इंदौर | मध्य प्रदेश की आर्थिक राजधानी इंदौर की गांधी नगर थाना पुलिस ने देश की अर्थव्यवस्था को चोंट पहुंचाने वाले एक बड़े और हाईटेक जाली नोट रैकेट का पर्दाफाश करने में बड़ी सफलता हासिल की है। पुलिस को मिली एक सटीक गुप्त सूचना के आधार पर सिंगापुर टाउनशिप स्थित एक किराए के फ्लैट पर अचानक छापा मारा गया, जहां बड़े पैमाने पर नकली नोट छापने का काला कारोबार चल रहा था। मौके से पुलिस ने त्वरित कार्रवाई करते हुए तीन आरोपियों को रंगे हाथों गिरफ्तार किया है। आरोपियों की पहचान रवि चौधरी, संजय वैष्णव और दीपक पटेल के रूप में हुई है। फ्लैट की तलाशी लेने पर पुलिस को वहां से एक हाईटेक प्रिंटिंग मशीन, लैपटॉप, आधुनिक प्रिंटर, नोट छापने में इस्तेमाल होने वाला विशेष कागज और 200-200 रुपये के करीब 80 हजार रुपये मूल्य के जाली नोट बरामद हुए हैं।
जमानत पर बाहर आते ही मास्टरमाइंड ने फिर शुरू किया जाली नोटों का धंधा पुलिस की शुरुआती जांच और पूछताछ में यह बेहद चौंकाने वाला तथ्य सामने आया है कि इस पूरे नेटवर्क का मुख्य सूत्रधार (मास्टरमाइंड) रवि चौधरी है। रवि कोई नौसिखिया नहीं है, बल्कि वह पहले भी जाली नोट छापने और फेक करेंसी के गंभीर मामले में पुलिस द्वारा गिरफ्तार होकर जेल की हवा खा चुका है। कोर्ट से जमानत पर बाहर आने के बाद उसने सुधरने के बजाय दोबारा इसी अवैध धंधे को अधिक आधुनिक तरीके से शुरू कर दिया। इस बार उसने पुलिस की आंखों में धूल झोंकने के लिए अपने साथ संजय वैष्णव और दीपक पटेल नाम के दो नए शातिर युवकों को भी शामिल कर लिया। तीनों ने मिलकर सिंगापुर टाउनशिप में एक फ्लैट किराए पर लिया, ताकि किसी को शक न हो और वहां आधुनिक डिजिटल उपकरणों की मदद से नोट छापने का काम शुरू कर दिया।इंटरनेट से सीखे असली नोटों के 'सिक्योरिटी फीचर्स', ऐसे खपाते थे करेंसी पुलिस अधिकारियों के मुताबिक, यह गिरोह बेहद शातिर और सुनियोजित तरीके से जाली नोट तैयार कर रहा था। आरोपी इंटरनेट और सोशल मीडिया पर उपलब्ध तकनीकी जानकारियों की मदद से भारतीय मुद्रा के डिजाइन, बारीकियों और उसके मुख्य सुरक्षा मानकों (सिक्योरिटी फीचर्स) को गहराई से समझते थे। उनका मकसद ऐसे नकली नोट तैयार करना था, जो पहली नजर में देखने पर हूबहू असली जैसे दिखाई दें और आम इंसान धोखा खा जाए। इस नेटवर्क में संजय और दीपक की भूमिका केवल नोटों की प्रिंटिंग तक सीमित नहीं थी, बल्कि उन पर इन जाली नोटों को बाजार में चलाने और अलग-अलग इलाकों में सप्लाई करने की बड़ी जिम्मेदारी थी। पूछताछ में पता चला है कि यह गिरोह जानबूझकर भीड़भाड़ वाले साप्ताहिक बाजारों, छोटे दुकानदारों, सब्जी विक्रेताओं और ठेले वालों को निशाना बनाता था, जहां व्यस्तता के कारण लोग नोटों की जांच नहीं कर पाते और नकली नोट आसानी से खप जाते थे।
पूरे नेटवर्क की 'सप्लाई चेन' खंगालने में जुटी पुलिस, रिमांड पर आरोपी विशेषज्ञों और जांच एजेंसियों का मानना है कि फेक करेंसी सिर्फ एक सामान्य आर्थिक अपराध नहीं है, बल्कि यह सीधे तौर पर देश की वित्तीय व्यवस्था पर प्रहार है और आम जनता के भरोसे को तोड़ता है। यही वजह है कि इंदौर पुलिस इस मामले को अत्यंत गंभीरता से ले रही है। पुलिस को अंदेशा है कि यह गिरोह पिछले काफी समय से सक्रिय था और अब तक बाजार में लाखों रुपये के जाली नोट खपा चुका है। फिलहाल पुलिस ने तीनों आरोपियों को न्यायालय में पेश कर रिमांड पर लिया है। जांच का मुख्य फोकस अब इनके मोबाइल, लैपटॉप, कॉल डिटेल्स और डिजिटल लेन-देन के रिकॉर्ड्स को खंगालना है, ताकि यह पता लगाया जा सके कि इन नकली नोटों की सप्लाई मध्य प्रदेश के किन-किन जिलों या अन्य राज्यों तक की गई है। अधिकारियों का दावा है कि इस गिरोह के पीछे जुड़े अन्य रसूखदारों और पूरी सप्लाई चेन का पता चलते ही मामले में कई और बड़ी गिरफ्तारियां हो सकती हैं।

