भोपाल। मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री मोहन यादव को राज्यसभा चुनाव में एक बड़ी राजनीतिक सफलता हाथ लगी। जब उन्हें पता चला कि कांग्रेस में राज्यसभा टिकट को लेकर गहमा-गहमी मची हुई है और जीतू पटवारी, कमलनाथ तथा दिग्विजय सिंह के बीच तीखा मतभेद चल रहा है, तो उन्होंने तुरंत एक चतुर रणनीति तैयार की।

मोहन यादव का मास्टर प्लान यह था कि अगर इन तीनों में से किसी को टिकट नहीं मिला और किसी अन्य उम्मीदवार को टिकट दिया गया, तो बीजेपी उसे हराने के लिए हर संभव कोशिश करेगी। इसी योजना के तहत बीजेपी ने दो उम्मीदवारों (तरुण चुघ और रजनीश अग्रवाल) के अलावा तीसरा उम्मीदवार भी उतार दिया। जैसे ही बीजेपी का तीसरा उम्मीदवार घोषित हुआ, कांग्रेस सतर्क हो गई। पार्टी को अपने विधायकों पर भरोसा नहीं रहा। आशंका थी कि वे हॉर्स ट्रेडिंग (क्रॉस वोटिंग) का शिकार न हो जाएं। इसलिए कांग्रेस ने अपने विधायकों को सुरक्षा के मद्देनजर कर्नाटक भेज दिया, लेकिन यह चाल उल्टी पड़ गई।

बीजेपी को पहले से ही मीनाक्षी नटराजन (कांग्रेस की उम्मीदवार) के नामांकन में कमजोरी का पता था। उनके हलफनामे में लंबित क्रिमिनल केस (तेलंगाना कोर्ट का मामला) का जिक्र नहीं किया गया था, जो राज्यसभा चुनाव और चुनाव आयोग के नियमों के अनुसार छुपाया नहीं जा सकता था। विधायकों के कर्नाटक रवाना होते ही बीजेपी ने मीनाक्षी नटराजन के नामांकन पर आपत्ति दर्ज कराई। चुनाव आयोग ने इस गंभीर खामी को संज्ञान में लिया और उनके नामांकन को रद्द कर दिया।

राजनीतिक गलियारों में यह भी चर्चा है कि कांग्रेस के कुछ वरिष्ठ नेताओं ने जानबूझकर ऐसा नामांकन तैयार करवाया था, ताकि मीनाक्षी नटराजन बाहर हो जाएं और अंततः जीतू पटवारी, कमलनाथ व दिग्विजय सिंह जैसे नेताओं को फायदा पहुंचे। नतीजा: कांग्रेस की एकमात्र सीट भी हाथ से निकल गई और बीजेपी ने तीनों राज्यसभा सीटें बिना मुकाबले जीत लीं। इस पूरे घटनाक्रम में मोहन यादव की समयबद्ध रणनीति, बीजेपी की सतर्कता और कांग्रेस की आंतरिक कलह ने मिलकर एक यादगार राजनीतिक सफलता दर्ज की। यह चुनाव रणनीति, विश्वासघात और अंतिम समय की चालाकी का शानदार उदाहरण बन गया।