भोपाल। मध्य प्रदेश में इस वर्ष मानसून की रफ्तार धीमी रहने और सामान्य से कम बारिश होने की आशंका के बीच राज्य सरकार पूरी तरह अलर्ट मोड में आ गई है। भारतीय मौसम विज्ञान विभाग (IMD) द्वारा जारी किए गए पूर्वानुमान को देखते हुए सरकार ने प्रदेश के 24 प्रभावित जिलों के लिए एक विशेष आपातकालीन कार्ययोजना तैयार कर ली है। सरकार का मुख्य उद्देश्य सूखे जैसी किसी भी स्थिति से निपटने के लिए समय रहते पुख्ता इंतजाम करना है।


उज्जैन संभाग को लेकर सबसे ज्यादा चिंता, IMD के आंकड़ों ने बढ़ाई टेंशन

मौसम विभाग के आंकड़ों के अनुसार, इस बार मध्य प्रदेश में सामान्य वर्षा का केवल 90 से 94 प्रतिशत होने का ही पूर्वानुमान है। 1 जून से 1 जुलाई तक प्रदेश में सामान्य रूप से 139.7 मिमी बारिश होनी चाहिए थी, लेकिन इसके मुकाबले केवल 92.4 मिमी दर्ज की गई है, जो कि 47 मिमी की बड़ी कमी है। इस स्थिति में सबसे अधिक चिंता मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के गृह संभाग उज्जैन को लेकर जताई जा रही है, जहाँ वर्षा का ग्राफ सबसे कम रहने की आशंका है। प्रदेश के कई अन्य जिलों में भी अभी से सामान्य से 20 से 60 प्रतिशत तक का वर्षा घाटा (Rain Deficit) दर्ज किया जा चुका है, जिससे खरीफ फसलों के उत्पादन पर संकट मंडरा रहा है।


कृषि और राजस्व विभाग की संयुक्त माइक्रो प्लानिंग

संभावित सूखे के खतरे को भांपते हुए मुख्यमंत्री के निर्देश पर कृषि और राजस्व विभाग ने संयुक्त रणनीति पर काम शुरू कर दिया है। सरकार ने चिन्हित 24 जिलों के लिए विशेष एडवाइजरी जारी की है, जिनमें से 7 जिलों में विस्तृत 'माइक्रो प्लानिंग' लागू की जाएगी। इस योजना के तहत कृषि विज्ञान केंद्रों (KVK) के माध्यम से फसलों की तकनीकी निगरानी की जाएगी। साथ ही किसानों तक मौसम और खेती से जुड़ी सटीक जानकारियां पहुंचाने के लिए मोबाइल, सोशल मीडिया और स्थानीय प्रचार माध्यमों का सहारा लिया जाएगा। जिला स्तर पर अधिकारियों को रोजाना हालातों की समीक्षा करने के निर्देश दिए गए हैं।


किसानों के लिए वैकल्पिक फसल और वैज्ञानिक तकनीकों की सलाह

कम पानी की उपलब्धता को देखते हुए सरकार किसानों को अपनी पारंपरिक खेती के तरीकों में बदलाव करने की सलाह दे रही है। इसके तहत निम्नलिखित कदम उठाए जा रहे हैं:

  • कम पानी वाली फसलें: किसानों को कम अवधि और कम पानी में पकने वाली दलहन, तिलहन और मोटे अनाज (मिलेट्स) का रकबा बढ़ाने के लिए प्रेरित किया जा रहा है।
  • वैज्ञानिक खेती: खेतों में पानी की बचत के लिए 'रिज एंड फरो', 'रेज्ड बेड' और 'डायरेक्ट सीडेड राइस' (धान की सीधी बुआई) जैसी आधुनिक और वैज्ञानिक कृषि तकनीकों को बढ़ावा दिया जाएगा।
  • बीज और सिंचाई: सरकार ने संकट की स्थिति में वैकल्पिक फसलों के उन्नत बीज समय पर वितरित करने का खाका तैयार किया है। इसके साथ ही मनरेगा के माध्यम से खेत तालाबों का निर्माण, जल संरक्षण संरचनाओं की मरम्मत और ड्रिप-स्प्रिंकलर जैसी सूक्ष्म सिंचाई तकनीकों पर जोर दिया जा रहा है।


सूखा घोषित करने की समय-सीमा तय, राहत के लिए 20.9 करोड़ सुरक्षित

यदि जुलाई और अगस्त के महीनों में भी पर्याप्त बारिश नहीं होती है, तो राजस्व विभाग वर्ष 2020 की सूखा नीति के दिशा-निर्देशों के अनुसार राहत कार्य शुरू करेगा। विभाग ने स्पष्ट किया है कि खरीफ फसलों के नुकसान का आकलन कर 31 अक्टूबर तक और रबी फसलों के लिए 31 मार्च तक सूखा घोषित करने की वैधानिक कार्रवाई की जा सकेगी। वर्तमान में विभाग के पास प्रारंभिक राहत कार्यों के लिए 20.9 करोड़ रुपए का बजट उपलब्ध है, जिसे जरूरत पड़ने पर और बढ़ाया जाएगा। सभी संबंधित जिलों से 'क्राइसिस मैनेजमेंट प्लान' मंगवा लिए गए हैं और इसकी निगरानी के लिए नोडल अधिकारियों की नियुक्तियां भी पूरी कर दी गई हैं।