मुंबई। भारतीय शास्त्रीय संगीत देश की एक प्राचीन, समृद्ध और अमूल्य सांस्कृतिक विरासत है। यह संगीत न केवल हमारी आध्यात्मिक और ऐतिहासिक पहचान का प्रतीक है, बल्कि एक ऐसी अनूठी परंपरा भी है, जो पीढ़ियों से चली आ रही है। समय के साथ बदलते दौर और आधुनिक गायन के बीच, शास्त्रीय संगीत हमें हमारी जड़ों से जोड़ने का काम करता है। शास्त्रीय संगीतकारों ने शास्त्रीय संगीत को जीवित रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। उन्हीं में एक नाम पंडित राजीव तारानाथ का है। पंडित राजीव तारानाथ एक प्रसिद्ध भारतीय शास्त्रीय संगीतकार थे, जो सरोद वादक के रूप में जाने जाते थे। प्रत्येक वर्ष 17 अक्टूबर को उनकी जयंती मनाई जाती है। पंडित राजीव तारानाथ की जयंती संगीत प्रेमियों के लिए एक महत्वपूर्ण दिन है। शनिवार को तारानाथ को याद करने के साथ भारतीय शास्त्रीय संगीत के क्षेत्र में उनके अमूल्य योगदान का सम्मान किया जाएगा।

पंडित राजीव तारानाथ का जन्म 7 अक्टूबर 1932 को कर्नाटक के बैंगलोर में एक संगीत प्रेमी परिवार में हुआ था। उनके पिता पंडित तारानाथ भी एक संगीत प्रेमी थे। राजीव ने संगीत की अपनी प्रारंभिक प्रशिक्षण अपने पिता से ही प्राप्त किया। वहीं, उनकी मां का नाम सुमति बाई था।

पंडित राजीव तारानाथ उस्ताद अली अकबर खान के प्रमुख शिष्यों में से एक थे। इसके अलावा, उन्होंने पंडित रविशंकर और विदुषी अन्नपूर्णा देवी से भी संगीत के मार्गदर्शन प्राप्त किए थे। राजीव को बचपन से ही संगीत में काफी रुचि थी। उन्होंने महज 9 वर्ष की आयु में अपना पहला सार्वजनिक गायन प्रदर्शन दिया था। वह अपने किशोरावस्था में ऑल इंडिया रेडियो के लिए गाया करते थे।

राजीव की शैक्षणिक योग्यता की बात करें तो उन्होंने अंग्रेजी साहित्य में पीएचडी की थी। वह कुछ समय के लिए तिरुचिरापल्ली के क्षेत्रीय इंजीनियरिंग कॉलेज (आरईसी-टी) में अंग्रेजी साहित्य के प्रोफेसर और विभाग के प्रमुख के रूप में कार्यरत थे। हालांकि, कुछ समय बाद उन्होंने टीचिंग के करियर को छोड़कर संगीत की ओर रुख करने का फैसला लिया।

प्रोफेसर के तौर पर करियर छोड़ने के बाद वे कलकत्ता चले गए, जहां उन्होंने अली अकबर खान के मार्गदर्शन में संगीत का प्रशिक्षण शुरू किया। तारानाथ मुख्य रूप से रागों की गहरी समझ, अपने सुरों की गुणवत्ता और अपने वाद्ययंत्रों की क्षमता के लिए जाने जाते थे। उन्होंने देश समेत दुनिया के कई हिस्सों में व्यापक प्रस्तुतियां दीं।

संगीत के क्षेत्र में अपने अतुलनीय योगदान के लिए उन्हें 2019 में भारत सरकार द्वारा पद्म श्री से सम्मानित किया गया। इसके अतिरिक्त, उन्हें संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार और अन्य सम्मान भी प्राप्त हैं। वहीं, 11 जून 2024 को कर्नाटक के मैसूर में 91 वर्ष की आयु में उनका निधन हो गया।