छतरपुर। जिले में रूँझ-मझगांय और केन-बेतवा लिंक परियोजना की भेंट चढ़ रहे विस्थापित परिवारों की चीख अब सत्ता के गलियारों को हिलाने लगी है। कुपी में अपनी पैतृक जमीनों, घने जंगलों और अपने वजूद को बचाने के लिए पिछले कई दिनों से भूख हड़ताल पर बैठे प्रभावित किसानों, दलितों और आदिवासी आंदोलनकारियों के बीच आज मध्य प्रदेश विधानसभा के नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार पहुंचे। धार जिले की गंधवानी सीट से कांग्रेस के कद्दावर आदिवासी विधायक सिंघार ने अनशन स्थल पर पहुंचकर न सिर्फ पीड़ितों के आंसू पोंछे और उनका दर्द साझा किया, बल्कि विस्थापन की नीति को लेकर भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) सरकार पर तीखा प्रहार भी किया। नेता प्रतिपक्ष के इस दौरे के बाद कुपी का यह अनशन स्थल अब एक बड़े राजनीतिक और सामाजिक आंदोलन के मुख्य केंद्र में तब्दील हो चुका है।


सड़क से लेकर सदन तक छिड़ेगा बड़ा संग्राम, सरकार को दी खुली चेतावनी

मध्य प्रदेश कांग्रेस के प्रमुख आदिवासी चेहरे उमंग सिंघार ने अनशनकारियों को संबोधित करते हुए साफ किया कि यह लड़ाई अब सिर्फ कुपी के मैदान तक ही सीमित नहीं रहने वाली है। उन्होंने भाजपा सरकार को आड़े हाथों लेते हुए तीन बड़े और कड़े संकल्प दोहराए। उन्होंने कहा कि बिना किसी मुकम्मल और पुख्ता व्यवस्था के गरीबों के आशियाने उजाड़ने वाली सरकार की इस तानाशाही नीति के खिलाफ अब आर-पार का संघर्ष छेड़ा जाएगा। विपक्ष के नेता के तौर पर वे विस्थापितों के इस बेहद गंभीर और संवेदनशील मुद्दे को सड़क से लेकर विधानसभा के भीतर तक पूरी राजनैतिक आक्रामकता के साथ उठाएंगे। जब तक परियोजना से प्रभावित एक-एक परिवार को उनका वाजिब हक, सही मुआवजा और सम्मानजनक पुनर्वास नहीं मिल जाता, तब तक हर स्तर पर यह आंदोलन अनवरत जारी रहेगा।


त्रस्त विस्थापितों को मिली मजबूत आवाज, सरकार के लिए बढ़ी मुश्किलें

केन-बेतवा लिंक परियोजना के अंतर्गत भूमि अधिग्रहण और विस्थापन की मार झेल रहे स्थानीय ग्रामीणों को जहां इस विकट लड़ाई में नेता प्रतिपक्ष के रूप में एक बेहद मजबूत और असरदार राजनैतिक आवाज मिल गई है, वहीं दूसरी ओर प्रदेश की भाजपा सरकार के लिए आने वाले दिनों में मुश्किलें बढ़ने वाली हैं। क्षेत्र के विस्थापितों का आरोप है कि विकास के नाम पर उनके जल, जंगल और जमीन को छीना जा रहा है, लेकिन उनके भविष्य को सुरक्षित करने के लिए कोई ठोस कदम नहीं उठाए गए हैं। राजनैतिक विश्लेषकों का मानना है कि उमंग सिंघार की इस सीधी मैदानी एंट्री के बाद अब सरकार के लिए केन-बेतवा परियोजना के नाम पर हो रहे इस कथित विस्थापन और आदिवासियों के असंतोष पर जवाब देना काफी भारी पड़ने वाला है।