मुंबई। सावन के दूसरे सोमवार के पावन अवसर पर मुंबई से सटे वसई के सुप्रसिद्ध तुंगारेश्वर महादेव मंदिर में भगवान शिव के दर्शन के लिए श्रद्धालुओं का भारी जनसैलाब उमड़ पड़ा। सुबह तड़के से ही मंदिर परिसर में भक्तों की लंबी कतारें लग गईं। ‘हर-हर महादेव’ और ‘ॐ नमः शिवाय’ के जयकारों से पूरा तुंगारेश्वर क्षेत्र भक्तिमय हो उठा।
पहाड़ी पर स्थित तुंगारेश्वर महादेव मंदिर में दर्शन के लिए वसई-विरार के साथ-साथ आसपास के इलाकों और दूर-दराज से भी बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचे। कई भक्त सुबह करीब 4 बजे से ही मंदिर पहुंचने लगे। श्रद्धालुओं ने भगवान शिव का जलाभिषेक कर पूजा-अर्चना की और परिवार की सुख-समृद्धि एवं कल्याण की कामना की।
श्रद्धालुओं की भारी भीड़ को देखते हुए मंदिर परिसर और आसपास के मार्गों पर सुरक्षा एवं भीड़ नियंत्रण के विशेष इंतजाम किए गए हैं। प्रशासन और सुरक्षा व्यवस्था से जुड़े कर्मी लगातार भीड़ को नियंत्रित करने और श्रद्धालुओं को सुगमता से दर्शन कराने में जुटे रहे।
वहीं, सावन के दूसरे सोमवार के चलते वसई-विरार के छोटे-बड़े शिव मंदिरों में भी सुबह से भक्तों की भारी भीड़ देखने को मिली। पूरे क्षेत्र में शिवभक्ति का माहौल नजर आया और जगह-जगह ‘हर-हर महादेव’ के जयकारे गूंजते रहे।
इस अवसर पर विजयानंद जी महाराज सारस्वत ने आईएएनएस से बातचीत में कहा, "सावन का महीना भगवान शिव की पूजा के लिए अत्यंत पवित्र माना जाता है। सोमवार के दिन सनातन धर्म के श्रद्धालुओं में विशेष उत्साह रहता है और आज बड़े से छोटे सभी शिव मंदिरों में भक्तों का हुजूम उमड़ पड़ा है।"
उन्होंने कहा, "श्री तुंगारेश्वर महादेव मंदिर में तो कुंभ जैसा नजारा दिखाई दे रहा है और भारी संख्या में भक्त एकत्रित हुए हैं। शिव की महिमा को समझने के लिए उनके आध्यात्मिक स्वरूप को समझना जरूरी है। शिव का अर्थ ही कल्याण है और जो सभी के कल्याण की कामना करता है, वही शिव है।"
विजयानंद जी महाराज ने कहा, "श्रद्धालु कांवड़ और जल लेकर कई-कई किलोमीटर पैदल चलकर भगवान शिव के दरबार में पहुंचते हैं। यह केवल परंपरा नहीं, बल्कि भगवान शिव के प्रति उनकी गहरी आस्था और भक्ति का प्रतीक है। शिवलिंग पर जल चढ़ाने का आध्यात्मिक अर्थ केवल अभिषेक करना नहीं है, बल्कि भक्त अपने अहंकार, द्वेष और नकारात्मक विचारों को भी भगवान शिव को समर्पित करते हैं। भक्त भोलेनाथ से प्रार्थना करते हैं कि जिस तरह जल से शिव को शीतलता अर्पित की जाती है, उसी तरह उनके हृदय में भी शांति और शीतलता प्रदान हो तथा उनके भीतर के विकार दूर हों।"
उन्होंने कहा, "शिव प्रकाश, ज्योति और निराकार स्वरूप के प्रतीक हैं। सनातन धर्म में साकार और निराकार दोनों स्वरूपों की उपासना की जाती है। शिव सत्य के स्वरूप हैं और इसी भाव को ‘सत्यम् शिवम् सुंदरम्’ के माध्यम से समझाया गया है।"




