छिंदवाड़ा | छिंदवाड़ा जिले के सबसे बड़े सरकारी स्वास्थ्य केंद्र 'जिला अस्पताल' में पिछले कई महीनों से सोनोग्राफी सेवा पूरी तरह बंद होने के कारण मरीजों को भारी आर्थिक और मानसिक परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है। अस्पताल में इस महत्वपूर्ण जांच के लिए आवश्यक रेडियोलॉजिस्ट (सोनोग्राफी विशेषज्ञ) की स्थाई पदस्थापना नहीं होने से मशीनें धूल खा रही हैं। इस गंभीर अव्यवस्था के खिलाफ बुधवार को कांग्रेस झुग्गी-झोपड़ी प्रकोष्ठ के कार्यकर्ताओं ने कड़ा रुख अपनाते हुए जिला अस्पताल परिसर में जोरदार विरोध प्रदर्शन किया और सिविल सर्जन कार्यालय का घेराव कर एक ज्ञापन सौंपा।
गर्भवती महिलाओं और गरीब मरीजों पर दोहरी मार
जिला अस्पताल में प्रतिदिन सैकड़ों की संख्या में ग्रामीण और दूर-दराज के क्षेत्रों से मरीज इलाज के लिए पहुंचते हैं। सोनोग्राफी बंद होने का सबसे गंभीर असर गर्भवती महिलाओं, गंभीर रूप से बीमार बुजुर्गों और आर्थिक रूप से कमजोर मरीजों पर पड़ रहा है।
निजी सेंटरों की चांदी: सरकारी अस्पताल में मुफ्त होने वाली यह जांच अब मरीजों को मजबूरी में बाहर के निजी पैथोलॉजी और जांच केंद्रों से करानी पड़ रही है। इसके लिए उन्हें 1,000 से 2,500 रुपए तक की मोटी रकम खर्च करनी पड़ रही है, जिससे गरीब परिवारों का बजट पूरी तरह बिगड़ गया है।
'दावे हवाई, जमीनी हकीकत शून्य'— सिविल सर्जन कार्यालय पर फूटा गुस्सा
प्रदर्शन का नेतृत्व कर रहे कांग्रेस कार्यकर्ताओं ने आरोप लगाया कि सूबे की सरकार स्वास्थ्य सुविधाओं को हाईटेक बनाने के बड़े-बड़े दावे तो करती है, लेकिन जमीनी स्तर पर हालात बेहद दयनीय हैं। संसाधनों की भारी कमी: प्रदर्शनकारियों ने कहा कि जिले के मुख्य अस्पताल में न केवल डॉक्टरों, बल्कि जीवन रक्षक संसाधनों की भी लगातार कमी बनी हुई है। प्रशासन इस व्यवस्था को सुधारने के प्रति पूरी तरह उदासीन है। नारेबाजी और चेतावनी: घेराव के दौरान कार्यकर्ताओं ने अस्पताल प्रबंधन और स्वास्थ्य विभाग के खिलाफ जमकर नारेबाजी की। उन्होंने सिविल सर्जन को सौंपे ज्ञापन में चेतावनी दी कि यदि एक सप्ताह के भीतर अस्पताल में स्थाई सोनोग्राफी विशेषज्ञ की नियुक्ति कर जांच शुरू नहीं की गई, तो कांग्रेस आम जनता के साथ मिलकर उग्र जन आंदोलन के लिए बाध्य होगी।
प्रशासन के पाले में गेंद, समाधान का इंतजार
ज्ञापन लेने के बाद अस्पताल प्रबंधन ने उच्च अधिकारियों को वस्तुस्थिति से अवगत कराने और जल्द ही वैकल्पिक व्यवस्था या नई नियुक्ति के प्रयास करने का आश्वासन दिया है। बहरहाल, इस विरोध प्रदर्शन के बाद अब देखना होगा कि स्वास्थ्य विभाग और जिला प्रशासन इस बेहद संवेदनशील और जरूरी समस्या को कितनी गंभीरता से लेता है, ताकि बेबस मरीजों को राहत मिल सके।


