बद्रीनाथ | उत्तराखंड के पवित्र धाम बद्रीनाथ में चल रही कथा के बीच शनिवार को पीठाधीश्वर पूज्य बागेश्वर धाम सरकार (पंडित धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री) का एक बेहद भावुक और हृदयस्पर्शी रूप देखने को मिला। तृतीय दिवस की कथा की समाप्ति के बाद जब वे आश्रम लौट रहे थे, तब रिमझिम बारिश के बीच सड़क किनारे भुट्टे बेच रही नेपाल की एक छोटी सी बच्ची और उसके बेबस पिता पर उनकी नजर पड़ी। पूज्य सरकार ने न केवल उस बच्ची का हौसला बढ़ाया, बल्कि संवेदनशीलता का परिचय देते हुए उसके सारे भुट्टे खरीदकर वहां मौजूद श्रद्धालुओं में वितरित करवा दिए।


बारिश के बीच पन्नी के नीचे भुट्टे बेच रहा था परिवार

चश्मदीदों के मुताबिक, घटना बद्रीनाथ आश्रम से तार वाले ब्रिज की दूसरी ओर की है। पहाड़ों में हो रही रिमझिम वर्षा और कड़ाके की ठंड के बीच एक छोटे से चबूतरे पर पन्नी तानकर नेपाल की एक मासूम बच्ची अपने पिता के साथ अंगीठी पर भुट्टे भूनकर बेच रही थी। मौसम खराब होने के कारण वहां राहगीर बेहद कम थे। इसी दौरान जब बागेश्वर सरकार का काफिला वहां से गुजरा, तो उनकी नजर इस दृश्य पर ठहर गई।


तय दाम से तीन गुना अधिक राशि देकर की आर्थिक सहायता

मासूम बच्ची और उसके पिता के संघर्ष को देखकर पूज्य धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री तुरंत वहीं रुक गए। उन्होंने पहले आत्मीयता से बातचीत करते हुए स्वयं के लिए एक भुट्टा खरीदा। इसके बाद, बच्ची के चेहरे पर मुस्कान लाने के लिए उन्होंने दुकान में बचे हुए बाकी सभी भुट्टे भी एक साथ खरीद लिए।


"पूज्य सरकार ने न केवल सारे भुट्टे खरीदे, बल्कि उस गरीब नेपाली परिवार की आर्थिक मदद के लिए भुट्टों की वास्तविक कीमत से लगभग तीन गुना अधिक धनराशि भेंट की। इसके बाद उन्होंने वे सभी भुट्टे अपने साथ चल रहे और वहां उपस्थित श्रद्धालुओं में प्रसाद के रूप में बंटवा दिए।"

- मौके पर मौजूद श्रद्धालु


श्रद्धालुओं की आंखें हुईं नम, सोशल मीडिया पर चर्चा

बद्रीनाथ की वादियों में रिमझिम फुहारों के बीच सेवा, संवेदना और करुणा का यह जीवंत दृश्य देखकर वहां उपस्थित कई श्रद्धालुओं की आंखें नम हो गईं। उपस्थित जनसमुदाय ने 'बागेश्वर सरकार की जय' के नारे लगाए। इस घटना का वीडियो और तस्वीरें सोशल मीडिया पर भी तेजी से प्रसारित हो रही हैं, जहां लोग कथावाचक के इस सेवाभावी और सहज रूप की जमकर सराहना कर रहे हैं। संतों ने भी इस पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि सनातन धर्म यही सिखाता है कि समर्थ होने पर समाज के अंतिम पायदान पर खड़े व्यक्ति के आंसू पोंछे जाएं।