कट्टरता के तले कत्ल होती मानवता

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समूची दुनिया में आतंक का परचम निरंतर ऊंचा होता जा रहा है। ईशनिंदा के नाम पर होने वाली हत्याओं ने सुनामी का रूप ले लिया है। बांग्लादेश सहित अनेक देश इसके ताजा उदाहरण हैं। धार्मिक उन्माद के सामने संविधानिक व्यवस्थाओं की खुलेआम धज्जियां उड रहीं हैं। धरती के मानचित्र पर गैर मुस्लिम लोगों की तेजी से कम होती संख्या, कट्टरता का विकराल होता रूप और स्वार्थी तत्वों की सत्ता लोलुपता से आने वाले समय में गैरमुस्लिम परम्परायें, उसकी शक्तियां और सामर्थ अस्तित्वहीन होने की कगार पर पहुंच गईं हैं। अनेक राजनैतिक चेहरों ने अपनी वास्तविक पहचान को छुपाकर पूर्व निर्धारित षडयंत्र को अंजाम तक पहुंचाने की दिशा में सक्रियता बढा दी है। वर्णशंकर हो चुके इन चेहरों ने पीढियों के नाम पर निहित स्वार्थों की पूर्ति हेतु अभिनेता के व्यवसायिक धर्म को अपना लिया है। धर्म निरपेक्षता को कवच बनाकर छद्मवेशधारियों की एक बडी जमात हाथी के असली दांतों को छुपाने की कोशिश में लगी है। संयुक्त राष्ट्र संघ जैसी संस्थायें भी गैर मुसलमानों के सामूहिक उत्पीडन पर मौन रह जातीं हैं। संसार में इस्लामिक कट्टरपंथियों के लगभग तीन हजार से अधिक आतंकी संगठन हैं। अनेक देशों ने इन्हें अपनी सीमा में सक्रियता के आधार पर प्रतिबंधित किया है, जैसे भारत ने 67 संगठनों को, संयुक्त राज्य अमेरिका ने 70 संगठनों को, यूनाइटेड किंगडम ने 84 संगठनों को, यूरोपीय संघ ने 8 संगठनों को प्रतिबंधित किया है। एक नजर में देखें तो दुनिया भर में इस्लामिक स्टेट, हमास, अल-शबाब, जमात नुसरत अल-इस्लाम वल-मुस्लिमीन, बोको हराम, लश्कर-ए-तैयबा और जैश-ए-मोहम्मद जैसे हजारों गिरोहों की अपनी अलग ही सत्ता है जिसके तले वे गजवा-ए-दुनिया का ख्वाब देख रहे हैं। मुस्लिम देशों के अलावा अनेक पूंजीवादी राष्ट्र इन घातक गिरोहों को पर्दे के पीछे से सहयोग कर रहे हैं। इतिहास गवाह है कि पहला इस्लामी राज्य पैगंबर मुहम्मद साहब द्वारा 622 ईस्वी में मदीना शहर में स्थापित किया गया था, जिसे मदीना के संविधान के तहत पहली राजनीतिक इकाई माना जाता है। उनके बाद इस श्रंखला को खलीफाओं द्वारा विस्तार दिया गया। वर्तमान समय में मुस्लिम बाहुल्य देशों की संख्या 50 से अधिक हो चुकी है। संसार के 30 देशों में इस्लाम को मानने वालों का प्रतिशत 90 से अधिक हो चुका है जबकि 20 देशों में मुस्लिम आबादी 75 प्रतिशत के पार पहुंच चुकी है। आंकडे बताते हैं कि 26 देशों के संविधान में इस्लाम को राजकीय धर्म के रूप में घोषित किया जा चुका है जिनमें अफगानिस्तान, अल्जीरिया, बांग्लादेश, बहरीन, ब्रुनेई, कोमोरोस, जिबूती, मिस्र, ईरान, इराक, जॉर्डन, कुवैत, लीबिया, मालदीव, मलेशिया, मॉरिटानिया, मोरक्को, ओमान, पाकिस्तान, फिलिस्तीन, कतर, सऊदी अरब, सहरावी गणराज्य, सोमालिया, ट्यूनीशिया, संयुक्त अरब अमीरात और यमन शामिल हैं। ईसाई धर्म को संविधान में राजकीय धर्म घोषित करने वाले देशों में यूनाइटेड किंगडम यानी इंग्लैंड, डेनमार्क, आइसलैंड, नॉर्वे, ग्रीस, आर्मेनिया, जॉर्जिया, वेटिकन सिटी, लिचेंस्टीन, माल्टा, मोनाको, कोस्टा रिका, अर्जेंटीना, डोमिनिकन रिपब्लिक, सामोआ, टोंगा, तुवालु और जाम्बिया जैसे कई देश शामिल हैं जबकि भूटान और कंबोडिया का राजकीय धर्म बौद्ध है। यहूदी धर्म को राजकीय धर्म के स्वीकारने वालों में एक मात्र इजराइल देश है। फिलहाल किसी भी देश ने हिन्दू धर्म को राजकीय धर्म का संवैधानिक अधिकार नहीं दिया है। सन् 2008 तक नेपाल दुनिया का एकमात्र हिन्दू राष्ट्र था। दस्तावेज गवाह हैं कि सन् 1768 में आधुनिक नेपाल की स्थापना के बाद से हिन्दू अधिराज्य था, जिसमें हिन्दू धर्म को आधिकारिक धर्म का दर्जा प्राप्त था। तब राजशाही के तहत यह एकमात्र हिन्दू राष्ट्र के रूप में शासित होता था। अन्तर्राष्ट्रीय षडयंत्र के तरह सन् 2006 में एक प्रायोजित आंदोलन खडा करके न केवल राजशाही खत्म की गई बल्कि सन् 2008 में हिन्दू राष्ट्र के मानवतावादी स्वरूप को भी धर्मनिरपेक्षता के हथियार से कत्ल कर दिया गया। संसार के परिपेक्ष में चन्द ठेकेदार देशों की बादशाहत के तले गठित संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा 195 देशों को ही राष्ट्र के रूप में स्वीकारोक्ति दी गई है जिसमें 193 सदस्य देश और 2 गैर-सदस्य यानी पर्यवेक्षक देश शामिल हैं। पर्यवेक्षक देशों की सूची में वेटिकन सिटी और फ़िलिस्तीन को रखा गया है जबकि ताइवान और कोसोवो जैसे क्षेत्रों को आंशिक मान्यता दी गई है। निर्भर क्षेत्रों को शामिल करने पर देशों की संख्या 200 के पार पहुंच जाती है। ऐसे में गैर मुस्लिम लोगों की निरंतर घटती संख्या और उनके अधिकारों पर जबरन कब्जा करने वाले आतंकी संगठनों की क्रूर गतिविधियां मानवता पर एक प्रश्न चिन्ह अंकित करतीं हैं। आतंक की दम पर कट्टरता थोपने वालों को जब करारा जवाब मिलने लगता है तो कम्बल ओढकर घी पीने वाले कथित सफेदपोश देश ही मानवता की दुहाई, निरीह पर अत्याचार और मासूमों के कत्ल जैसे जुमले गढकर हाय-हाय करने लगते हैं। आतंकियों को पीडित की परिभाषा में समेटकर सहायता के नाम कट्टरता को सहयोग परोसा जाने लगता है। दुनिया भर में फैले कट्टरपंथियों द्वारा अपने स्लीपर सेल्स को सक्रिय करके उन्मादियों, अपराधियों तथा असामाजिक तत्वों को भीड के रूप में जमाकर के आक्रामक बना दिया जाता है। धार्मिक भावनायें आहत होने से उपजे आक्रोश जैसे शब्दों की जुगाली करके राष्ट्रीय सम्पत्तियों को नुकसान, गैर मुस्लिम लोगों की हत्यायें और संवैधानिक व्यवस्थाओं को तार–तार करने की स्थितियां निर्मित कर दी जातीं हैं। वर्तमान में हालात यह है कि समूचा संसार आतंक की चपेट में पूरी तरह से आ चुका है। संभावनाओं पर होने वाली चर्चाओं का परिणाम आतंक तक पहुंच चुके परमाणु जखीरे पर जाकर समाप्त होता है। कट्टरपंथियों द्वारा की जाने वाली ईशनिंदा, आस्था पर प्रहार और श्रद्धा स्थलों को नस्तनाबूत करने की घटनाओं में बहुत तेजी से इजाफा होता जा रहा है। ऐसे में बांग्लादेश में हो रही हिन्दुओं की क्रूर हत्याओं को आने वाले समय की बानगी के तौर पर देखा जाना चाहिए। यहूदियों पर किये गये प्रहार का जवाब तो दुनिया देख रही है परन्तु हिन्दुओं पर हो रहे जल्मों की दास्तानों पर संयुक्त राष्ट्र संघ से लेकर ठेकेदार देशों तक ने मौन साध रखा है। देश की सीमा में भी सरकार के विपक्ष का मौन, कथित बुद्धिजीवी की खामोशी और सामाजिक सरोकारों के स्वयंभू सरगनाओं की शून्य प्रतिक्रिया से उनकी मानसिकता की व्याख्या स्वमेव ही सामने आ जाती है। ऐसे में समय रहते संसार के आमजन को मानवता की दुहाई पर एक साथ सामने आना पडेगा अन्यथा कट्टरता के तले कत्ल होती मानवता को पुनर्जीवित करने के सारे प्रयास विफल होते देर नहीं लगेगी। इस बार बस इतना ही। अगले सप्ताह एक नई आहट के साथ फिर मुलाकात होगी।
