खजुराहो नृत्य समारोह: शिव-शक्ति की दिव्य आभा में भक्ति, सौंदर्य और अध्यात्म की अनुपम संगति का सृजन

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छतरपुर। मध्यप्रदेश शासन, संस्कृति विभाग एवं उस्ताद अलाउद्दीन खां संगीत एवं कला अकादमी द्वारा भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण, दक्षिण मध्य क्षेत्र सांस्कृतिक केन्द्र, नागपुर, मध्यप्रदेश पर्यटन विभाग एवं जिला प्रशासन छतरपुर के सहयोग से आयोजित 52वाँ अंतर्राष्ट्रीय खजुराहो नृत्य समारोह के तीसरे दिवस 22 फरवरी, 2026 रविवार को मणिपुरी, ओडिसी एवं सत्रीया नृत्य की सौंदर्यपूर्ण प्रस्तुतियों ने शिव—शक्ति की दिव्य आभा में भक्ति, सौंदर्य और अध्यात्म की अनुपम संगति का सृजन किया। मंदिरों की अलौकिक पृष्ठभूमि में नर्तक नृत्यांगनाओं की गतियाँ मानो शिल्प को स्पंदन और संगीत को स्वरूप प्रदान कर रही थीं। कलाकारों का स्वागत श्री के.के. मिश्रा, एमपी इंडस्ट्रीयल कोर्ट बेंच, जबलपुर के न्याय सदस्य, निदेशक - उस्ताद अलाउद्दीन खां संगीत एवं कला अकादमी प्रकाश सिंह ठाकुर एवं उप निदेशक शेखर करहाड़कर द्वारा पुष्पगुच्छ भेंट कर किया गया।
तीसरे दिवस की पहली प्रस्तुति संगीत नाटक अकादमी अवॉर्डी थोकचोम इबेमुबि देवी, मणिपुर द्वारा मणिपुरी नृत्य की रही। उत्तर—पूर्व की कोमल और अध्यात्ममय परंपराएँ मंच पर साकार हो उठीं। उन्होंने सर्वप्रथम “किईआंदिट्टा” प्रस्तुत की। यह नृत्य-रचना कवि जयदेव के अमर काव्य गीत गोविंद के अष्टम सर्ग पर आधारित थी, जिसमें राधा की वेदना और आहत मनोभावों का अत्यंत मार्मिक चित्रण निहित है- वह क्षण जब श्रीकृष्ण निर्धारित समय पर उनसे मिलने नहीं आते। कथा के अनुसार श्रीकृष्ण पूरी रात्रि चंद्रावली के साथ रति-लीला में निमग्न रहते हैं। प्रातः होते ही उन्हें राधा का स्मरण होता है और वे उनके कुंज में पहुँचते हैं, किंतु उनके अंगों पर प्रेम-लीला के स्पष्ट चिह्न दिखाई देते हैं। इन्हें देखकर राधा का मन विदीर्ण हो उठता है - प्रेम, पीड़ा, ईर्ष्या और आत्मसम्मान के सूक्ष्म भाव एक साथ जागृत होते हैं। नृत्य में नायिका के अंतरद्वंद्व को अत्यंत सूक्ष्म मुखाभिनय, नेत्र-संचालन और मृदुल देह-भंगिमाओं के माध्यम से अभिव्यक्त किया गया। यह प्रस्तुति मुख्यतः अभिनय प्रधान रही, जिसमें लास्य की कोमलता और तांडव की आंतरिक तीव्रता का संतुलित समन्वय दिखाई दिया। करुण रस की प्रधानता ने दर्शकों को गहन भाव-जगत में प्रवेश करा दिया। मणिपुरी की मृदुल लय, गोलाकार गतियाँ और भक्ति-भाव से ओतप्रोत अंग-संचालन ने वातावरण को माधुर्यपूर्ण बना दिया। इस प्रकार तीसरे दिवस का प्रारंभ ही आध्यात्मिक अनुभूति से हुआ - जहाँ प्रेम केवल लौकिक नहीं, बल्कि आत्मा और परमात्मा के मिलन की प्रतीक अनुभूति बनकर मंच पर जीवंत हुआ और खजुराहो की रात्रि भावों की अनुगूँज से दीर्घ समय तक स्पंदित होती रही।
शुद्ध नृत्य में लय, राग और मूर्तिमय गतियाँ
अगली प्रस्तुति पद्मश्री दुर्गाचरण रनवीर, ओडिशा द्वारा ओडिसी नृत्य की रही। उन्होंने सर्वप्रथम आदित्य अर्चना की प्रस्तुति दी। यह ओडिसी की एक भक्तिपरक प्रस्तुति थी, जो प्रकाश, ऊर्जा और जीवन के स्रोत भगवान सूर्य को समर्पित आवाहन है। लयात्मक गतियों और अभिव्यंजक ओडिसी नृत्य-बैले के माध्यम से इस रचना ने सूर्य देव के प्रति श्रद्धा अर्पित की। इसके बाद शुद्ध नृत्य की प्रस्तुति पल्लवी थी, जो राग रागेश्री में निबद्ध थी। इसमें लय, राग और मूर्तिमय गतियाँ पूर्ण सामंजस्य में विकसित हुई। त्रिभंगी की मोहक भंगिमाओं, जटिल पद संचालन और तरल गतियों के माध्यम से कलाकारों ने “पल्लवी” अर्थात “प्रस्फुटन” के अर्थ को साकार किया। प्रस्तुति के अंतिम क्रम में बाल गोपालस्तक प्रस्तुत किया। संत-कवि बिल्वमंगल ठाकुर की रचना पर आधारित इस प्रस्तुति ने बाल मुकुंद के दिव्य बाल्य रूप को चित्रित किया। कलाकारों ने अभिनय के माध्यम से कृष्ण की यशोदा माता के साथ बाल लीलाएँ और वृंदावन के क्रीड़ा प्रसंग जीवंत हो उठे। इस प्रस्तुति में गुरु सुकांत कुमार कुंडू — गायन, गुरु सीताकांत जेना — मर्दल, गुरु अभिराम नंदा — बांसुरी, गुरु प्रदीप राय — वायलिन, गुरु प्रकाश चंद्र महापात्र — सितार एवं मंजीरा पर गुरु दुर्गा चरण रणबीर थे। नृत्य कलाकारों में दीप्ति राउतरे, गायत्री रणबीर, शताब्दी मल्लिक, श्रद्धांजलि राउल, रोहिणी सामल, विदिशा बसुमल्लिक, मनोज प्रधान, शेखर सुमन माझी, गोकुलश्री दास एवं देबाशीष पटनायक थे।
सत्रिया नृत्य परम्परा की अत्यंत सुन्दर रचनाएं प्रस्तुत
तीसरे दिवस की अंतिम प्रस्तुति सत्रिया नृत्य की रही। सत्रीया केन्द्र, असम द्वारा नृत्य प्रस्तुति दी गई। प्रस्तुति के आरम्भ में गायन–बायन से हुआ। सत्रिया नृत्य परम्परा में गायन–बायन पूर्वरंग का अभिन्न अंग है। नाट्यशास्त्र में वर्णित है कि किसी नाट्य प्रस्तुति के प्रारम्भ से पूर्व विघ्नों की निवृत्ति और दिव्य आशीर्वाद की प्राप्ति हेतु कलाकारों एवं वादकों द्वारा पूर्वरंग अनुष्ठान सम्पन्न किया जाता है। इसमें चारी, भ्रामरी एवं हस्तमुद्राओं जैसे शास्त्रीय तत्वों का प्रयोग किया गया। अगली प्रस्तुति भगवान श्रीकृष्ण की स्तुति में एक विनम्र अर्पण थी। इस रचना में देवकीनन्दन श्रीकृष्ण का आह्वान कर उनके दिव्य अनुग्रह की प्रार्थना की गई — उस प्रभु को नमन जो गोवर्धन पर्वत को धारण करने वाले हैं, जिनके कमल सदृश चरण भक्तों को शरण प्रदान करते हैं। इसके बाद राजघरिया चालि की प्रस्तुति दी गई। यह महापुरुष माधवदेव द्वारा एक स्वतंत्र एवं विशिष्ट नृत्य रचना है। यह लास्यधर्मी नृत्य सत्रिया परम्परा की भक्ति भावना को बनाए रखते हुए नृत्य की सौंदर्यात्मकता को दर्शाता है। प्रस्तुति का आरम्भ घोषा – “ऐ भवोका” से एवं उसके पश्चात गीतोर नाच, मिश्र ताल – “गुवारिनी कलंक हमरी” था। अगली प्रस्तुति भोजन बिहर (बहार नाच) की थी। भोजन बिहर जिसे लोकप्रिय रूप से बहार नाच कहा जाता है, सत्रिया परम्परा की अत्यंत सुंदर रचना है। इसे महान वैष्णव संत, कवि एवं नाटककार माधवदेव ने रचा, जो श्रीमंत शंकरदेव के प्रमुख शिष्य थे। यह प्रस्तुति ताल ठुकोनी एवं एकताल राग बसंत में निबद्ध थी। अंतिम प्रस्तुति ओजापाली शैली में दशावतार थी, जो राग आह्नार पर आधारित थी। यह रचना भगवान कृष्ण के चतुर्विंशति अवतार परम्परा से प्रेरित है, जिसमें विभिन्न अवतारों के माध्यम से धर्म की पुनर्स्थापना का संदेश दिया गया। इसमें दस अवतारों — मत्स्य, कूर्म, वराह, नरसिंह, वामन, परशुराम, राम, हलिराम/बलराम, बुद्ध और कल्कि — को सजीव रूप में प्रस्तुत किया गया। प्रत्येक अवतार संरक्षण, संतुलन और धर्म की पुनः स्थापना का प्रतीक है। रचना सुतकला ताल में निबद्ध थी।
