें शायद मुख्यधारा में उतनी जगह नहीं मिल पाती।
कई बार किसी गांव के अंतिम छोर पर रहने वाला गरीब व्यक्ति अपनी समस्या लेकर अधिकारियों तक नहीं पहुंच पाता, लेकिन एक पत्रकार के रूप में आलम शेख उसकी आवाज बनने का प्रयास करते थे। ग्रामीणों की परेशानी हो, प्रशासन से जुड़ा कोई मुद्दा हो या फिर किसी आम व्यक्ति के साथ अन्याय—उन्होंने अपनी पत्रकारिता के माध्यम से सवाल उठाने की कोशिश की।
भ्रष्टाचार के मामलों को उजागर करने में भी रहे सक्रिय
पत्रकारिता का एक महत्वपूर्ण दायित्व व्यवस्था से सवाल करना भी है। आलम शेख ने अपने पत्रकारिता जीवन में कई ऐसे मामलों को सामने लाने का प्रयास किया, जिनमें कथित अनियमितताओं और भ्रष्टाचार के आरोप सामने आए। उनकी खबरों का उद्देश्य केवल समाचार देना नहीं, बल्कि संबंधित मुद्दों को समाज और जिम्मेदार अधिकारियों के सामने लाना भी रहा।
उनकी यही बेबाकी उन्हें दूसरे पत्रकारों से अलग पहचान देती थी। कई बार पत्रकार के सामने परिस्थितियां आसान नहीं होतीं, लेकिन जनहित से जुड़े मुद्दे को सामने लाने का साहस ही पत्रकारिता की असली ताकत माना जाता है। आलम शेख ने अपने तरीके से इस जिम्मेदारी को निभाया।
कई समाचार संस्थानों से जुड़कर निभाई पत्रकारिता की जिम्मेदारी
आलम शेख ने अपने पत्रकारिता सफर में अलग-अलग समाचार संस्थानों और मंचों के माध्यम से अपनी सेवाएं दीं। कभी स्वराज, कभी IND 24, कभी राजधानी और फिर खबर पे नज़र जैसे मंचों के माध्यम से उन्होंने अपनी पत्रकारिता की पहचान बनाई।
समाचार संस्थान बदलते रहे, मंच बदलते रहे, लेकिन जनहित के मुद्दों को सामने लाने का उनका प्रयास जारी रहा। कैमरा उनके हाथ में रहा और समाज के उन लोगों की आवाज उनकी पत्रकारिता का हिस्सा बनी, जिन्हें अपनी बात रखने के लिए अक्सर किसी सहारे की जरूरत होती है।
यही कारण है कि उन्हें एक सच्चे श्रमजीवी पत्रकार के रूप में याद किया जा रहा है। पत्रकारिता उनके लिए केवल कार्यालय, कैमरा और खबर तक सीमित नहीं थी, बल्कि लोगों के बीच जाकर उनकी समस्याओं को समझना और उनकी आवाज को सामने लाना भी था।
आज कैमरा वही है, खबरें वही हैं... बस आवाज नहीं है
आज जब आलम शेख हमारे बीच नहीं हैं, तो उनके साथ बिताए पल और उनकी पत्रकारिता से जुड़ी यादें उनके साथियों की आंखों में आंसू ला रही हैं।
वह कैमरा, जिससे उन्होंने गांवों और जंगलों की तस्वीरें दुनिया तक पहुंचाईं, आज भी वही है। वे खबरें, जिन्हें उन्होंने लोगों की समस्याओं को सामने लाने के लिए रिकॉर्ड किया, आज भी मौजूद हैं। लेकिन उस कैमरे के पीछे खड़े होकर सवाल पूछने वाली आवाज अब सुनाई नहीं देगी।
कभी किसी गांव की पगडंडी पर, कभी जंगल के बीच, कभी किसी गरीब की झोपड़ी के सामने और कभी किसी सरकारी कार्यालय के बाहर—आलम शेख पत्रकार के रूप में अपनी जिम्मेदारी निभाते नजर आते थे।
आज उनका शरीर हमारे बीच नहीं है, लेकिन उनकी पत्रकारिता उनके होने की गवाही देती रहेगी।
पत्रकारिता जगत के लिए अपूरणीय क्षति
आलम शेख का निधन केवल उनके परिवार के लिए ही नहीं, बल्कि पत्रकारिता जगत और समाज के लिए भी एक बड़ी क्षति है। एक ऐसा साथी, जो लोगों की समस्याओं को अपनी खबरों का विषय बनाता था, अब हमारे बीच नहीं है।
उनकी कमी उनके पत्रकार साथियों को हमेशा महसूस होगी। किसी खबर के लिए निकलते समय, किसी ग्रामीण की समस्या सुनते समय, किसी घटनास्थल पर कैमरा उठाते समय और किसी मुद्दे पर चर्चा करते समय उनकी यादें निश्चित रूप से साथियों को भावुक करेंगी।
कहा जाता है कि किसी व्यक्ति की असली पहचान उसके जाने के बाद उसके पीछे छूटे कार्यों से होती है। आलम शेख अपने पीछे ऐसी ही पत्रकारिता की याद छोड़ गए हैं, जिसमें आम आदमी की आवाज, ग्रामीणों की पीड़ा और समाज से जुड़े सवाल दिखाई देते हैं।
एक पत्रकार चला गया, लेकिन उसकी आवाज पीछे रह गई।
आलम शेख आज हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनकी आवाज को पूरी तरह खामोश नहीं किया जा सकता। क्योंकि जो आवाज समाज के लिए उठती है, वह किसी एक व्यक्ति के साथ खत्म नहीं होती। उनकी खबरें, उनके वीडियो, उनके द्वारा उठाए गए सवाल और लोगों के बीच बनाई गई उनकी पहचान आने वाली पीढ़ियों के लिए उनकी पत्रकारिता की कहानी कहते रहेंगे।
आलम शेख चले गए, लेकिन उनकी पत्रकारिता नहीं गई।
उनकी कलम की स्याही भले रुक गई हो, कैमरे के सामने उनकी आवाज भले अब सुनाई न दे, लेकिन जनहित के लिए उनके द्वारा उठाई गई आवाज की गूंज लंबे समय तक सुनाई देती रहेगी।
आज पत्रकारिता जगत अपने एक साथी को खोने के दर्द में है। साथी पत्रकारों की आंखों में नमी है और मन में यही सवाल है कि जो व्यक्ति कल तक हमारे साथ खबरों की दुनिया में कदम से कदम मिलाकर चल रहा था, वह आज इतनी दूर कैसे चला गया।
यही जीवन की सबसे बड़ी सच्चाई है—इंसान चला जाता है, लेकिन उसके कर्म और उसकी यादें यहीं रह जाती हैं।
आलम शेख की स्मृतियां भी हमेशा जीवित रहेंगी।
ईश्वर दिवंगत आत्मा को शांति प्रदान करें तथा शोकाकुल परिवार, परिजनों, मित्रों और पत्रकार साथियों को इस अपार दुःख को सहन करने की शक्ति दें।













