इंदौर | देश के सबसे स्वच्छ शहर और मध्य प्रदेश की आर्थिक राजधानी इंदौर सहित समूचे सूबे में आवारा और आक्रामक कुत्तों का आतंक इस कदर बढ़ गया है कि अब आम नागरिकों का सड़कों पर पैदल चलना दूभर हो गया है। एक बेहद चौंकाने वाली और चिंताजनक ताजा रिपोर्ट के अनुसार, इस साल जनवरी से अप्रैल 2026 तक (मात्र चार महीनों में) मध्य प्रदेश के भीतर करीब 3 लाख लोग आवारा कुत्तों के हमलों में जख्मी हो चुके हैं। इस सूची में सबसे बदतर हालात व्यापारिक नगरी इंदौर के हैं, जहां की कुल 37.68 लाख आबादी में से 1.81 फीसदी यानी लगभग 68,200 लोगों को आवारा कुत्तों ने अपना शिकार बनाया है। बेहद अफसोसजनक है कि इतने गंभीर संकट के बावजूद जिम्मेदार जनप्रतिनिधियों और प्रशासनिक अफसरों की सेहत पर कोई असर नहीं पड़ रहा है, और पीड़ित अस्पतालों में एंटी रेबीज इंजेक्शन के लिए दर-दर भटकने को मजबूर हैं।


इंदौर में क्यों फेल हुआ सिस्टम? नगर निगम की लापरवाही के कारण नंबर वन शहर होने के बावजूद इंदौर में श्वान नियंत्रण (एनिमल बर्थ कंट्रोल) का पूरा ढर्रा पूरी तरह ध्वस्त साबित हुआ है। शहर में डॉग बाइट के मामले लगातार रिकॉर्ड तोड़ रहे हैं, इसके बावजूद नगर निगम ने नसबंदी केंद्रों की संख्या नहीं बढ़ाई। वर्तमान में केवल दो केंद्रों के भरोसे पूरा शहर चल रहा है। पिछले चार महीनों के भीतर शहर में केवल 7500 आवारा कुत्तों का ही एंटी-रेबीज टीकाकरण (वैक्सीनेशन) कराया जा सका है, जो कुल संख्या के मुकाबले बेहद कम है। लापरवाही का आलम यह है कि जब रोजाना सैकड़ों लोग जख्मी हो रहे थे, तब विभाग ने मात्र 6600 कुत्तों की ही नसबंदी की। इसके साथ ही, शहर में आक्रामक और खूंखार आवारा कुत्तों को रखने के लिए एकमात्र आश्रय केंद्र (डॉग शेल्टर) संचालित है, जिसकी कुल क्षमता महज 300 कुत्तों की है। स्थानीय जनप्रतिनिधि इस जानलेवा समस्या को लेकर कतई गंभीर नहीं हैं और परिषद या निगम की बैठकों में इसकी कोई नियमित समीक्षा या निगरानी नहीं की जा रही है।


भोपाल और चंबल संभाग भी गंभीर संकट में; बच्चे और बुजुर्ग निशाने पर श्वानों के आतंक की यह भयावह तस्वीर सिर्फ इंदौर तक सीमित नहीं है, बल्कि राजधानी भोपाल सहित अन्य संभागों में भी हालात बेकाबू हैं। इस वन्य और शहरी संकट में सबसे ज्यादा मासूम बच्चे और लाचार बुजुर्ग कुत्तों के निशाने पर आ रहे हैं। चंबल संभाग की बात करें तो वहां करीब 50 लाख की आबादी में से 56 हजार लोगों को कुत्तों ने जख्मी किया है, जो आबादी के अनुपात में अन्य संभागों की तुलना में सर्वाधिक है। इंदौर के बाद प्रदेश में दतिया, मुरैना और नर्मदापुरम ऐसे जिले हैं जहां सर्वाधिक लोग आवारा श्वानों के हमले में घायल हुए हैं।


दूसरी ओर, करीब 31.80 लाख की आबादी वाले भोपाल संभाग (भोपाल, सीहोर, रायसेन, राजगढ़ और विदिशा) की कुल आबादी में से 0.85 प्रतिशत लोग कुत्तों के काटने से घायल हो चुके हैं। भोपाल शहर में तीन नसबंदी केंद्र होने और करीब 10 हजार कुत्तों का टीकाकरण किए जाने के बाद भी जमीनी हालात चिंताजनक बने हुए हैं। इसके मुकाबले जबलपुर संभाग की स्थिति थोड़ी बेहतर कही जा सकती है, जहां की लगभग 1.35 करोड़ की आबादी में से 0.62 फीसदी लोग इन आवारा श्वानों का शिकार बने हैं।


सुप्रीम कोर्ट के दिशा-निर्देशों की सरेआम अवहेलना अस्पतालों में इंजेक्शन का संकट: देश की सर्वोच्च अदालत (सुप्रीम कोर्ट) कई मौकों पर राज्य सरकारों और स्थानीय निकायों को आवारा कुत्तों की बढ़ती आबादी और उनके हिंसक व्यवहार को नियंत्रित करने के लिए कड़े दिशा-निर्देश जारी कर चुकी है। लेकिन मध्य प्रदेश में इन नियमों की सरेआम अवहेलना हो रही है। हालात यह हैं कि सरकारी अस्पतालों में समय पर एंटी-रेबीज इंजेक्शन न मिलने के कारण कई गरीब मरीजों को मजबूरन अपनी जेब से मोटी रकम खर्च कर निजी मेडिकल स्टोर्स से इंजेक्शन लगवाने पड़ रहे हैं। यदि समय रहते प्रशासन ने कोई ठोस नीति नहीं बनाई, तो यह समस्या महामारी का रूप ले सकती है।