छतरपुर, संजय अवस्थी। चौरसिया समाज द्वारा बुधवार को संस्कार वाटिका में एक महत्वपूर्ण बैठक का आयोजन किया गया, जिसमें छतरपुर मेडिकल कॉलेज का नाम प्रसिद्ध चिकित्सक एवं शिक्षाविद् डॉ. बीडी चौरसिया के नाम पर रखने की मांग को लेकर चर्चा की गई। बैठक में समाज के लोगों ने एकमत होकर शासन से मेडिकल कॉलेज का नाम डॉ. बीडी चौरसिया के नाम पर किए जाने का आग्रह किया।


बैठक को संबोधित करते हुए चौरसिया समाज के जिलाध्यक्ष बृजेश चौरसिया काजू ने डॉ. बीडी चौरसिया के जीवन, कार्यों एवं चिकित्सा शिक्षा के क्षेत्र में उनके योगदान पर विस्तार से प्रकाश डाला। उन्होंने बताया कि डॉ. बीडी चौरसिया न केवल भारत बल्कि विश्व स्तर पर अपनी चिकित्सा संबंधी पुस्तकों और शोध कार्यों के लिए प्रसिद्ध रहे हैं। उनकी लिखी गई पुस्तकें आज भी मेडिकल छात्रों एवं चिकित्सकों के लिए मार्गदर्शक का कार्य कर रही हैं।


बैठक में उपस्थित समाजजनों एवं चिकित्सा क्षेत्र से जुड़े डॉक्टरों ने भी डॉ. बीडी चौरसिया से जुड़े अपने अनुभव साझा किए। वक्ताओं ने कहा कि चिकित्सा शिक्षा और स्वास्थ्य क्षेत्र में उनके अतुलनीय योगदान को देखते हुए छतरपुर मेडिकल कॉलेज का नाम उनके नाम पर रखा जाना ही उनके प्रति सच्ची श्रद्धांजलि होगी। इस अवसर पर डॉ. एलसी चौरसिया, डॉ. शिवेन्द्र कुमार चौरसिया, डॉ. सुनील चौरसिया, रनछोर चौरसिया, ऋतु चौरसिया, दुर्गा चौरसिया, निधि चौरसिया, शशिकांत चौरसिया, डॉ. डीडी चौरसिया सहित बड़ी संख्या में समाजजन उपस्थित रहे।


कौन थे डॉ. बीडी चौरसिया


दुनिया भर में एनाटॉमी के जनक के रूप में विख्यात दिवंगत डॉ. बी.डी. चौरसिया का पूरा नाम भगवानदीन चौरसिया था। चिकित्सा शिक्षा की रीढ़ माने जाने वाले डॉ. बी.डी. चौरसिया का जन्म 1 अक्टूबर 1937 को छतरपुर जिले के एक छोटे से कस्बे बारीगढ़ में हुआ था। उनका लालन-पालन माता राधारानी और पिता रमादीन चौरसिया के एक साधारण किसान परिवार में हुआ। ग्रामीण परिवेश से निकलकर उन्होंने अपनी प्रारंभिक शिक्षा 1954 में इलाहाबाद के इविंग क्रिश्चियन कॉलेज से पूरी की। बचपन से ही मेधावी रहे चौरसिया ने इसके बाद चिकित्सा क्षेत्र का रुख किया। उन्होंने वर्ष 1960 में इंदौर के सुप्रसिद्ध महात्मा गांधी मेमोरियल मेडिकल कॉलेज से एमबीबीएस की उपाधि प्राप्त की। इसके ठीक पांच साल बाद यानी 1965 में उन्होंने इसी संस्थान से शरीर रचना विज्ञान (एनाटॉमी) में मास्टर ऑफ सर्जरी की डिग्री हासिल की। उच्च शिक्षा के प्रति उनके जुनून का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि उन्होंने 1975 में ग्वालियर के जीवाजी विश्वविद्यालय से पीएचडी की उपाधि भी प्राप्त की।


क्लास नोट्स से शुरू हुआ था ह्यूमन एनाटॉमी की विश्वप्रसिद्ध किताब का सफर


डॉ. चौरसिया ने अपने करियर की शुरुआत एमजीएम मेडिकल कॉलेज, इंदौर के एनाटॉमी विभाग में एक प्रदर्शक के रूप में की थी। इसके बाद उन्होंने गांधी मेडिकल कॉलेज, भोपाल में व्याख्याता के रूप में सेवाएं दीं। वर्ष 1968 में वे गजराराजा मेडिकल कॉलेज ग्वालियर में एनाटॉमी के रीडर के रूप में शामिल हुए और जीवन के अंतिम समय तक वहीं अध्यापन कार्य करते रहे।


ग्वालियर में पढ़ाते समय मानव मस्तिष्क और शरीर रचना पर उनके द्वारा हाथ से बनाए गए चित्र और क्लास नोट्स मेडिकल छात्रों के बीच बेहद लोकप्रिय हो गए थे। उस दौर में फोटोकॉपी और टाइपिंग काफी महंगी हुआ करती थी। गरीब और जरूरतमंद छात्रों तक शिक्षा को सुलभ बनाने के लिए डॉ. चौरसिया अपने नोट्स को खुद साइक्लोस्टाइल (मशीन से प्रिंट) करते थे और महज 10 रूपए की लागत मूल्य पर छात्रों को बांट देते थे। उनके इन बेहतरीन और सरल नोट्स की ख्याति जब नई दिल्ली के सीबीएस पब्लिशर्स तक पहुंची, तो उन्होंने डॉ. चौरसिया को मानव शरीर रचना विज्ञान पर एक विस्तृत पाठ्यपुस्तक लिखने के लिए आमंत्रित किया।


45 वर्षों से दुनिया भर के डॉक्टरों की पढ़ाई का आधार बनी हैं पुस्तकें


प्रोफेसर इंदरबीर सिंह और प्रोफेसर एस.सी. गुप्ता जैसे विद्वानों से प्रेरित होकर डॉ. चौरसिया ने वर्ष 1979 में अपनी पहली ऐतिहासिक पुस्तक ह्यूमन एनाटॉमी प्रकाशित की। उन्होंने इस गंभीर और जटिल विषय को रोचक बनाने के लिए पुस्तक में पहेलियाँ, कविताएँ, सरल भाषा और आकर्षक फ्लोचार्ट शामिल किए, ताकि छात्रों को यह विषय थकाऊ और उबाऊ न लगे। उन्होंने यह अद्भुत कृति अपने गुरु उमा शंकर नागयाच को समर्पित की थी।