नई दिल्ली। जब पूरी दुनिया में खुद को शक्तिशाली बनाने की होड़ है, उस दौर में मानवता पर संकट और गहरा हो जाता है। रूस-यूक्रेन युद्ध, फिर इजरायल-हमास संघर्ष और इसके बाद अमेरिका-ईरान की लड़ाई, ये ऐसे उदाहरण हैं, जिनमें अनगिनत लोग बेमौत मारे गए। इसके बावजूद परिस्थितियां परमाणु युद्ध के मुहाने पर आकर खड़ी हो गईं, जो पूरी दुनिया के लिए चिंताजनक थीं। भले परमाणु हथियारों का इस्तेमाल नहीं हुआ, लेकिन यह खतरा हमेशा के लिए टला नहीं है।
परमाणु युद्ध आज भी दुनिया को डराते हैं, क्योंकि आज के आधुनिक हथियार कुछ ही मिनटों में पूरी पृथ्वी और मानव जीवन को पूरी तरह खत्म कर सकते हैं, जिस तरह अमेरिका के दो परमाणु बमों ने हिरोशिमा और नागासाकी शहरों को नष्ट कर दिया और एक झटके में लाखों लोग काल के गाल में समा चुके थे।
आज परमाणु हथियार मानवता की सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक हैं। इन चुनौतियों और चिंताओं के बीच हर साल 29 अगस्त को पूरी दुनिया परमाणु परीक्षण विरोधी दिवस मनाती है, ताकि परमाणु हथियारों के परीक्षण के हानिकारक प्रभावों के बारे में जागरूकता बढ़ाई जा सके।
इस दिन की स्थापना तब हुई जब संयुक्त राष्ट्र महासभा (यूएनजीए) ने 2 दिसंबर 2009 को अपने 64वें सत्र में प्रस्ताव 64/35 को अपनाया। यह प्रस्ताव कजाकिस्तान गणराज्य की ओर से कई प्रायोजकों और सह-प्रायोजकों के साथ मिलकर 29 अगस्त 1991 को सेमिपालातिंस्क परमाणु परीक्षण स्थल के बंद होने की स्मृति में प्रस्तुत किया गया था।
परमाणु परीक्षण विरोधी अंतरराष्ट्रीय दिवस का पहला आयोजन 2010 में हुआ था। इसके बाद हर साल, इस दिवस को विश्व भर में अलग-अलग गतिविधियों के समन्वय के माध्यम से मनाया जाता है। परमाणु हथियारों के पूर्ण उन्मूलन के लिए अंतर्राष्ट्रीय दिवस पहली बार सितंबर 2014 में मनाया गया था।
परमाणु परीक्षण का इतिहास 16 जुलाई 1945 की सुबह न्यू मैक्सिको के अल्मोगोर्डो में एक परीक्षण स्थल पर शुरू हुआ, जब संयुक्त राज्य अमेरिका ने अपना पहला परमाणु बम विस्फोट किया। 29 अगस्त 1949 को सोवियत संघ की ओर से किए गए पहले परमाणु बम परीक्षण के साथ ही सोवियत संघ और संयुक्त राज्य अमेरिका के बीच 'शीत युद्ध' की परमाणु हथियारों की होड़ शुरू हो गई थी।
शुरुआत में, न तो संयुक्त राज्य अमेरिका और न ही सोवियत संघ के पास अतिरिक्त परमाणु हथियार थे, इसलिए उनके परमाणु परीक्षण अपेक्षाकृत सीमित थे। यूनाइटेड किंगडम 3 अक्टूबर 1952 को परमाणु हथियारों का परीक्षण करने वाला तीसरा देश बना। शुरुआत में, यूनाइटेड किंगडम ने मुख्य रूप से ऑस्ट्रेलिया में और बाद में संयुक्त राज्य अमेरिका में परीक्षण किए।
बढ़ते तनाव, व्यापक भय और संदेह के माहौल ने अधिक शक्तिशाली और एडवांस्ड बम बनाने की होड़ को बढ़ावा दिया। शीत युद्ध के दौरान दुनिया के परमाणु शस्त्रागार में भारी वृद्धि हुई।
संयुक्त राष्ट्र (यूएन) के आंकड़े बताते हैं कि 1945 के उस दिन और 1996 में व्यापक परमाणु परीक्षण प्रतिबंध संधि (सीटीबीटी) पर हस्ताक्षर होने से पहले पांच दशकों में दुनियाभर में 2,000 से अधिक परमाणु परीक्षण किए गए। यूएन की रिपोर्ट कहती है कि आज लगभग 12,241 परमाणु हथियार मौजूद हैं।
परमाणु परीक्षण के शुरुआती दिनों में मानव जीवन पर इसके विनाशकारी प्रभावों पर बहुत कम ध्यान दिया गया था, वायुमंडलीय परीक्षणों से होने वाले परमाणु विकिरण के खतरों की तो बात ही छोड़ दें। हालांकि, अतीत और इतिहास ने हमें परमाणु हथियारों के परीक्षण के भयावह और दुखद परिणामों को दिखाया।




