अशोकनगर। शादी-ब्याह का नाम सुनते ही ढोल-नगाड़े, शहनाई की गूंज और गांवभर की रौनक जेहन में तैरने लगती है। लेकिन शहर से ही सटे टकनेरी गांव में पिछले डेढ़ साल से एक अजीब सा सन्नाटा पसरा हुआ है। इस आदिवासी बाहुल्य गांव में किसी भी बेटी की डोली उसके अपने आंगन से नहीं उठ रही है। वजह कोई आर्थिक तंगी या महामारी नहीं, बल्कि एक ऐसी अजीबोगरीब और रूढ़िवादी परंपरा है, जिसने पूरे गांव की खुशियों पर अघोषित कर्फ्यू लगा दिया है।
क्या है यह अजीबोगरीब परंपरा?
इस क्षेत्र में परंपरा यह है कि यदि गांव में कोई हत्या या अत्यंत अप्रिय घटना हो जाए, तो वहां तब तक कोई भी मांगलिक कार्य नहीं हो सकता, जब तक कि आरोपी पक्ष के परिवार में कोई शादी न हो जाए। डेढ़ साल पहले टकनेरी गांव में एक महिला की निर्मम हत्या हुई थी, जिसके बाद से पूरे गांव में शहनाई बजना पूरी तरह बंद हो गई।
गरीब परिवारों के लिए बनी बड़ी सामाजिक समस्या
टकनेरी गांव में ब्राह्मण, रघुवंशी, यादव, अहिरवार और आदिवासी समाज के लोग निवास करते हैं। इस कुप्रथा के कारण संपन्न परिवार तो शहर में मैरिज गार्डन या हॉल बुक करके अपने आयोजन कर लेते हैं, लेकिन असली मुसीबत गरीब परिवारों की है। उनके पास न तो शहर में गार्डन बुक करने के पैसे हैं और न ही बाहर मेहमानों को ठहराने की व्यवस्था। नतीजतन, इन परिवारों को मजबूरन गांव की सीमा से बाहर जाकर विवाह के आयोजन करने पड़ रहे हैं।
अपने ही आंगन से विदा नहीं हो सकी मेहरबान की बेटी
इस परंपरा का ताजा दर्द मेहरबान सिंह के परिवार ने झेला। मेहरबान सिंह का अरमान था कि वे अपनी बेटी को अपने ही आंगन से विदा करेंगे, लेकिन गांव की इस रूढ़ि के आगे उन्हें घुटने टेकने पड़े। सोमवार को मजबूरी में उन्होंने गांव की सीमा लांघकर पंवारगढ़ में जाकर बेटी के हाथ पीले किए। इस चालू सीजन में ही टकनेरी गांव के करीब 9 से 10 परिवारों ने इसी तरह गांव से बाहर जाकर अपने बच्चों की शादियां रचाई हैं।
सिर्फ टकनेरी नहीं, 100 से ज्यादा गांवों में बंद है शहनाई
एक बड़ा दंश: यह विडंबना सिर्फ टकनेरी गांव तक सीमित नहीं है। इस जिले के करीब एक हजार गांवों में से 100 से ज्यादा गांव ऐसे हैं, जो आज भी इस रूढ़िवादी परंपरा का दंश झेल रहे हैं। इन गांवों में बरसों से शहनाई की आवाज नहीं गूंजी है। किसी भी पुरानी अप्रिय घटना के चलते ग्रामीण आज भी अपने बच्चों के विवाह के लिए दूसरे गांवों, शहरों और धर्मशालाओं के चक्कर काटने को मजबूर हैं।

