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विचारसदन की घटनाओं से तार-तार होता राष्ट्रीय चरित्र

सदन की घटनाओं से तार-तार होता राष्ट्रीय चरित्र

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PeptechTime
8 फ़रवरी 2026, 05:52 am IST
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देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था में मनमानियों का बाहुल्य होता जा रहा है। विधानसभाओं से लेकर लोकसभा तक में राष्ट्रीय चरित्र का निरंतर पतन हो रहा है। गुण्डागिरी का ऊपर उठता ग्राफ, अपशब्दों की बौछार और आक्रमण के लिए उन्मादी भीड के दृश्य किसी मवाली मंडी के मानिन्द सामने आ रहे हैं। हाथपाई, मारपीट और गालीगलौज से ऊपर उठकर प्राणघातक हमले तक बात पहुंच चुकी है। इन सबके मध्य अब महिलाओं को हथियार बनाकर राष्ट्र की सांस्कृतिक विरासत को भी नस्तनाबूत करने के लिए भी राजनैतिक दलों ने अब कमर कस ली है। संसद के अन्दर का वातावरण अब असुरक्षा के प्रदूषण से इतना भर गया है कि वहां पर सम्मान की सांसें लेने में बेहद कठिनाई होने लगी है। सभापति का पद भी निर्विघ्न रूप से कीचड उछाला जाता रहा है। राज्यपाल से लेकर राष्ट्रपति तक की संवैधानिक गरिमा पतन के गर्त में पहुंचती जा रही है। मतभेदों की वैचारिक भिन्नता अब मनभेद का संघर्ष बन चुका है। संसद के बाहर षडयंत्र करने वाले अब अन्दर का सम्मान भी मिट्टी में मिलाने पर तुल गये हैं। ढीठता की चरम सीमा पर पहुंचने वाले अनेक राजनेताओं का नंगा नाच अब सडकों पर भी मनोरंजन का कारक बनता जा रहा है। खतरनाक आपराधिक घटनाओं में आरोपी बने लोग जब संसद में जनप्रतिनिधि बनकर पहुंचेंगे, तो उनकी मानसिक गंदगी से वहां भी गैगवार जैसी स्थितियां पैदा होना स्वाभाविक ही है। राजनैतिक दलों में बाहुबलियों, भीडबलियों, धनबलियों, गैगबलियों सहित माफियों को बेधडक सम्मान देने की परम्परा अब बेहद तेजी से आगे बढ रही है। आपराधिक प्रवृत्ति के लोगों की दहशत को लोकप्रियता का नया मापदण्ड माना जाने लगा है। घोटालेबाजों की सम्पत्ति ही उन्हें प्रतिष्ठा के नये सोपान तय करा रही है। माफियों के गिरोहों की दखलंदाजी अब कार्यपालिका के दफ्तरों से लेकर सदन के अन्दर तक हो चुकी है। नियम, कानून, व्यवस्था जैसे शब्द केवल निरीह लोगों पर ही कहर बनकर टूट रहे हैं। देश का नाम दुनिया के भाल पर भले ही चमकता दिख रहा हो परन्तु अन्दर के हालातों को विस्फोटक बनाने में लगे उत्तरदायी लोगों के समूह अब आत्मघाती दस्ते बनकर विदेशी षडयंत्र को अमली जामा पहनाने में तेजी से जुट गये हैं। साइबर युग में अतीत की इबारत से लेकर वर्तमान के क्रियाकलापों तक का आइना खुलकर सामने आ चुका है। ऐतिहासिक घटनाओं को विकृत करके इतिहास लिखवाने वालों तक को पोल खुल चुकी है। सत्य को झुठलाकर षडयंत्र को विकसित करने वालों ने लम्बे समय तक देश को अंधकार में रखा और राज्य किया। गुलामी की आदतों में जकडे नागरिकों को शाब्दिक स्वतंत्रता का सब्जबाग दिखाकर गोरों ने केवल सत्ता के चेहरों को ही बदला था। सब कुछ यथावत ही रहा था। चन्द लोगों के द्वारा स्वीकार की गई अंग्रेजियत को समूचे देश पर थोपा गया। विलायती संस्कृति के आगे परम्परागत संस्कारों को दास बना दिया गया। शिक्षा से लेकर चिकित्सा तक, न्यायालयों से लेकर संस्थानों तक और धरती से लेकर आसमान तक पाश्चात्य की जडें मजबूत करने की षडयंत्रकारी योजनायें आज दावानल बनकर देश को निगल रहीं है। लोकतंत्र के मंदिर को भी देश के अन्दर बैठे मीरजाफरों की फौज विखण्डित करने पर तुली है। उदाहरण के तौर पर देखें तो विगत 26 अगस्त 2006 को लोकसभा में हुई जेडीयू और आरजेडी के मध्य हाथापाई हुई। विगत 24 नवंबर 2009 को राज्यसभा में अमर सिंह और अहलूवालिया के मध्य हाथापाई हुई। विगत 5 सितंबर 2012 को राज्यसभा में बीएसपी सांसद अवतार सिंह और एसपी सांसद नरेश अग्रवाल के मध्य हाथापाई हुई। विगत 13 फरवरी 2014 को हुए झगड़े ने अध्यक्ष को कक्ष से भागने पर मजबूर कर दिया और कई सांसदों को अस्पताल ले जाया गया। इस घटना में प्रदर्शनकारी सांसद ने विरोधियों पर मिर्च स्प्रे फेंका था। कांच की मेज को तोड़ा माइक्रोफोन का तार तोड़ दिया था। विगत जनवरी 1988 को एमजी रामचंद्रन की विधवा जानकी के समर्थकों तथा जे. जयललिता के समर्थकों के मध्य हाथापाई हुई जिसमें 20 विधायकों को चोटें आईं थीं तथा 100 से अधिक माइक टूट गए और कई कुर्सियां क्षतिग्रस्त हो गईं। विगत 26 मार्च 1989 को तमिलनाडु विधानसभा में जयललिता पार्टी के सदस्यों और करुणानिधि के डीएमके के विधायकों के बीच हिंसा भड़क उठी। उत्तर प्रदेश  विधानसभा में विगत 16 दिसम्बर 1993 को सत्तापक्ष और विपक्ष के सदस्यों के बीच हुई हाथापाई में अध्यक्ष केसरी नाथ त्रिपाठी सहित 33 विधायक घायल हो गए थे। यहीं पर 21 अक्टूबर 1997 को फिर आक्रामण की घटना हुई जिसमें लगभग 50 सदस्य घायल हो गए थे। इस घटना में माइक्रोफोन स्टैंड, पेपरवेट, कांच के टुकड़े और फर्नीचर का खुलकर प्रयोग हुआ था। इसी तरह 14 सितंबर 2007 को कांग्रेस विधायक भीष्म शर्मा ने भाजपा के मुख्य सचेतक साहब सिंह चौहान पर शारीरिक हमला किया था। पश्चिम बंगाल विधानसभा के बाहर 11 दिसंबर 2012 को सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस और विपक्षी भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी मार्क्सवादी के विधायकों के बीच हाथापाई हुई। तमिलनाडु विधानसभा में भी 2013 में मुक्केबाजी हुई। केरल के विधायकों ने 13 मार्च 2015 में तोड़ीं कुर्सियां, माइक फेंके और मेजों पर चढ़ गए। हिमाचल प्रदेश विधानसभा में 28 अगस्त 2015 को कांग्रेस और विपक्षी भाजपा विधायकों के बीच मारपीट हुई। तमिलनाडु में 18 फरवरी 2017 को तमिलनाडु विधानसभा में राज्य विधायकों द्वारा हिंसा और बर्बरता की घटनाएं हुईं। गुजरात विधानसभा विगत 14 मार्च 2018 को प्रश्नकाल के बाद कांग्रेस और भाजपा विधायकों ने एक-दूसरे पर थप्पड़ और लात-घूंसे बरसाए, माइक्रोफोन भी तोड़े। हरियाणा विधानसभा में 11 सितंबर 2018 को विपक्ष के नेता और इंडियन नेशनल लोकदल के विधायक अभय चौटाला और कांग्रेस विधायक करण सिंह दलाल के बीच अभूतपूर्व लड़ाई देखी गई। बिहार विधानसभा में 24 मार्च 2021 को विपक्षी विधायकों के विरोध के कारण सदन में अभूतपूर्व हंगामा हुआ जिसके बाद स्पीकर के कक्ष की घेराबंदी करने वाले विधायकों को बाहर निकालने के लिए पुलिस को बुलाना पडा। कर्नाटक विधानसभा में 16 फरवरी 2022 को सत्तारूढ़ भाजपा और कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं के बीच हाथापाई हुई। पश्चिम बंगाल विधानसभा में 24 मार्च 2022 को बजट सत्र हाथापाई के साथ समाप्त हुआ जिसमें विधानसभा में टीएमसी और भाजपा विधायकों के बीच हुई मारपीट हुई। महाराष्ट्र विधानसभा में विगत 1 मार्च 2024 को विधान भवन के गलियारे में बड़ी हाथापाई हुई। जम्मू कश्मीर विधानसभा में 7 नवंबर 2024 को विधायकों के बीच हाथापाई हुई और अभी हाल ही में देश की राजधानी का सदन प्रधानमंत्री पर हमले को आमादा विपक्ष की महिला सांसदों की घटना का गवाह बना। यह तो मात्र बानगी है, वास्तविक आंकडे तो इससे कहीं बहुत अधिक हैं। ऐसी घटनायें ही देश के राष्ट्रीय चरित्र को किसी षडयंत्र के तहत तार-तार करने में तेजी से आगे बढती प्रतीत हो रहीं हैं जिन्हें रोके बिना राष्ट्र को विश्वगुरु के आसन पर आसीत करना असम्भव नहीं तो कठिन अवश्य है। इस बार बस इतना ही। अगले सप्ताह एक नई आहट के साथ फिर मुलाकात होगी।


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