कलेक्टर बंगले के सामने 'ट्रैफिक का तमाशा', रेंगते वाहन और गायब जिम्मेदार; यह है शहर का वीआईपी हाल!

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छतरपुर (संजय अवस्थी)। शहर की यातायात व्यवस्था इन दिनों पूरी तरह से पटरी से उतर चुकी है। सबसे बुरा हाल शहर के उस 'वीआईपी जोन' का है, जहाँ जिले के शीर्ष अधिकारियों के आवास हैं। पन्ना रोड स्थित कलेक्टर बंगले के ठीक सामने प्रतिदिन शाम होते ही अराजकता की स्थिति निर्मित हो जाती है। विडंबना देखिए कि जिस सड़क से जिले की व्यवस्था का पहिया घूमता है, वहीं की सड़क पर यातायात का पहिया घंटों थमा रहता है।
स्थानीय नागरिकों और राहगीरों के अनुसार, जाम की स्थिति बाबूराम चतुर्वेदी स्टेडियम से शुरू होकर कलेक्ट्रेट के सामने तक पहुँच जाती है। शाम के समय यह जाम लगभग 1 किलोमीटर लंबा हो जाता है। हैरानी की बात यह है कि जिले के सबसे महत्वपूर्ण वीआईपी क्षेत्र में होने के बावजूद यहाँ व्यवस्था संभालने वाला कोई जिम्मेदार नजर नहीं आता। प्रशासन की नाक के नीचे घंटों लोग पसीने से तर-बतर होकर निकलने का रास्ता ढूंढते रहते हैं।
अतिक्रमण की जकड़ में सड़क, पुलिस नदारद
इस भीषण जाम के पीछे दो प्रमुख कारण सामने आ रहे हैं। पहला, सड़क के दोनों ओर बेतरतीब ढंग से लगी हाथ-ठेलियाँ और अवैध अतिक्रमण। सड़क का एक बड़ा हिस्सा इन अस्थाई दुकानों के कब्जे में रहता है, जिससे आवागमन के लिए जगह बेहद कम बचती है। दूसरा और सबसे महत्वपूर्ण कारण है यातायात पुलिस की उदासीनता। व्यस्ततम शाम के समय यहाँ यातायात पुलिस का एक भी जवान तैनात नहीं रहता, जिससे वाहन चालक आपस में उलझते रहते हैं और अव्यवस्था और अधिक गहरा जाती है।
प्रशासनिक अनदेखी पर उठ रहे सवाल
कलेक्टर बंगले के सामने की यह अव्यवस्था पुलिस प्रशासन की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े करती है। पैदल चलने वालों से लेकर दोपहिया और चार पहिया वाहन चालक इस अव्यवस्था के कारण भारी मानसिक और शारीरिक परेशानी झेल रहे हैं। एक पीड़ित राहगीर ने अपना दर्द साझा करते हुए कहा, "शाम के वक्त इस रोड से निकलना किसी जंग जीतने जैसा है। न तो कोई ट्रैफिक पुलिसकर्मी दिखता है और न ही ठेलों को व्यवस्थित किया जा रहा है। घंटों जाम में खड़ा रहना अब हमारी रोज की नियति बन गई है।"
कब जागेगा अमला?
वीआईपी रोड पर लग रहा यह घंटों का जाम इस बात का प्रमाण है कि शहर की ट्रैफिक प्लानिंग केवल कागजों तक सीमित है। यदि जिले के प्रथम नागरिक के घर के सामने यह हाल है, तो शहर की अन्य गलियों की कल्पना करना भी डरावना है। अब देखना यह है कि इस रिपोर्ट के बाद क्या पुलिस विभाग की 'कुंभकर्णी नींद' खुलती है या जनता इसी तरह सड़क पर पिसती रहेगी।


