भोपाल। मध्य प्रदेश में सहकारिता विभाग के अधिकारियों की मनमानी और भ्रष्टाचार का एक हैरान करने वाला मामला सामने आया है। जहां एक तरफ देश भर में बड़े कर्जदारों के अरबों रुपए माफ किए जा रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ महज 8,775 रुपए के पुराने कर्ज की वसूली के नाम पर एक किसान की 10.31 एकड़ बेशकीमती जमीन नीलाम करवा दी गई। लोकायुक्त की विशेष अदालत ने इस मामले को पद के गंभीर दुरुपयोग और धोखाधड़ी का दोषी मानते हुए सहकारिता विभाग के दो तत्कालीन अधिकारियों को तीन-तीन साल के सश्रम कारावास और अर्थदंड की सजा सुनाई है।
पद का दुरुपयोग कर औने-पौने दाम पर बेची जमीन
विशेष लोक अभियोजक हेमलता कुशवाह के अनुसार, विशेष न्यायालय के न्यायाधीश मनोज कुमार की अदालत ने जिला सहकारी एवं ग्रामीण विकास बैंक के विक्रय अधिकारी विजेंद्र कुमार कौशल और सहकारिता विभाग के उप पंजीयक अशोक मिश्रा को दोषी ठहराया है। इन दोनों अधिकारियों ने तय नियमों और प्रक्रियाओं का खुला उल्लंघन करते हुए किसान की जमीन को बाजार भाव से बेहद कम कीमत पर नीलाम कर दिया था। पीड़ित किसान की शिकायत के बाद दोनों आरोपियों के खिलाफ धोखाधड़ी, आपराधिक षड्यंत्र रचने, फर्जी दस्तावेज तैयार करने और भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की गंभीर धाराओं के तहत प्रकरण दर्ज किया गया था।
कुएं और पंप के कर्ज के बदले करोड़ों की संपत्ति की नीलामी
यह पूरा मामला भोपाल जिले की हुजूर तहसील के अंतर्गत आने वाले ग्राम चंदेरी छावनी का है। यहां की किसान रिफाकत बी ने वर्ष 1974 में अपने खेत में कुएं और पंप की स्थापना के लिए अपनी कृषि भूमि को बंधक रखकर 8,775 रुपए का सामान्य कर्ज लिया था। इस मामूली बकाया राशि की वसूली की आड़ में अधिकारियों ने 5 नवंबर 2004 को किसान की 10.31 एकड़ जमीन को महज 1.03 लाख रुपए में सौरभ मेटल प्राइवेट लिमिटेड को नीलाम कर दिया। नीलामी की प्रक्रिया में नियमों को पूरी तरह दरकिनार किया गया और जमीन का मूल्यांकन बाजार मूल्य तथा कलेक्टर गाइडलाइन से काफी नीचे रखा गया। इसके बाद फर्जी नोटशीट और कागजात तैयार कर इस अवैध नीलामी की पुष्टि भी करा दी गई।
लोकायुक्त जांच में साबित हुआ भ्रष्टाचार, अदालत ने सुनाई सजा
किसान द्वारा इस अन्याय की शिकायत किए जाने के बाद लोकायुक्त पुलिस ने पूरे मामले की विस्तृत जांच शुरू की थी। विवेचना के दौरान सामने आए साक्ष्यों और दस्तावेजों के आधार पर पुलिस ने आरोपियों के खिलाफ अदालत में चालान पेश किया। अदालत ने अभियोजन पक्ष द्वारा प्रस्तुत किए गए पुख्ता सबूतों, गवाहों और फर्जीवाड़े के दस्तावेजों को सही पाते हुए दोनों अधिकारियों को दोषी करार दिया और तीन-तीन साल के कारावास की सजा सुनाई।




