कोलंबो। पाकिस्तान के सर्वोच्च न्यायालय ने कहा है कि महिलाओं को हिंसा से सुरक्षित रखने के लिए केवल सामाजिक सोच में बदलाव पर्याप्त नहीं है, बल्कि मामलों की जांच भी लैंगिक संवेदनशीलता के साथ की जानी चाहिए। अदालत ने अपने फैसले में कहा कि यदि जांच प्रक्रिया में पूर्वाग्रह या भेदभाव शामिल हो जाए, तो वह सच्चाई तक पहुंचने की प्रक्रिया को प्रभावित कर सकता है। इससे न्यायाधीश के सामने सबूत पहुंचने से पहले ही तथ्यों की निष्पक्ष पड़ताल बाधित हो सकती है। श्रीलंका के अखबार डेली मिरर की रिपोर्ट के अनुसार, दो सदस्यीय पीठ की ओर से फैसला लिखते हुए जस्टिस मोहम्मद हाशिम खान काकर ने कहा कि पुलिस अधिकारियों को महिलाओं के खिलाफ हिंसा से जुड़े मामलों की जांच करते समय लैंगिक और पितृसत्तात्मक पूर्वाग्रहों को पहचानने और उनसे ऊपर उठने का प्रशिक्षण दिया जाना चाहिए।

अदालत का यह फैसला हत्या के एक मामले में आया है, लेकिन रिपोर्ट के मुताबिक इसका महत्व केवल एक हत्या तक सीमित नहीं है। रिपोर्ट में कहा गया है कि अदालत ने स्पष्ट किया कि महिलाओं के खिलाफ अपराधों की जांच करते समय पूर्वाग्रह और लैंगिक रूढ़ियों से बचना जरूरी है, क्योंकि ऐसी मानसिकता निष्पक्ष जांच और न्याय में बाधा बन सकती है। अदालत का मानना है कि महिलाओं की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए सामाजिक बदलाव के साथ-साथ जेंडर-सेंसिटिव और निष्पक्ष जांच प्रक्रिया भी आवश्यक है।

रिपोर्ट में कहा गया है कि सुप्रीम कोर्ट की यह टिप्पणी एक असहज सच्चाई को उजागर करती है कि जब जांच में पूर्वाग्रह शामिल हो जाता है, तो वह न्यायाधीश के सामने सबूत पहुंचने से पहले ही सच्चाई की खोज को प्रभावित कर सकता है।

घरेलू हिंसा आपराधिक न्याय प्रणाली के लिए एक विशेष चुनौती है, क्योंकि ऐसे अपराध अक्सर बंद कमरों के भीतर होते हैं। अदालत ने कहा कि ऐसे मामलों में त्रासदी केवल यह नहीं है कि किसी महिला की उसके घर में हत्या हो सकती है, बल्कि यह भी है कि उसकी मौत से जुड़े हालात घर की चारदीवारी के भीतर छिपे रह सकते हैं।

अदालत ने कहा कि कानूनी व्यवस्था की जिम्मेदारी है कि वह सच को उजागर करे, न कि वैवाहिक घर की निजता को अपराधियों के लिए सुरक्षा कवच बनने दे। घरेलू मामलों में पारंपरिक धारणाएं और सबूतों से जुड़ी सामान्य अपेक्षाएं अक्सर महिलाओं के खिलाफ काम कर सकती हैं।

ऐसे मामलों में स्वतंत्र प्रत्यक्षदर्शी नहीं होते, भौतिक सबूत छिपाए जा सकते हैं और परिवार के सदस्य पुलिस या अदालत के सामने गवाही देने के लिए तैयार नहीं होते। यदि हिंसा के कारण पीड़िता की मौत हो जाती है, तो वह अपना पक्ष भी नहीं रख सकती।

पाकिस्तान के सुप्रीम कोर्ट ने अधिकारियों को उपलब्ध सभी सबूतों की पहचान करने, उनकी सुरक्षा सुनिश्चित करने और उन्हें रिकॉर्ड पर सुरक्षित रखने पर विशेष ध्यान देने का निर्देश दिया है। इस फैसले ने जांच प्रक्रिया की भी गहन समीक्षा की आवश्यकता पर जोर दिया है।

इस महीने की शुरुआत में एक मानवाधिकार संगठन ने बताया था कि पाकिस्तान के पंजाब प्रांत में ही 2021 से 2025 के बीच महिलाओं और लड़कियों से जुड़े 1,95,787 मामले दर्ज किए गए। स्थानीय मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, यह संख्या देशभर में दर्ज लैंगिक हिंसा के कुल मामलों का लगभग 82 प्रतिशत है।

पीस एंड जस्टिस नेटवर्क पाकिस्तान की नेशनल जेंडर-बेस्ड वायलेंस क्राइम रिपोर्ट 2021-25 के अनुसार, पंजाब में घरेलू हिंसा के 14,824 मामले दर्ज हुए, जिनमें 3,746 मामलों में महिलाओं की हत्या की गई। इसके अलावा 830 ऑनर किलिंग और 442 महिलाओं को जलाने के मामले दर्ज हुए, जिनमें 143 एसिड अटैक और 299 स्टोव से जलाने की घटनाएं शामिल थीं।

रिपोर्ट के अनुसार, यौन हिंसा भी एक बड़ी समस्या के रूप में सामने आई। इस अवधि में ऐसे 20,560 मामले दर्ज हुए। इनमें 16,827 दुष्कर्म, 2,183 सामूहिक दुष्कर्म, 189 हिरासत में यौन हिंसा और 1,361 अनाचार (इंसेस्ट) के मामले शामिल थे।

रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि 2021 से 2025 के बीच पंजाब में 90,965 अपहरण और किडनैपिंग के मामले दर्ज हुए, जो सभी श्रेणियों में सबसे अधिक थे। इसके अलावा 68,165 अन्य प्रकार की लैंगिक हिंसा के मामले भी दर्ज किए गए।

आंकड़ों के अनुसार, पंजाब में 2021 में 23,032 मामले, 2022 में 28,080, 2023 में 35,238, 2024 में 52,824 और 2025 में 56,613 मामले दर्ज किए गए, जो लगातार बढ़ती समस्या की ओर संकेत करते हैं।