लखनऊ। उत्तर प्रदेश का 2027 विधानसभा चुनाव अभी भले ही दूर नजर आ रहा हो, लेकिन राज्य का सियासी पारा अभी से चढ़ने लगा है। इस बार मुकाबला सिर्फ भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) और समाजवादी पार्टी (सपा) जैसी बड़ी पार्टियों के बीच नहीं होगा, बल्कि दूसरे राज्यों की क्षेत्रीय पार्टियां और यूपी के कई छोटे दल भी मैदान में उतरने की रणनीति बना रहे हैं।


आइए 5 आसान सवालों और जवाबों (Q&A) के जरिए समझते हैं कि 2027 के चुनाव में यह छोटे दल क्यों इतने अहम हो गए हैं और ये बड़े राजनीतिक दलों का खेल कैसे बिगाड़ सकते हैं:


1. कौन-कौन से बाहरी और प्रादेशिक छोटे दल मैदान में उतरने की तैयारी में हैं?

2027 के चुनाव में 5 राज्यों की करीब 12 क्षेत्रीय पार्टियां अपनी किस्मत आजमाने जा रही हैं:


दूसरे राज्यों के दल: बिहार की जनता दल यूनाइटेड (JDU), लोक जनशक्ति पार्टी (LJP), और विकासशील इंसान पार्टी (VIP) के अलावा महाराष्ट्र की शिवसेना (UBT) और एनसीपी (शरद पवार गुट) यूपी में अपने प्रत्याशी उतारने की योजना बना रहे हैं।


यूपी के स्थानीय दल और नेता: असदुद्दीन ओवैसी की AIMIM, चंद्रशेखर आजाद की आजाद समाज पार्टी, पल्लवी पटेल की अपना दल (कमेरावादी), राजा भैया की जनसत्ता दल लोकतांत्रिक, और स्वामी प्रसाद मौर्य की अपनी जनता पार्टी जैसे दल अपनी पकड़ मजबूत करने में लगे हैं।


अन्य प्रभावी दल: पीस पार्टी (डॉ. अयूब अंसारी), महान दल (केशव देव मौर्य), राष्ट्रीय उलेमा काउंसिल (मौलाना आमिर रशादी) और जनवादी पार्टी सोशलिस्ट।


2. ये छोटे दल खुद कितनी सीटें जीत पाते हैं और इनका प्रभाव क्या है?

छोटे दल आमतौर पर अकेले दम पर दर्जनों सीटें नहीं जीत पाते, लेकिन उनका असली प्रभाव उनके कोर वोट बैंक में होता है।


ये दल विशेष जातियों या धार्मिक समुदायों में गहरा प्रभाव रखते हैं। किसी सीट पर अगर 2,000 से 5,000 वोट भी किसी छोटे दल के पाले में चले जाएं, तो वह मुख्य उम्मीदवार की हार-जीत तय कर देता है।


3. बड़ी पार्टियां इन छोटे दलों का इस्तेमाल 'मोहरे' की तरह कैसे करती हैं?

राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, कई बार बड़े दल विरोधी दल के वोट बैंक में सेंध लगाने के लिए छोटे दलों का इस्तेमाल करते हैं:


वोट कटवा प्रत्याशी: बड़ी पार्टियां अपने विरोधी के पारंपरिक वोट बैंक को बांटने के लिए छोटे दलों से खास उम्मीदवार खड़ा करवाती हैं।


समीकरण बिगाड़ना: यदि किसी सीट पर मुस्लिम या दलित वोट सपा या बसपा की ओर जा रहे हों, तो वहां ऐसा प्रत्याशी उतारा जाता है जो उन वोटों को काट सके, जिससे दूसरी बड़ी पार्टी को सीधे फायदा पहुँच जाता है।


4. ओवैसी और चंद्रशेखर की वजह से सपा और बसपा को क्या खतरा है?

AIMIM (ओवैसी): ओवैसी की नजर यूपी की करीब 200 मुस्लिम बहुल सीटों पर है। 2022 के चुनाव में ओवैसी के प्रत्याशियों को भले ही सीमित वोट मिले हों, लेकिन उनकी मौजूदगी के कारण सपा को 7 करीबी मुकाबलों वाली सीटें (जैसे बिजनौर, संभल, शाहगंज आदि) गंवानी पड़ी थीं। 'जय भीम, जय मीम' के नारे से ओवैसी सपा के मुस्लिम-दलित वोट बैंक में सेंध लगा सकते हैं।


आजाद समाज पार्टी (चंद्रशेखर आजाद): नगीना से सांसद बनने के बाद चंद्रशेखर की नजर पश्चिमी यूपी की 18 दलित-मुस्लिम सीटों पर है। मायावती की बसपा की कमजोर पड़ती स्थिति का सीधा फायदा उठाकर चंद्रशेखर दलित वोट बैंक के नए विकल्प के रूप में उभर रहे हैं।


5. भाजपा और अन्य पार्टियों के लिए क्या चुनौतियां हैं?

राजा भैया की जनसत्ता दल: राजा भैया 403 सीटों पर प्रत्याशी उतारने की तैयारी कर रहे हैं। क्षत्रिय/ठाकुर वोट बैंक पर उनकी पकड़ के कारण सीधा नुकसान भाजपा को हो सकता है।


कुर्मी और अन्य ओबीसी वोटों में बिखराव: अनुप्रिया पटेल और पल्लवी पटेल के अलग-अलग चुनाव लड़ने से कुर्मी वोटों में बंटवारा हो सकता है। वहीं महान दल और जनवादी पार्टी सोशलिस्ट जैसी पार्टियां शाक्य और नोनिया समाज के वोटों को प्रभावित कर सकती हैं।


2027 का यूपी चुनाव केवल राज्य स्तरीय गठबंधन का चुनाव नहीं रहेगा, बल्कि यह छोटे दलों की 'इंजीनियरिंग' का चुनाव साबित होगा। जो भी बड़ी पार्टी (भाजपा या सपा) इन छोटे दलों के वोटों के बिखराव को रोकने में कामयाब होगी, उसी के लिए सिरमौर बनने की राह आसान होगी।