दतिया। विधानसभा सीट पर हुए उपचुनाव के नतीजे कल यानी कि 3 अगस्त को सामने आ जाएंगे। भले ही यह केवल एक विधानसभा सीट का उपचुनाव हो, लेकिन इसके परिणाम मध्य प्रदेश की भावी राजनीति, बीजेपी-कांग्रेस के संगठनात्मक ढांचे और कई कद्दावर नेताओं के राजनीतिक कद पर दूरगामी असर डालने वाले हैं। सबसे ज्यादा नजरें राज्य के पूर्व गृहमंत्री डॉ. नरोत्तम मिश्रा पर टिकी हैं। दतिया लंबे समय तक उनका राजनीतिक गढ़ रहा है, लेकिन 2023 की हार के बाद बीजेपी ने इस उपचुनाव में उनका टिकट काटकर आशुतोष तिवारी को प्रत्याशी बनाया है। ऐसे में नतीजों का हर पहलू सीधे तौर पर नरोत्तम मिश्रा की पार्टी में भावी भूमिका से जोड़ा जाएगा। आइए कुछ बिन्दुओं के आधार पर समझते हैं कि दतिया का यह फैसला मध्य प्रदेश की राजनीति में क्या सियासी मायने रखेगा।


सबसे पहले बात करते हैं कि यदि बीजेपी जीतती है तो क्या बदलेगा?

तो राजनैतिक जानकारों का ऐसा मानना है कि यदि बीजेपी चुनाव जीतती है, तो पार्टी नेतृत्व यह संदेश देने में सफल रहेगा कि दतिया किसी एक व्यक्ति या चेहरे का गढ़ नहीं, बल्कि बीजेपी के कैडर और संगठन का किला है। उम्मीदवार बदलने के बाद भी यदि बीजेपी सीट बचा लेती है, तो केंद्रीय नेतृत्व भविष्य में अन्य सीटों पर भी कड़े फैसले लेने में ज्यादा सहज हो जाएगा। इसके साथ ही टिकट न मिलने के बावजूद प्रचार में सक्रिय रहे नरोत्तम मिश्रा के चुनाव प्रबंधन और संगठनात्मक उपयोगिता का दावा भी मजबूत होगा, जिसके आधार पर उन्हें केंद्र, संगठन, राज्यसभा या आगामी चुनाव प्रबंधन में बड़ी जिम्मेदारी दी जा सकती है। वहीं पर पार्टी यह संदेश भी दे सकती है कि बिना नरोत्तम के भी दतिया में बीजेपी का दबदबा बरकरार है। अगर प्रदेश नेतृत्व की बात करें तो डॉ. मोहन यादव के मुख्यमंत्री बनने के बाद दतिया उपचुनाव सीएम मोहन यादव के नेतृत्व की बड़ी अग्निपरीक्षा है। जीत से यह साबित होगा कि सरकार के कामकाज और संगठन के साथ उनका तालमेल चुनावी धरातल पर सफल है। वहीं बतौर प्रदेश अध्यक्ष हेमंत खंडेलवाल का भी यह पहला उपचुनाव है। जीत मिलने पर संगठन पर उनकी पकड़ और मजबूत होगी तथा 2028 के आगामी विधानसभा चुनाव की रणनीति तय करने में उन्हें खुली छूट मिल सकती है।


अब बात करते हैं कांग्रेस की, यदि कांग्रेस जीतती है तो क्या बदलेगा?

यदि कांग्रेस यह सीट झटक लेती है, तो बीजेपी द्वारा नरोत्तम मिश्रा का टिकट काटने के फैसले की तीखी समीक्षा होगी। विपक्ष का हमला होगा कि नरोत्तम के बिना बीजेपी अपना पुराना गढ़ भी नहीं बचा सकी। इससे यह सवाल उठेगा कि क्या पार्टी ने अपना सबसे मजबूत स्थानीय चेहरा खो दिया या फिर अंदरूनी गुटबाजी हार की वजह बनी। वहीं सत्ता में रहते हुए अपने ही गढ़ की सीट गंवाना बीजेपी के लिए बहुत बड़ा झटका होगा। हालांकि एक उपचुनाव पूरे प्रदेश का जनमत नहीं होता, लेकिन कांग्रेस इसे 2028 के विधानसभा चुनाव से पहले सरकार विरोधी माहौल के रूप में भुनाने की कोशिश जरूर करेगी। कांग्रेस की जीत का सीधा फायदा प्रदेश अध्यक्ष जीतू पटवारी को भी मिलेगा। लगातार चुनावी असफलताओं के बीच दतिया जैसी हाई-प्रोफाइल सीट जीतना उनके नेतृत्व की बड़ी उपलब्धि माना जाएगा। इससे कांग्रेस संगठन में उनकी पकड़ मजबूत होगी और 2028 की रणनीति तय करने में उनका प्रभाव काफी बढ़ जाने की संभावना है। तो फिलहाल तो कल का इंतजार है, जब ईवीएम के खुलते ही दतिया का जनादेश स्पष्ट हो जाएगा। अब यह सीट भाजपा संगठन के चेहरे से बड़े होने का प्रमाण होगी, या कांग्रेस के लिए पुनरुत्थान की पहल, यह आने वाला वक्त तय करेगा।