इंदौर। मध्य प्रदेश में मालवा-निमाड़ की राजनीति का गढ़ और भारतीय जनता पार्टी (BJP) का सबसे मजबूत किला माना जाने वाला इंदौर इन दिनों अंदरूनी गुटबाजी और सांगठनिक उपेक्षा का शिकार हो रहा है। पूरे प्रदेश में निगमों, मंडलों और स्थानीय निकायों में राजनीतिक नियुक्तियों का दौर लगभग पूरा हो चुका है, लेकिन इंदौर के खाते में अब तक सत्ता या संगठन का एक भी प्रमुख पद नहीं आया है। जिले के कार्यकर्ता और स्थानीय नेता खुद को ठगा सा महसूस कर रहे हैं, क्योंकि कभी संगठन का रोल मॉडल रहा इंदौर अब राजनीतिक संतुलन और खींचतान के बीच उलझ कर रह गया है।
1. सत्ता की 'रेवड़ियों' से अछूता रहा इंदौर
प्रदेशभर में राजनीतिक कार्यकर्ताओं को उपकृत करने के लिए विभिन्न आयोगों, निगम-मंडलों और प्राधिकरणों में नियुक्तियां की जा चुकी हैं, लेकिन इंदौर का प्रतिनिधित्व शून्य है: प्रदेश की लगभग सभी नगर निगमों और नगर परिषदों में एल्डरमैन मनोनीत किए जा चुके हैं, परंतु इंदौर नगर निगम में एल्डरमैन की घोषणा रोक दी गई है। कॉलेजों की जनभागीदारी समितियों से लेकर जिला स्तरीय निकायों तक में इंदौर के कार्यकर्ताओं को जगह नहीं मिल सकी है।
2. संगठन का 'प्रयोगशाला' मॉडल हुआ सुस्त
इंदौर को हमेशा से भाजपा संगठन के नए प्रयोगों का केंद्र माना जाता रहा है, जहां बने फॉर्मूले पूरे देश में लागू किए गए: चुनाव और संगठन प्रबंधन के लिए 'शक्ति केंद्र' का फॉर्मूला सबसे पहले इंदौर में ही तैयार हुआ, जिसे बाद में राष्ट्रीय स्तर पर अपनाया गया। तत्कालीन संगठन महामंत्री सुहास भगत के कार्यकाल में पदों के लिए उम्र का बंधन तय किया गया था। इसी मॉडल के तहत 35 वर्ष से कम के मंडल अध्यक्ष और 40 से कम उम्र के गौरव रणदीवे को नगर अध्यक्ष की कमान सौंपी गई थी। इस सफल प्रयोग को भी देशव्यापी पहचान मिली थी। इसके बावजूद, वर्तमान में इंदौर भाजपा के मोर्चे और प्रकोष्ठों के मुखियाओं की घोषणा लंबे समय से लंबित है।
3. अंदरूनी गुटबाजी को माना जा रहा मुख्य कारण
राजनीतिक विश्लेषकों और पार्टी सूत्रों के अनुसार, इंदौर में शीर्ष नेताओं और गुटों के बीच सामंजस्य की कमी के कारण नियुक्तियों की फाइलें अटकी हुई हैं। हर शक्ति केंद्र अपने समर्थकों को तवज्जो दिलाना चाहता है, जिसके चलते आम सहमति नहीं बन पा रही है और प्रदेश संगठन ने इंदौर के फैसलों को होल्ड पर डाल रखा है।




