छतरपुर। केन-बेतवा लिंक परियोजना से प्रभावित आदिवासियों का चिता आंदोलन अपने सबसे उग्र और संवेदनशील मोड़ पर पहुँच गया है। आंदोलन के आठवें दिन हजारों विस्थापित परिवारों ने सामूहिक भूख हड़ताल का आह्वान किया, जिसके चलते प्रभावित गांवों में चूल्हे तक नहीं जले। बच्चे, महिलाएं और बुजुर्ग सभी एक सुर में न्याय दो या मौत दो के नारे लगाते हुए केन नदी के उस हिस्से में पहुँचे जहाँ जलती चिताओं के प्रतीकात्मक स्वरूप पर लेटकर उन्होंने अपना विरोध दर्ज कराया।


उल्लेखनीय है कि आंदोलन स्थल पर रविवार को बेहद मार्मिक और झकझोर देने वाले दृश्य देखने को मिले। सैकड़ों महिलाएं अपने दुधमुंहे बच्चों के साथ केन नदी के बीच बनी चिताओं पर लेट गईं। भूख और चिलचिलाती धूप से बेहाल होने के बावजूद प्रदर्शनकारियों के इरादे टस से मस नहीं हुए। नदी के किनारों पर हजारों की संख्या में जुटे अन्य आदिवासियों और समर्थकों ने विस्थापितों के इस संघर्ष को अपना समर्थन दिया। आंदोलनकारियों का कहना है कि उनकी जल, जंगल, जमीन और पुरखों की संस्कृति को छीना जा रहा है और बदले में उन्हें उचित मुआवजा और सम्मानजनक विस्थापन नहीं मिल रहा।


आंदोलन का नेतृत्व कर रहे जय किसान संगठन के अमित भटनागर ने जिला प्रशासन पर बेहद गंभीर आरोप लगाए हैं। श्री भटनागर का कहना है कि एक तरफ आदिवासी अपनी जायज मांगों को लेकर शांतिपूर्ण आंदोलन कर रहे हैं, वहीं दूसरी ओर प्रशासन द्वारा आंदोलन स्थल पर मेडिकल सुविधा, राशन और पानी की आपूर्ति को बाधित करने का प्रयास किया जा रहा है। उन्होंने साफ कर दिया कि जब तक विस्थापितों को उनका हक नहीं मिल जाता, यह 'चिता आंदोलन' थमने वाला नहीं है।


वहीं दूसरी ओर, पन्ना कलेक्टर पार्थ जैसवाल ने इस आंदोलन को अवैध करार दिया है। कलेक्टर का दावा है कि परियोजना से प्रभावित अधिकांश लोगों को नियमानुसार मुआवजे की राशि का वितरण किया जा चुका है। प्रशासन ने आंदोलनकारियों को चेतावनी दी है कि क्षेत्र में लागू धारा 163 (पूर्व में धारा 144) का उल्लंघन करने वालों के खिलाफ कड़ी कानूनी कार्रवाई की जाएगी। प्रशासन के इस सख्त रुख ने आंदोलनकारियों के बीच और अधिक असंतोष पैदा कर दिया है।


गौरतलब है कि आठ दिनों से जारी इस गतिरोध ने अब एक व्यापक जनसंघर्ष का रूप ले लिया है। एक तरफ प्रशासन इसे नियम विरुद्ध बता रहा है, तो दूसरी तरफ हजारों जिंदगियां अपनी जमीन और पहचान बचाने के लिए मौत से खेलने को तैयार हैं। केन नदी के तट पर उपजा यह तनाव बुंदेलखंड की सबसे बड़ी परियोजना 'केन-बेतवा लिंक' के भविष्य पर भी सवालिया निशान लगा रहा है। यदि समय रहते संवाद के जरिए बीच का रास्ता नहीं निकाला गया, तो यह स्थिति किसी बड़ी अनहोनी की ओर इशारा कर रही है।