नई दिल्ली। हिंदू सनातन परंपरा में पितृ पक्ष का विशेष धार्मिक महत्व माना गया है। श्राद्ध पक्ष के दौरान श्रद्धालु अपने पूर्वजों की आत्मा की शांति और उनके निमित्त तर्पण, पिंडदान एवं विभिन्न धार्मिक अनुष्ठान करते हैं। देशभर में कई तीर्थस्थल श्राद्ध और तर्पण के लिए प्रसिद्ध हैं, लेकिन राजस्थान के पुष्कर को पितृ कर्म के लिए विशेष तीर्थ माना जाता है। मान्यता है कि यहां श्रद्धालु अपने 7 कुलों और 5 पीढ़ियों तक के पूर्वजों के निमित्त श्राद्ध कर्म कर सकते हैं।तीर्थ गुरु पुष्कर धार्मिक, ऐतिहासिक और आध्यात्मिक दृष्टि से भारत के प्रमुख तीर्थस्थलों में शामिल है। पुष्कर की सबसे बड़ी विशेषताओं में यहां स्थित जगत पिता भगवान ब्रह्मा का मंदिर है। हिंदू मान्यता में भगवान ब्रह्मा को सृष्टि का रचयिता माना जाता है और पुष्कर में स्थित उनका मंदिर देश-दुनिया से आने वाले श्रद्धालुओं के लिए प्रमुख आस्था केंद्र है। पुष्कर की धार्मिक महत्ता केवल ब्रह्मा मंदिर तक सीमित नहीं है। पुष्कर सरोवर के किनारे पितरों के निमित्त तर्पण, पिंडदान और श्राद्ध कर्म की परंपरा लंबे समय से चली आ रही है। मान्यता के अनुसार, यहां श्रद्धा के साथ किए गए श्राद्ध और तर्पण से पितरों को शांति और मोक्ष की प्राप्ति होती है। पुष्कर के तीर्थ पुरोहितों के पास देश के अलग-अलग हिस्सों से आने वाले श्रद्धालुओं और उनके पूर्वजों की पोथियां भी सुरक्षित रहती हैं। इन पोथियों में परिवार और पूर्वजों से संबंधित नाम एवं विवरण दर्ज होने की परंपरा बताई जाती है। देश के अलग-अलग क्षेत्रों से जुड़े तीर्थ पुरोहित यहां आने वाले श्रद्धालुओं की परंपरा और मान्यता के अनुसार श्राद्ध, तर्पण, पिंडदान तथा पितृ शांति के अनुष्ठान करवाते हैं। पुष्कर में 7 कुल और 5 पीढ़ियों तक के पूर्वजों के निमित्त श्राद्ध करने की परंपरा है, जबकि देश में अन्य तीर्थ स्थलों पर एक या दो पीढ़ी तक के पूर्वजों के लिए श्राद्ध किए जाते हैं। भगवान श्रीराम ने भी पुष्कर में अपने 7 कुल और 5 पीढ़ियों के पूर्वजों का उद्धार यहां श्राद्ध करके किया था। पुष्कर जगत पिता ब्रम्हा की नगरी है। वहीं पवित्र पुष्कर सरोवर के जल को नारायण के रूप में पूजा जाता है। यहां श्रद्धा के साथ पूर्वजों के निमित्त श्राद्ध करने से पितरों को मोक्ष की प्राप्ति होती है। पुष्कर में श्राद्ध कर्म को लेकर धार्मिक कथाएं भी प्रचलित हैं। तीर्थ पुरोहितों के अनुसार, भगवान श्रीराम ने भी पुष्कर में अपने पूर्वजों के निमित्त श्राद्ध कर्म किया था। एक मान्यता के अनुसार भगवान श्रीराम अपनी पत्नी सीता और भाई लक्ष्मण के साथ पुष्कर आए थे और उन्होंने अपने पिता महाराज दशरथ का श्राद्ध किया। इसके बाद राजा दशरथ ने उन्हें आशीर्वाद दिया। इसी धार्मिक परंपरा और मान्यता के कारण पुष्कर को पितृ कर्म के लिए महत्वपूर्ण माना जाता है। पुष्कर सरोवर 52 घाटों से घिरा हुआ है। यहां श्रद्धालु स्नान, पूजा, तर्पण और अन्य धार्मिक अनुष्ठान करते हैं। धार्मिक मान्यता के अनुसार पुष्कर सरोवर में स्नान करने से आध्यात्मिक शुद्धता प्राप्त होती है। पितृ पक्ष के दौरान सरोवर के घाटों पर श्रद्धालुओं की विशेष चहल-पहल रहती है। इसके साथ ही पुष्कर स्थित गया कुंड का भी विशेष महत्व है। मान्यता है कि जो गया (बिहार) जाकर अपने पितरों का श्राद्ध नहीं कर सकता, वह पुष्कर के गया कुंड में श्राद्ध कर सकता है। सदियों से श्रद्धालु पुष्कर में जगतपिता ब्रह्मा के दर्शनों के लिए आते रहे हैं। यहां आने पर श्रद्धालु अपने पूर्वजों के नियमित तर्पण और पिंडदान करवाना नहीं भूलते हैं। कहा जाता है कि श्राद्ध पक्ष के पखवाड़े में शुभ कार्य करना वर्जित माना गया है। पितृ पक्ष के दौरान देश के विभिन्न हिस्सों से श्रद्धालु पुष्कर पहुंचते हैं। मंत्रोच्चार, वैदिक कर्मकांड और पुष्कर सरोवर के घाटों पर होने वाले तर्पण के बीच पूरा वातावरण धार्मिक दिखाई देता है। यही धार्मिक परंपराएं पुष्कर को श्राद्ध और पितृ कर्म के प्रमुख तीर्थस्थलों में विशेष पहचान दिलाती हैं।
नई दिल्ली। हर दिन का पंचांग अपने आप में खास होता है। इसमें तिथि, वार, नक्षत्र, योग, करण और शुभ-अशुभ समय जैसी कई महत्वपूर्ण जानकारियां मिलती हैं। 24 सितंबर 2026, गुरुवार का दिन भी धार्मिक और ज्योतिषीय नजरिए से खास माना जा रहा है। इस दिन भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की त्रयोदशी तिथि रहेगी, जो रात 11:19 बजे तक रहने वाली है। गुरुवार होने की वजह से भगवान विष्णु और बृहस्पति देव की पूजा का भी विशेष महत्व रहेगा। ऐसे में पूजा-पाठ, दान और आध्यात्मिक गतिविधियों के लिए यह दिन अनुकूल माना जा सकता है। दिन की शुरुआत बुधवार सुबह 5:48 बजे सूर्योदय के साथ होगी जबकि सूर्यास्त शाम 5:53 बजे होगा। चंद्रोदय शाम 4:28 बजे और चंद्रास्त अगले दिन तड़के 3:20 बजे होगा। अब बात करें शुभ और अशुभ समय की तो 24 सितंबर को अभिजीत मुहूर्त सुबह 11:27 बजे से दोपहर 12:15 बजे तक रहेगा। हालांकि किसी भी शुभ कार्य के लिए स्थानीय पंचांग के अनुसार समय का मिलान करना बेहतर रहता है। वहीं राहुकाल दोपहर 1:21 बजे से 2:52 बजे तक रहेगा। गुलिक काल सुबह 8:49 बजे से 10:20 बजे तक और यमघण्ट काल सुबह 5:48 बजे से 7:19 बजे तक रहेगा। मान्यता के अनुसार राहुकाल और अन्य अशुभ समय में नए शुभ कार्य शुरू करने से बचना चाहिए। 24 सितंबर को धनिष्ठा नक्षत्र का प्रभाव सुबह 10:36 बजे तक रहेगा। इसके बाद शतभिषा नक्षत्र शुरू होगा। वहीं, धृति योग दोपहर 3:55 बजे तक रहेगा। ज्योतिषीय मान्यताओं में धृति योग को स्थिरता, धैर्य और दृढ़ता से जोड़कर देखा जाता है। ऐसे में इस दौरान मन को शांत रखते हुए महत्वपूर्ण और सकारात्मक कार्यों पर ध्यान देना अच्छा माना जाता है। पंचांग के अनुसार इस दिन करण में कौलव का प्रभाव सुबह 11:06 बजे तक रहेगा। दिन के अन्य विवरणों की बात करें तो सूर्य कन्या राशि में और चंद्रमा कुंभ राशि में रहेंगे। इस दिन दिशाशूल दक्षिण दिशा में बताया गया है, इसलिए मान्यता के अनुसार दक्षिण दिशा की यात्रा करते समय विशेष सावधानी रखी जाती है। धार्मिक दृष्टि से देखें तो शुक्ल पक्ष की त्रयोदशी तिथि को पूजा-पाठ और भगवान की उपासना के लिए शुभ माना जाता है। चूंकि 24 सितंबर को गुरुवार है, इसलिए भगवान विष्णु और गुरु की पूजा करना विशेष महत्व रखता है। श्रद्धालु इस दिन पीले वस्त्र या पीले फूल अर्पित कर सकते हैं, जरूरतमंदों को दान दे सकते हैं और अपनी श्रद्धा के अनुसार विष्णु मंत्र का जाप कर सकते हैं। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार गुरुवार को गुरुजनों का सम्मान और जरूरतमंदों की सहायता करना भी शुभ माना जाता है।
नई दिल्ली। हिंदू धर्म में पंचांग का काफी महत्व होता है। कोई शुभ काम, यात्रा, निवेश या पूजा-पाठ करने से पहले पंचांग जरूर देखा जाता है। पंचांग हिंदू काल-गणना पद्धति है जो सूर्य, चंद्रमा और अन्य ग्रहों की स्थिति पर आधारित है।23 सितंबर 2026 को भाद्रपद माह के शुक्ल पक्ष की द्वादशी तिथि रात 10:50 बजे तक रहेगा। इसके बाद त्रयोदशी तिथि शुरू हो जाएगी। बुधवार को सुबह 6:19 बजे सूर्योदय और शाम 6:18 बजे सूर्यास्त होगा। वहीं, शाम 4:20 चंद्रोदय और तड़के 3:51 बजे चंद्रास्त होगा। बुधवार को वामन जयंती मनाई जाती है। मान्यता है कि इस दिन भगवान विष्णु के पांचवें वामन रूप की पूजा करने से सुख-समृद्धि मिलती है और बाधाएं दूर होती हैं। पंचांग के अनुसार इस दिन सूर्य उत्तराफाल्गुनी नक्षत्र में रहेगा। यह आकाश मंडल का 12वां नक्षत्र है। सिंह राशि के 26 डिग्री 40 मिनट से लेकर कन्या राशि के 10 डिग्री 00 मिनट तक फैला हुआ है। इसके स्वामी सूर्य देव हैं। इस नक्षत्र के देवता अर्यमा (देवताओं और पितरों के प्रमुख) हैं। इस नक्षत्र में जन्मे जातक तेजस्वी, महत्वाकांक्षी, परोपकारी और नेतृत्व क्षमता से परिपूर्ण होते हैं। बुधवार शाम 4:27 बजे तक सुकर्मा योग रहेगा। पंचांग के अनुसार, यह योग 27 नित्य योगों में से सातवां बेहद शुभ और कल्याणकारी योग माना गया है। जब सूर्य और चंद्रमा की गतियों के बीच की दूरी का योग 80 डिग्री 00 मिनट से 93 डिग्री 20 मिनट के अंतराल पर होता है, तब यह योग निर्धारित होता है। इस योग के देवता देवराज इन्द्र हैं, जो ऐश्वर्य और वैभव के प्रतीक माने जाते हैं। इस योग में सगाई, विवाह, गृह प्रवेश, नया वाहन या संपत्ति खरीदना, और नए व्यापार की शुरुआत करना बहुत शुभ माना जाता है। नई नौकरी ज्वाइन करने या किसी नए प्रोजेक्ट/कार्य की शुरुआत करने के लिए इस अवधि को श्रेष्ठ माना गया है। इस दिन अभिजीत मुहूर्त सुबह 11:49 से दोपहर 12:38 बजे तक रहेगा। यह दिन का सबसे शुभ और फलदाई समय माना जाता है। आमतौर पर यह लगभग 48 मिनट (या दिनमान के अनुसार गणना किया गया आठवां मुहूर्त) होता है। माना जाता है कि इस मुहूर्त में किए गए कार्यों से सभी प्रकार के अशुभ प्रभाव या दोष स्वतः नष्ट हो जाते हैं। जब सूर्य ठीक सिर के ऊपर रहते हैं तब अभिजीत मुहूर्त की बेला होती है। बुधवार को अमृतकाल रात 11:34 से रात 1:15 बजे तक रहेगा। ज्योतिष और पंचांग के अनुसार, अमृतकाल एक अत्यंत शुभ, मंगलकारी और सकारात्मक ऊर्जा से भरपूर समयावधि (मुहूर्त) होता है। इसे अमृत के समान उत्तम फल देने वाला माना जाता है। इस दौरान किए गए कार्यों में सफलता की संभावना सबसे अधिक होती है। नए व्यापार, निवेश, पूजा-पाठ, और महत्वपूर्ण यात्रा के लिए यह समय श्रेष्ठ माना गया है। इस दिन राहुकाल दोपहर 12:19 बजे से 1:49 बजे तक रहेगा। हिन्दू ज्योतिष के अनुसार, राहुकाल दिन का वह समय होता है जिसे किसी भी नए या शुभ कार्य की शुरुआत के लिए अशुभ माना जाता है। राहुकाल को सूर्योदय और सूर्यास्त के बीच के समय को 8 बराबर भागों में बांटकर निकाला जाता है, जो हर दिन लगभग 90 मिनट का होता है। स्थान बदलने के साथ इसके समय में भी बदलाव हो जाता है। इस दौरान कोई नया काम शुरू नहीं करना चाहिए, लेकिन जो काम पहले से चल रहे हैं, उन्हें जारी रखा जा सकता है। बुधवार को गुलिक काल सुबह 10:49 से दोपहर 12:19 बजे तक रहेगा। गुलिक काल को 'विषैला समय' भी कहा जाता है। यह एक उपग्रह है, इसको अशुभ माना जाता है। माना जाता है कि इस काल में किए गए कार्य नकारात्मक परिणाम देते हैं। इस काल में कोई नया काम शुरू करने से बचना चाहिए, लेकिन जो काम पहले से चल रहे हैं, उनको जारी रखा जा सकता है। जो काम बार-बार करना चाहते हैं तो इस काल में किया जा सकता है। बैंक में पैसे जमा करना, दान देना या निवेश करना इस काल में अच्छा माना जाता है। इस दिन यमगंड काल सुबह 7:49 से 9:19 बजे तक रहेगा। यह समय मृत्यु के देवता यमराज से जुड़ा हुआ माना जाता है। इस समय के दौरान स्वास्थ्य, दीर्घायु या सामान्य दुर्भाग्य से संबंधित बाधाओं का सामना करना पड़ सकता है। इस काल को नए कार्यों की शुरुआत के लिए अशुभ माना जाता है। नया व्यापार या नया काम शुरू करने से बचना चाहिए। इस दौरान किसी यात्रा पर भी निकलने से बचना चाहिए और पैसों के लेनदेन से भी बचना चाहिए। बुधवार को सूर्य कन्या राशि में स्थित रहेंगे, जब सूर्य कन्या राशि में प्रवेश करते हैं, तो इसका प्रभाव व्यक्ति के जीवन, कामकाज और बौद्धिक क्षमता पर विशेष रूप से पड़ता है। ज्योतिषीय मान्यता के अनुसार, इस दौरान व्यावहारिक और योजनाबद्ध तरीके से काम करना लाभकारी माना जाता है। इस दिन चंद्रमा मकर राशि में स्थित रहेगा। जब चंद्रमा मकर राशि में रहता है तो लोगों की भावनाओं पर मकर राशि के स्वामी शनि का प्रभाव होता है। इससे व्यक्ति का स्वभाव काफी व्यवहारिक और अनुशासित हो जाता है। बुधवार को दिशाशूल उत्तर दिशा में रहेगा। ज्योतिष और वास्तु शास्त्र के अनुसार, दिशाशूल उस अशुभ दिशा को कहते हैं, जिसमें किसी खास दिन यात्रा करना या निकलना अशुभ माना जाता है।
नई दिल्ली। हिंदू धर्म में पंचांग का काफी महत्व होता है। कोई शुभ काम, यात्रा, निवेश या पूजा-पाठ करने से पहले पंचांग जरूर देखा जाता है। पंचांग हिंदू काल-गणना पद्धति है जो सूर्य, चंद्रमा और अन्य ग्रहों की स्थिति पर आधारित है। 22 सितंबर 2026 को भाद्रपद माह के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि रात 9:43 बजे तक है। इसके बाद द्वादशी तिथि शुरू हो जाएगी। मंगलवार सुबह 6:19 बजे सूर्योदय और शाम 6:19 बजे सूर्यास्त होगा। वहीं, दोपहर 3:43 चंद्रोदय और रात 2:56 बजे चंद्रास्त होगा। इस दिन परिवर्तनी एकादशी का व्रत रखा जाएगा। भगवान विष्णु (विशेषकर उनके वामन स्वरूप) की पूजा करना सबसे अधिक फलदायी माना गया है। मान्यता है कि इस दिन चातुर्मास के दौरान भगवान विष्णु क्षीर सागर में अपनी करवट बदलते हैं, इसलिए इसे परिवर्तिनी एकादशी कहते हैं। पंचांग के अनुसार इस दिन सूर्य उत्तराफाल्गुनी नक्षत्र में रहेगा। यह आकाश मंडल का 12वां नक्षत्र है। सिंह राशि के 26 डिग्री 40 मिनट से लेकर कन्या राशि के 10 डिग्री 00 मिनट तक फैला हुआ है। इसके स्वामी सूर्य देव हैं। इस नक्षत्र के देवता अर्यमा (देवताओं और पितरों के प्रमुख) हैं। इस नक्षत्र में जन्मे जातक तेजस्वी, महत्वाकांक्षी, परोपकारी और नेतृत्व क्षमता से परिपूर्ण होते हैं। मंगलवार शाम 4:29 बजे तक अतिगंड योग रहेगा। ज्योतिष शास्त्र और पंचांग में बताए गए 27 नित्य योगों में से यह छठा योग है, जिसे एक अशुभ और संघर्षकारी योग माना जाता है। जब सूर्य और चंद्रमा की दूरियों का योग 66 डिग्री 40 मिनट से 80 डिग्री 00 मिनट के बीच होता है, तब यह योग बनता है। इस योग के स्वामी चंद्रमा हैं लेकिन इसकी प्रकृति तामसिक और चुनौतीपूर्ण मानी गई है। इस योग के दौरान विवाह, नया व्यापार, गृह प्रवेश या कृषि से जुड़े अहम कार्य करने से बचना चाहिए। इस दिन अभिजीत मुहूर्त सुबह 11:55 से दोपहर 12:43 बजे तक रहेगा। यह दिन का सबसे शुभ और फलदाई समय माना जाता है। आमतौर पर यह लगभग 48 मिनट (या दिनमान के अनुसार गणना किया गया आठवां मुहूर्त) होता है। माना जाता है कि इस मुहूर्त में किए गए कार्यों से सभी प्रकार के अशुभ प्रभाव या दोष स्वतः नष्ट हो जाते हैं। जब सूर्य ठीक सिर के ऊपर रहते हैं तब अभिजीत मुहूर्त की बेला होती है। मंगलवार को अमृतकाल रात 10:00 से रात 11:44 बजे तक रहेगा। ज्योतिष और पंचांग के अनुसार, अमृतकाल एक अत्यंत शुभ, मंगलकारी और सकारात्मक ऊर्जा से भरपूर समयावधि (मुहूर्त) होता है। इसे अमृत के समान उत्तम फल देने वाला माना जाता है। इस दौरान किए गए कार्यों में सफलता की संभावना सबसे अधिक होती है। नए व्यापार, निवेश, पूजा-पाठ, और महत्वपूर्ण यात्रा के लिए यह समय श्रेष्ठ माना गया है। इस दिन राहुकाल दोपहर 3:19 बजे से 4:49 बजे तक रहेगा। हिन्दू ज्योतिष के अनुसार, राहुकाल दिन का वह समय होता है जिसे किसी भी नए या शुभ कार्य की शुरुआत के लिए अशुभ माना जाता है। राहुकाल को सूर्योदय और सूर्यास्त के बीच के समय को 8 बराबर भागों में बांटकर निकाला जाता है, जो हर दिन लगभग 90 मिनट का होता है। स्थान बदलने के साथ इसके समय में भी बदलाव हो जाता है। इस दौरान कोई नया काम शुरू नहीं करना चाहिए लेकिन जो काम पहले से चल रहे हैं, उन्हें जारी रखा जा सकता है। मंगलवार को गुलिक काल दोपहर 12:19 से 1:49 बजे तक रहेगा। गुलिक काल को 'विषैला समय' भी कहा जाता है। यह एक उपग्रह है, इसको अशुभ माना जाता है। माना जाता है कि इस काल में किए गए कार्य नकारात्मक परिणाम देते हैं। इस काल में कोई नया काम शुरू करने से बचना चाहिए लेकिन जो काम पहले से चल रहे हैं, उनको जारी रखा जा सकता है। जो काम बार-बार करना चाहते हैं तो इस काल में किया जा सकता है। बैंक में पैसे जमा करना, दान देना या निवेश करना इस काल में अच्छा माना जाता है। इस दिन यमगंड काल सुबह 9:19 से 10:49 बजे तक रहेगा। यह समय मृत्यु के देवता यमराज से जुड़ा हुआ माना जाता है। इस समय के दौरान स्वास्थ्य, दीर्घायु या सामान्य दुर्भाग्य से संबंधित बाधाओं का सामना करना पड़ सकता है। इस काल को नए कार्यों की शुरुआत के लिए अशुभ माना जाता है। नया व्यापार या नया काम शुरू करने से बचना चाहिए। इस दौरान किसी यात्रा पर भी निकलने से बचना चाहिए और पैसों के लेनदेन से भी बचना चाहिए। मंगलवार को सूर्य कन्या राशि में स्थित रहेंगे, जब सूर्य कन्या राशि में प्रवेश करते हैं, तो इसका प्रभाव व्यक्ति के जीवन, कामकाज और बौद्धिक क्षमता पर विशेष रूप से पड़ता है। ज्योतिषीय मान्यता के अनुसार, इस दौरान व्यावहारिक और योजनाबद्ध तरीके से काम करना लाभकारी माना जाता है। इस दिन चंद्रमा मकर राशि में स्थित रहेगा। जब चंद्रमा मकर राशि में रहता है तो लोगों की भावनाओं पर मकर राशि के स्वामी शनि का प्रभाव होता है। इससे व्यक्ति का स्वभाव काफी व्यवहारिक और अनुशासित हो जाता है। मंगलवार को दिशाशूल उत्तर और उत्तर-पश्चिम दिशा में रहेगा। ज्योतिष और वास्तु शास्त्र के अनुसार, दिशाशूल उस अशुभ दिशा को कहते हैं, जिसमें किसी खास दिन यात्रा करना या निकलना अशुभ माना जाता है।
नई दिल्ली। हिंदू धर्म में पंचांग का काफी महत्व होता है। कोई शुभ काम, यात्रा, निवेश या पूजा-पाठ करने से पहले पंचांग जरूर देखा जाता है। पंचांग हिंदू काल-गणना पद्धति है जो सूर्य, चंद्रमा और अन्य ग्रहों की स्थिति पर आधारित है।21 सितंबर 2026 को भाद्रपद माह के शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि रात 8:01 बजे तक है। इसके बाद एकादशी तिथि शुरू हो जाएगी। सोमवार सुबह 6:19 बजे सूर्योदय और शाम 6:20 बजे सूर्यास्त होगा। वहीं, दोपहर 3:04 चंद्रोदय और रात 2:01 बजे चंद्रास्त होगा। पंचांग के अनुसार इस दिन सूर्य उत्तराफाल्गुनी नक्षत्र में रहेगा। यह आकाश मंडल का 12वां नक्षत्र है। सिंह राशि के 26 डिग्री 40 मिनट से लेकर कन्या राशि के 10 डिग्री 00 मिनट तक फैला हुआ है। इसके स्वामी सूर्य देव हैं। इस नक्षत्र के देवता अर्यमा (देवताओं और पितरों के प्रमुख) हैं। इस नक्षत्र में जन्मे जातक तेजस्वी, महत्वाकांक्षी, परोपकारी और नेतृत्व क्षमता से परिपूर्ण होते हैं। सोमवार दोपहर 16:04 बजे तक शोभन योग रहेगा। इसको एक अत्यंत शुभ, मंगलकारी और सकारात्मक नित्य योग माना गया है। सौ योगों में से इसको पांचवां योग माना गया है। जब सूर्य और चंद्रमा की गतियों की योग दूरी 53 अंश 20 कला से 66 अंश 40 कला के बीच होती है, तब यह योग बनता है। इस योग के स्वामी देवता या कारक ग्रह देवगुरु बृहस्पति हैं, जिनको ज्ञान, वृद्धि और शुभता का प्रतीक माना जाता है। शोभन योग में किसी भी प्रकार के शुभ कार्य, मांगलिक अनुष्ठान या नई यात्रा की शुरुआत करना बेहद उत्तम माना जाता है। इस दिन अभिजीत मुहूर्त सुबह 11:55 से दोपहर 12:44 बजे तक रहेगा। यह दिन का सबसे शुभ और फलदाई समय माना जाता है। आमतौर पर यह लगभग 48 मिनट (या दिनमान के अनुसार गणना किया गया आठवां मुहूर्त) होता है। माना जाता है कि इस मुहूर्त में किए गए कार्यों से सभी प्रकार के अशुभ प्रभाव या दोष स्वतः नष्ट हो जाते हैं। जब सूर्य ठीक सिर के ऊपर रहते हैं तब अभिजीत मुहूर्त की बेला होती है। सोमवार को अमृतकाल रात 12:01 से रात 1:47 बजे तक रहेगा। ज्योतिष और पंचांग के अनुसार, अमृतकाल एक अत्यंत शुभ, मंगलकारी और सकारात्मक ऊर्जा से भरपूर समयावधि (मुहूर्त) होता है। इसे अमृत के समान उत्तम फल देने वाला माना जाता है। इस दौरान किए गए कार्यों में सफलता की संभावना सबसे अधिक होती है। नए व्यापार, निवेश, पूजा-पाठ, और महत्वपूर्ण यात्रा के लिए यह समय श्रेष्ठ माना गया है। इस दिन राहुकाल सुबह 7:49 बजे से 9:19 बजे तक रहेगा। हिन्दू ज्योतिष के अनुसार, राहुकाल दिन का वह समय होता है जिसे किसी भी नए या शुभ कार्य की शुरुआत के लिए अशुभ माना जाता है। राहुकाल को सूर्योदय और सूर्यास्त के बीच के समय को 8 बराबर भागों में बांटकर निकाला जाता है, जो हर दिन लगभग 90 मिनट का होता है। स्थान बदलने के साथ इसके समय में भी बदलाव हो जाता है। इस दौरान कोई नया काम शुरू नहीं करना चाहिए लेकिन जो काम पहले से चल रहे हैं उन्हें जारी रखा जा सकता है। सोमवार को गुलिक काल दोपहर 1:50 से 3:20 बजे तक रहेगा। गुलिक काल को 'विषैला समय' भी कहा जाता है। यह एक उपग्रह है, इसको अशुभ माना जाता है। माना जाता है कि इस काल में किए गए कार्य नकारात्मक परिणाम देते हैं। इस काल में कोई नया काम शुरू करने से बचना चाहिए लेकिन जो काम पहले से चल रहे हैं, उनको जारी रखा जा सकता है। जो काम बार-बार करना चाहते हैं तो इस काल में किया जा सकता है। बैंक में पैसे जमा करना, दान देना या निवेश करना इस काल में अच्छा माना जाता है। इस दिन यमगंड काल सुबह 10:49 से 12:20 बजे तक रहेगा। यह समय मृत्यु के देवता यमराज से जुड़ा हुआ माना जाता है। इस समय के दौरान स्वास्थ्य, दीर्घायु या सामान्य दुर्भाग्य से संबंधित बाधाओं का सामना करना पड़ सकता है। इस काल को नए कार्यों की शुरुआत के लिए अशुभ माना जाता है। नया व्यापार या नया काम शुरू करने से बचना चाहिए। इस दौरान किसी यात्रा पर भी निकलने से बचना चाहिए और पैसों के लेनदेन से भी बचना चाहिए। सोमवार को सूर्य कन्या राशि में स्थित रहेंगे, जब सूर्य कन्या राशि में प्रवेश करते हैं, तो इसका प्रभाव व्यक्ति के जीवन, कामकाज और बौद्धिक क्षमता पर विशेष रूप से पड़ता है। ज्योतिषीय मान्यता के अनुसार, इस दौरान व्यावहारिक और योजनाबद्ध तरीके से काम करना लाभकारी माना जाता है। इस दिन चंद्रमा मकर राशि में स्थित रहेगा। जब चंद्रमा मकर राशि में रहता है तो लोगों की भावनाओं पर मकर राशि के स्वामी शनि का प्रभाव होता है। इससे व्यक्ति का स्वभाव काफी व्यवहारिक और अनुशासित हो जाता है। सोमवार को दिशाशूल पूर्व दिशा में रहेगा। ज्योतिष और वास्तु शास्त्र के अनुसार, दिशाशूल उस अशुभ दिशा को कहते हैं, जिसमें किसी खास दिन यात्रा करना या निकलना अशुभ माना जाता है।