वृंदावन। हिंदू धर्म में शरद पूर्णिमा का त्योहार बेहद खास माना जाता है। इस दिन मंदिरों में भगवान श्रीकृष्ण की विशेष पूजा-अर्चना होती है और उनकी लीलाओं को याद किया जाता है। लेकिन वृंदावन के बांके बिहारी मंदिर में इस पर्व का उत्साह कुछ अलग ही होता है। शरद पूर्णिमा के अवसर पर ठाकुर बांके बिहारी जी के दिव्य दर्शन के लिए भक्त पूरे साल इंतजार करते हैं। मान्यता है कि इसी पावन रात भगवान श्रीकृष्ण ने गोपियों के साथ महारास रचाया था। इसी परंपरा और आस्था से बांके बिहारी जी का शरद पूर्णिमा उत्सव जुड़ा है।

वृंदावन के प्रसिद्ध बांके बिहारी मंदिर में शरद पूर्णिमा के दिन ठाकुर जी के दर्शन का विशेष महत्व है। इस अवसर पर उनके शृंगार और दर्शन की परंपरा भक्तों के लिए आकर्षण का केंद्र रहती है। माना जाता है कि शरद पूर्णिमा पर बांके बिहारी जी की महारास से जुड़ी मनोहारी छवि भक्तों को देखने का अवसर मिलता है। यही वजह है कि दूर-दूर से श्रद्धालु इस खास दिन वृंदावन पहुंचते हैं।

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, आश्विन मास की इस पूर्णिमा की रात को भगवान श्रीकृष्ण ने यमुना तट पर गोपियों के साथ महारास रचाया था। इसी पावन लीला की याद में यह उत्सव मनाया जाता है। इस विशेष दिन पर ठाकुरजी गर्भ गृह से बाहर आकर 'जगमोहन' में चांदी के सिंहासन पर विराजमान होते हैं। बांके बिहारी जी साल भर में केवल शरद पूर्णिमा की रात को ही अपने कर-कमलों में बंसी और मोर-मुकुट सहित संपूर्ण सोलह शृंगार धारण करते हैं। प्रभु को सफेद वस्त्रों और विशेष रूप से खीर तथा चंद्रकला का भोग अर्पित किया जाता है।

शरद पूर्णिमा पर बांके बिहारी जी का विशेष शृंगार भक्तों के मन को मोह लेता है। इस अवसर पर ठाकुर जी की छवि को महारास की परंपरा से जोड़कर देखा जाता है। यही कारण है कि बांके बिहारी जी के इस खास स्वरूप के दर्शन को लेकर श्रद्धालुओं में खास उत्साह रहता है। मंदिर में गूंजते भजन, जयकारे और भक्तों की श्रद्धा पूरे वातावरण को भक्तिमय बना देते हैं।

शरद पूर्णिमा की रात को चंद्रमा अपनी सोलह कलाओं से युक्त होता है, इसलिए खुले आसमान के नीचे खीर रखने की परंपरा है। कहा जाता है कि जब चंद्रमा की अमृतमयी किरणें खीर पर पड़ती हैं तो उसमें औषधीय गुण आ जाते हैं। अगले दिन सुबह इस खीर को प्रसाद के रूप में ग्रहण करने से कई व्याधियों से मुक्ति मिलती है और शरीर को आरोग्य की प्राप्ति होती है।