नई दिल्ली। श्री बागेश्वर धाम के पीठाधीश्वर पूज्य पं. श्री धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री जी (जिन्हें श्रद्धालु श्रद्धापूर्वक 'श्री बागेश्वर धाम सरकार' के नाम से संबोधित करते हैं) ने अपने जन्मोत्सव के पावन अवसर पर शनिवार, 4 जुलाई 2026 को नई दिल्ली के प्रतिष्ठित भारत मंडपम में अपनी नई आध्यात्मिक कृति 'मेरा संन्यासी' के हिंदी और अंग्रेज़ी संस्करणों का भव्य लोकार्पण किया। सायं 5:40 बजे आयोजित इस श्रद्धा, भक्ति एवं आध्यात्मिकता से सराबोर संध्या में देश के विभिन्न भागों से संत-महात्मा, आध्यात्मिक विभूतियाँ, विशिष्ट अतिथि और असंख्य श्रद्धालु इस भावपूर्ण ग्रंथ के विमोचन का उत्सव मनाने एकत्रित हुए। इस कृति का प्रकाशन भारत के प्रतिष्ठित प्रकाशक 'इन्विंसिबल पब्लिशर्स' द्वारा श्री सागर सेतिया जी के नेतृत्व में किया गया है, जिसका संदेश अब विश्वभर के जिज्ञासु पाठकों तक पहुँचेगा।
इस श्रद्धा, भक्ति एवं आध्यात्मिकता से सराबोर संध्या में देश के विभिन्न भागों से आए हजारों श्रद्धालुओं के अलावा मध्य प्रदेश के पूर्व गृह मंत्री नरोत्तम मिश्रा, सांसद मनोज तिवारी, दिल्ली सरकार से कपिल मिश्रा, बालक दास जी, पतंजलि योगपीठ के प्रतिनिधि और जैन मुनि लोकेश मुनि जी सहित कई बड़े साधु-संत, उच्च राजनीतिक पदों पर विराजित राजनेता और नामचीन सेलिब्रिटी भी पहुंचे, जिन्होंने बागेश्वर सरकार को प्रत्यक्ष रूप से जन्मदिन की शुभकामनाएं दीं।
परम-गुरु श्री संन्यासी बाबा को भावभीनी श्रद्धांजलि है यह ग्रंथ
'मेरा संन्यासी' लेखक के परम-गुरु, श्री संन्यासी बाबा के प्रति एक अत्यंत भावभीनी श्रद्धांजलि है। इस पुस्तक के माध्यम से पं. श्री धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री जी ने साझा किया है कि कैसे उनके जीवन और लोक-कल्याण के संकल्प को उनके गुरु एवं परम-गुरु की अगाध श्रद्धा, भक्ति और मंगलमय आशीर्वाद ने दिशा प्रदान की है। यह ग्रंथ श्री संन्यासी बाबा की दिव्य शिक्षाओं का परिचय देने के साथ-साथ पाठकों के भीतर भगवान श्री राम और श्री हनुमान के प्रति अनन्य भक्ति जागृत करता है, एवं आध्यात्मिक उन्नति व आत्म-साक्षात्कार की प्रेरणा देता है। अपनी इस कृति की व्याख्या करते हुए लेखक ने 'मेरा संन्यासी' को ‘एक आध्यात्मिक सेतु’ और ‘श्री संन्यासी बाबा के श्रीचरणों में निवेदित भक्ति-पुष्प’ कहा है।
"भारत को आज शिष्यों की भीड़ नहीं, गुरुओं की परंपरा की आवश्यकता"
ग्रंथ के मुख्य संदेश पर प्रकाश डालते हुए लेखक का मानना है कि आज भारत को शिष्यों की भीड़ की नहीं, बल्कि 'गुरुओं की परंपरा' की आवश्यकता है। जब प्रत्येक भारतीय अपने भीतर के गुरु को जागृत करेगा, तभी भारत वास्तविक रूप में 'विश्वगुरु' के पद पर प्रतिष्ठित होगा। जो स्वयं स्थिर है, वही दूसरों को स्थिरता दे सकता है और जो स्वयं जुड़ा है, वही दूसरों को जोड़ सकता है। श्री संन्यासी बाबा ने सिखाया है कि जब व्यक्ति अपने भीतर बैठे राम से जुड़ जाता है और उसके भीतर हनुमान की शक्ति जागृत हो जाती है, तब वह स्वयं ‘गुरु’ हो जाता है। जन-मानस उस परम चेतना से कैसे जुड़े और उससे कैसे संपर्क करे, इन्हीं गूढ़ प्रश्नों का उत्तर 'मेरा संन्यासी' में समाहित है।
उन्तीस वर्षों की जीवन यात्रा और सूक्ष्म ऊर्जा से एकाकार होने का अनुभव
अपनी उनतीस वर्षों की जीवन यात्रा का वर्णन करते हुए युवा संत पं. श्री धीरेन्द्र कृष्ण शास्त्री ने बताया कि उन्होंने अपने जीवन के उन्नीस वर्ष उस विलक्षण और विराट चेतना—‘श्री संन्यासी बाबा’ के संपर्क में गुज़ारे हैं, जिसने एक साधारण बालक को उठाकर विश्व-कल्याण के सिंहासन पर आसीन कर दिया। उन्होंने विनम्रतापूर्वक कहा, "वही हमारी वास्तविक शक्ति हैं, हम केवल माध्यम हैं। काया हमारी होती है, जो मात्र एक आवरण है, जबकि इस देह से निकलने वाली वाणी और विचार ‘श्री संन्यासी बाबा’ के होते हैं। हम एक वाद्य यंत्र की भाँति हैं—स्वर हमारे नहीं, लय हमारी नहीं; बजते हम हैं, सुनाई हम पड़ते हैं; लेकिन हमें बजाने वाले ‘श्री संन्यासी बाबा’ हैं।"
गुरु की प्रेरणा से प्रवाहित होती है दिव्य दरबार की परंपरा
पंडित धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री जी ने स्पष्ट किया कि बागेश्वर धाम के दिव्य दरबार की पवित्र परंपरा पूरी तरह गुरु कृपा पर आधारित है। व्यापक दृष्टि, आध्यात्मिक अनुभव-दर्शन, स्वप्न, स्वप्नादेश, अंतःप्रेरणा (intuition), सूक्ष्म संकेत, दरबार से संबंधित घटनाएँ और किसी व्यक्ति के विषय में अचानक प्राप्त होने वाली चेतावनी या मार्गदर्शन—यह सब कुछ श्री संन्यासी बाबा की ही कृपा, प्रेरणा, मार्गदर्शन और संकल्प से सिद्ध होता है, न कि उनकी किसी व्यक्तिगत इच्छा या क्षमता से। यह पावन सान्निध्य केवल एक पारंपरिक गुरु-शिष्य का संबंध नहीं, बल्कि एक सूक्ष्म और असीम ऊर्जा के साथ एकाकार होने का जीवंत अनुभव है।



