लखनादौन (सतीश चंद्रा)। सरकारी नौकरी क्या अब केवल 'अंगूठा लगाने' और 'मुफ्त का वेतन' पाने का जरिया बनकर रह गई है? लखनादौन सिविल अस्पताल में पदस्थ मलेरिया इंस्पेक्टर उमेश मसकोले के कारनामों ने तो यही साबित कर दिया है। जनता के खून-पसीने की कमाई से मिलने वाले 70,000 रुपये हर महीने इनकी जेब में जा रहे हैं, लेकिन बदले में वे जनता को सेवा नहीं, बल्कि अपनी निजी मोबाइल दुकान से सरकारी नौकरी की धौंस दिखा रहे हैं। सरकारी नौकरी की गरिमा और सेवा की शपथ को दरकिनार कर साहब का पूरा ध्यान अस्पताल के सामने स्थित अपनी मोबाइल दुकान के गल्ले पर लगा रहता है। मच्छरों से होने वाली बीमारियों की रोकथाम के बजाय साहब अपनी दुकान पर मोबाइल के रिचार्ज और सौदेबाजी में व्यस्त रहते हैं।


भ्रष्टाचार और लापरवाही का आलम यह है कि जब साहब को ड्यूटी के समय दुकान पर रंगे हाथों पकड़ा गया और उनकी ड्यूटी के बारे में सवाल किया गया, तो उन्होंने बड़े इत्मीनान से जवाब दिया कि जब अस्पताल में काम नहीं होता या जब उनका बालक कहीं चला जाता है, तब वे यहाँ बैठते हैं। यह बयान भ्रष्टाचार के अहंकार की पराकाष्ठा है और सीधा सवाल खड़ा करता है कि क्या सरकार इन्हें मोटा वेतन इसलिए देती है कि ये अपनी ड्यूटी छोड़कर पारिवारिक व्यापार संभालें। कमाई के बारे में पूछने पर उन्होंने बिना किसी हिचक के कुबूला कि अस्पताल से तो सत्तर हजार मिल ही जाते हैं, बाकी का इस दुकान से कमा लेते हैं। यह स्थिति दर्शाती है कि सरकारी खजाने से मिलने वाला वेतन इनके लिए केवल एक 'फिक्स्ड डिपॉजिट' जैसा है और असली मेहनत निजी व्यापार चमकाने में की जा रही है।


इस पूरे मामले में प्रशासनिक ढिलाई भी देखने को मिली है। ब्लॉक मेडिकल ऑफिसर अशोक सह्लाम का यह कहना कि दुकान उनके बेटे के नाम है, जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ने जैसा है, क्योंकि मुद्दा मालिकाना हक का नहीं बल्कि ड्यूटी के घंटों में उपस्थिति का है। लखनादौन क्षेत्र में जब गरीब आदिवासी और किसान मलेरिया-डेंगू जैसी बीमारियों से जूझ रहे होते हैं, तब उनके रक्षक का दुकान पर बैठना पूरे स्वास्थ्य विभाग के चेहरे पर तमाचा है। हालांकि, जब इस लापरवाही का वीडियो प्रभारी बीएमओ डॉ. बी.एस. सोलंकी को दिखाया गया, तो उन्होंने मामले की गंभीरता को देखते हुए तत्काल सख्त कार्रवाई के निर्देश दिए हैं। उन्होंने स्पष्ट किया है कि संबंधित कर्मचारी को 'कारण बताओ नोटिस' जारी किया जा रहा है और संतोषजनक जवाब न मिलने पर कड़ी अनुशासनात्मक कार्रवाई की जाएगी क्योंकि ड्यूटी में ऐसी लापरवाही बर्दाश्त नहीं होगी।