भोपाल। मध्य प्रदेश की राजनीति में इस समय भारी उथल-पुथल मची हुई है, एक ओर जमीन घोटाले के आरोप लगाते हुए कांग्रेस लगातार सीएम मोहन यादव पर हमलावर बनी हुई तो वहीं दूसरी ओर भाजपा नेता और मध्यप्रदेश सरकार इन आरोपों को कोरी बकवास बता रहे हैं। इसी बीच भाजपा का पलड़ा उस वक्त भारी हो गया है, जब कांग्रेस के दिग्गज नेता और प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री दि​ग्विजय सिंह ने अपनी ही पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष जीतू पटवारी के आरोपों पर सवाल खड़े कर दिए।


दरअसल यह पूरा मामला तब शुरू हुआ था जब चार दिन पहले कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष जीतू पटवारी ने आरोप लगाया था कि उज्जैन स्थित 500 करोड़ रुपये की बेशकीमती सरकारी जमीन और सिंधिया राजघराने की ऐतिहासिक बिल्डिंग को मुख्यमंत्री ने अपने सांस्कृतिक सलाहकार के एक निजी ट्रस्ट को महज 1 रुपये में सौंप दिया है। जीतू पटवारी के इन्हीं आरोपों को सिरे से नकारते हुए उज्जैन में आयोजित एक विशेष प्रेस कॉन्फ्रेंस में दिग्विजय सिंह ने स्पष्ट किया कि यह आरोप पूरी तरह से गलत और निराधार हैं। दिग्विजय सिंह बकायदा सरकारी दस्तावेजों के साथ मीडिया के सामने आए और यह साफ कर दिया कि इस मामले में किसी भी तरह की गड़बड़ी नहीं हुई है।


मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह ने मीडिया को आधिकारिक दस्तावेज दिखाते हुए साफ किया कि जिस वीर भारत न्यास को यह जमीन और बिल्डिंग ट्रांसफर की गई है, वह कोई निजी संस्था नहीं बल्कि एक पूर्णतः शासकीय ट्रस्ट है। दिग्विजय सिंह ने प्रशासनिक स्थिति स्पष्ट करते हुए कहा, वीर भारत न्यास एक पूरी तरह से सरकारी ट्रस्ट है और इसके पदेन अध्यक्ष स्वयं मुख्यमंत्री हैं। सिंधिया राजघराने की इस ऐतिहासिक और जर्जर हो रही बिल्डिंग को सहेजने तथा उसके संरक्षण के लिए महज एक रुपये के टोकन अमाउंट पर एक सरकारी ट्रस्ट को सौंपना कहीं से भी गलत या गैर-कानूनी नहीं है, यह संपत्ति सरकार की थी और सरकारी निकाय के पास ही है।


अब ऐसे में दिग्विजय सिंह द्वारा प्रस्तुत किए गए दस्तावेजों से यह साफ हो गया कि मुख्यमंत्री द्वारा लिया गया निर्णय पूरी तरह नियमानुकूल और पारदर्शी था। वीर भारत न्यास कोई निजी स्वामित्व वाला न्यास नहीं है। सरकारी नियमों के मुताबिक, जो भी व्यक्ति मध्य प्रदेश का मुख्यमंत्री होगा, वही इस ट्रस्ट का पदेन अध्यक्ष रहेगा। दिग्विजय सिंह के इस खुलासे के बाद जीतू पटवारी द्वारा लगाए गए 500 करोड़ के कथित घोटाले के आरोप पूरी तरह धराशायी हो गए, क्योंकि जमीन किसी निजी व्यक्ति को नहीं बल्कि खुद सरकार के नियंत्रण वाले ट्रस्ट को दी गई है। सिंधिया राजघराने की इस ऐतिहासिक बिल्डिंग को सुरक्षित रखने के लिए सरकार द्वारा उठाया गया यह एक वैध और प्रशासनिक कदम है, जिसे पूर्व मुख्यमंत्री ने भी सही ठहराया है।


अब अगर प्रदेश की राजनीति पर नजर डालें तो दिग्विजय सिंह के इस रुख ने जहां एक तरफ कांग्रेस संगठन के भीतर की अपरिपक्वता और आपसी खींचतान को उजागर कर दिया है, वहीं दूसरी तरफ मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के प्रशासनिक निर्णय पर खुद विपक्ष की तरफ से एक मजबूत मुहर लग गई है।


यहां तक कि दिग्विजय सिंह ने यह अंदेशा भी जताया कि इस पूरे घटनाक्रम और भ्रामक आरोपों के पीछे कुछ अज्ञात दलालों का हाथ हो सकता है, जो अपने निजी स्वार्थ या ब्लैकमेलिंग के उद्देश्य से ऐसी झूठी फाइलें और मनगढ़ंत आरोप तैयार करते हैं। फिलहाल दिग्विजय सिंह के इस बयान के बाद प्रदेश की राजनीति में मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव का पक्ष पूरी तरह मजबूत और पाक-साफ होकर उभरा है, जबकि विपक्षी खेमे के आरोपों की धार पूरी तरह कुंद हो गई है।