Wednesday, January 7, 2026

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देशदंगों के आरोपी उमर और शरजील को झटका, कोर्ट ने कहा- भूमिका गंभीर है जमानत नहीं दे सकते

दंगों के आरोपी उमर और शरजील को झटका, कोर्ट ने कहा- भूमिका गंभीर है जमानत नहीं दे सकते

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5 जनवरी 2026, 09:38 am IST
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फरवरी 2020 में दिल्ली दंगों के आरोपी उमर खालिद, शरजील इमाम को सुप्रीम कोर्ट से बड़ा झटका लगा है। कोर्ट ने दोनों की जमानत याचिका खारिज करते हुए साफ कहा कि दंगों में इनकी भूमिका बेहद गंभीर है जिसके चलते इन्हे जमानत नहीं दी जा सकती है। वहीं इस मामले में 5 आरोपियों को सर्वोच्च न्यायालय ने 12 शर्तों के साथ जमानत दे दी है। वहीं सर्वोच्च अदालत ने गुलफिशा फातिमा, मेरान हैदर, शिफा उर रहमान, मोहम्मद सलीम खान और शादाब अहमद को जमानत दी है। अदालत ने कहा कि इन अभियुक्तों को जमानत दिए जाने से उनके विरुद्ध लगाए गए आरोपों में किसी प्रकार की ढील या कमजोरी नहीं मानी जाएगी। इन्हें कुछ शर्तों (लगभग 12 शर्तें) के अधीन जमानत पर रिहा किया जाएगा। यदि किसी भी शर्त का उल्लंघन किया जाता है, तो ट्रायल कोर्ट अभियुक्तों को सुनवाई का अवसर देने के बाद जमानत रद्द करने के लिए स्वतंत्र होगा।


आरोपियों ने फरवरी 2020 के दंगों की बड़ी साजिश रचने से जुड़े मामले में जमानत से इनकार के दिल्ली हाई कोर्ट के 2 सितंबर के आदेश को चुनौती देते हुए शीर्ष न्यायालय का रुख किया था। 10 दिसंबर को सुनवाई पूरी होने के बाद जस्टिस अरविंद कुमार और जस्टिस एनवी अंजारिया की पीठ ने फैसला सुरक्षित रख लिया था।


सॉलीसिटर जनरल तुषार मेहता, अतिरिक्त सॉलीसिटर जनरल एसवी राजू और वरिष्ठ अधिवक्ताओं कपिल सिब्बल, अभिषेक सिंघवी, सिद्धार्थ दवे, सलमान खुर्शीद और सिद्धार्थ लूथरा के बीच लंबी दलीलें चली थीं। दिल्ली पुलिस ने उमर, शरजील और अन्य आरोपियों की जमानत याचिकाओं का कड़ा विरोध करते हुए कहा था कि फरवरी 2020 में दंगे अचानक नहीं हुए थे बल्कि भारत की संप्रभुता पर हमला करने के लिए पूर्व नियोजित तरीके से इन्हें अंजाम दिया गया था। उमर, शरजील और अन्य आरोपियों के खिलाफ गैरकानूनी गतिविधियां (निवारण) अधिनियम, 1967 और तत्कालीन भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) के प्रावधानों के तहत मामला दर्ज किया गया था। उन पर आरोप है कि वे 2020 के दंगों के सरगना हैं, जिनमें 53 लोगों की मौत हुई थी और 700 से अधिक लोग घायल हुए थे।


शरजील इमाम की तरफ से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता सिद्धार्थ दवे ने अदालत में कहा था, वह आतंकवादी नहीं हैं, जैसा कि प्रतिवादी (पुलिस) ने उन्हें कहा है। वह राष्ट्र-विरोधी नहीं हैं, जैसा कि सरकार ने कहा है। वह इस देश के नागरिक हैं, जन्म से नागरिक हैं और उन्हें अब तक किसी भी अपराध के लिए दोषी नहीं ठहराया गया है। उन्होंने दलील दी कि इमाम को 28 जनवरी, 2020 को गिरफ्तार किया गया था, जो कि उत्तर-पूर्वी दिल्ली में हुई सांप्रदायिक हिंसा से पहले की बात है।


उमर खालिद की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने दलील दी कि फरवरी 2020 में जब दंगे भड़के थे तब उनका मुवक्किल दिल्ली में नहीं था और उसे इस तरह कैद में नहीं रखा जा सकता। गुलफिशा फातिमा की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता अभिषेक सिंघवी ने अदालत को बताया कि कार्यकर्ता ने छह साल जेल में बिताए हैं और उन्होंने मुकदमे में देरी को आश्चर्यजनक और अभूतपूर्व बताया।

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